कोरोना वायरस: जब भारत की राजधानी दिल्ली बनी एक 'भुतहा शहर'

सेंट्रल दिल्ली के कनॉट प्लेस का नज़ारा
इमेज कैप्शन, सेंट्रल दिल्ली के कनॉट प्लेस का नज़ारा
    • Author, अपर्णा अल्लूरी
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, दिल्ली
  • प्रकाशित

इसी साल मार्च के महीने में, कोरोना वायरस के प्रकोप से बचने के लिए भारत में लॉकडाउन की घोषणा की गई थी. दफ़्तर बंद कर दिये गए थे. सार्वजनिक सेवाएं बंद कर दी गई थीं और लोग अपने घरों में क़ैद हो गये थे. लेकिन फ़ोटोग्राफ़र पारुल शर्मा उस दौरान दिल्ली की वीरान सड़कों को अपने क़ैमरे में क़ैद कर रही थीं.

एक फ़ोन इंटरव्यू के दौरान, पारुल ने बीबीसी से कहा कि "मेरे जैसे बेचैन लोगों के लिए लॉकडाउन की घोषणा एक बड़ी बात थी. मैं घर में रुक ही नहीं सकती. इसलिए मैंने बाहर निकलने का निर्णय किया."

इसके लिए उन्हें अपने परिवार को मनाना पड़ा, पर वो मान गये. फिर पारुल ने घर से बाहर निकलने के लिए 'ज़रूरी पास' का प्रबंध किया जो पत्रकारों और अन्य अधिकारियों को दिये गये थे.

तीन अप्रैल को वे लॉकडाउन में पहली बार दिल्ली की सड़कों पर निकलीं. उसके बाद, अगले कुछ महीने वे लगातार अपनी कार में शहर के चक्कर लगाती रहीं और कैमरे में तस्वीरें उतारती रहीं.

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इमेज कैप्शन, दिल्ली से मुंबई को जोड़ने वाले हाइवे पर कुछ साइकिल चालक

वे बताती हैं, "सिर्फ़ पक्षी और बादल दिखाई देते थे. कोई इंसान दिखाई नहीं देता था. वो अलग तरह की फ़ीलिंग थी - स्थिर और गतिहीन, पर बहुत सुंदर."

पर पारुल की इस मेहनत का नतीजा ये हुआ कि वे ग़ैर-मामूली हालात में दिल्ली शहर की ऐसी 10 हज़ार तस्वीरें ले पाईं, जो अब इस शहर के इतिहास में शामिल हैं और उनकी इन ख़ास तस्वीरों के संकलन को दिल्ली के एक प्रकाशक ने क़िताब की शक़्ल में लेकर आने का निर्णय किया. इस क़िताब का नाम है - 'डायलेक्ट्स ऑफ़ सायलेंस'.

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इमेज कैप्शन, कनॉट प्लेस की ऐतिहासिक रीगल सिनेमा बिल्डिंग

पारुल कहती हैं कि "लॉकडाउन के दौरान मैं ऐतिहासिक स्थलों पर नहीं गई, बल्कि मैंने उन जगहों को चुना जो मुझे दिल्ली में मेरे बचपन की याद दिलाती हैं."

अंग्रेज़ों के दौर में बना एक जॉर्जियन-स्टाइल का व्यापारिक केंद्र जिसे कनॉट प्लेस या राजीव चौक के नाम से जाना जाता है - पारुल की लिस्ट में था. साथ ही विभाजन के समय विकसित हुआ व्यापारिक केंद्र ख़ान मार्केट भी उन्होंने कवर किया.

Khan Market
इमेज कैप्शन, दिल्ली का ख़ान मार्केट जो अपनी चहल-पहल के लिए मशहूर है, लॉकडाउन के दौरान कुछ ऐसी स्थिति में था

पारुल बताती हैं कि इन जगहों से जुड़ी लाखों कहानियाँ हैं. इन जगहों की भीड़ और यहाँ गुज़ारे गए फ़ुर्सत के पल लाखों की ज़िंदगियों में शामिल हैं. पर एक वक़्त आया था, जब ये जगहें वीरान हो गई थीं.

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इमेज कैप्शन, लगभग खाली पड़ी जामा मस्जिद के बाहर बैठा एक शख़्स

इसके अलावा भी पारुल ने कुछ सरकारी सेवाओं, लॉकडाउन के दौरान ग़रीबी को मिलीं सुविधाओं और कुछ पेशेवर लोगों की तस्वीरें अपने कैमरे में क़ैद कीं.

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इमेज कैप्शन, पारुल कहती हैं कि "त्वचा का हर एक सेंटीमीटर ढका गया, ताकि वायरस शरीर तक ना पहुँच पाये."
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इमेज कैप्शन, एक कोविड अस्पताल में कोरोना से संक्रमित बच्चा
Delhi
इमेज कैप्शन, बेघरों को खुले मैदानों में भोजन दिया गया
A coffin maker at work in Delhi
इमेज कैप्शन, शवपेटी (ताबूत) तैयार करता एक शख़्स
Delhi
इमेज कैप्शन, कोविड से गुज़रे लोगों की कब्रगाह
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इमेज कैप्शन, राष्ट्रपति भवन का साउथ ब्लॉक
Delhi
इमेज कैप्शन, ...और जब लॉकडाउन में ढील दी जाने लगी, तो दिल्ली के कुछ महंगे फ़ार्महाउसों में फ़िल्मों की शूटिंग शुरू हुई

जून आते-आते, लॉकडाउन में ढील दी जाने लगी और 'न्यू नॉर्मल' बोलकर एक नई परिस्थिति को स्वीकार किया गया.

अपनी क़िताब के बारे में वे कहती हैं कि "ये किसी दस्तावेज़ से कम नहीं, जिसमें इस शहर पर क्या गुज़री - यह सच्चाई देखी जा सकती है."

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