You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
ममता बनर्जी सरकार छठ पूजा को लेकर जाएगी सुप्रीम कोर्ट
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
- प्रकाशित
एनजीटी ने पश्चिम बंगाल सरकार की उस अर्जी को ठुकरा दिया है जिसमें कोलकाता के रबींद्र सरोवर में छठ पूजा की अनुमति मांगी गई थी.
सरकार अब इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी. एनजीटी ने दो साल पहले एक पर्यावरण कार्यकर्ता सुभाष दत्त की अपील पर सरोवर में छठ पूजा के आयोजन पर पाबंदी लगा दी थी.
इसके बावजूद भी सैकड़ों लोगों ने जबरन वहां पहुंच कर पूजा आयोजित की.
कोलकाता में हिंदी भाषियों की भारी तादाद और उनके वोटों को ध्यान में रखते हुए अब तृणमूल कांग्रेस सरकार रबींद्र सरोवर में छठ पूजा की अनुमति के पक्ष में है.
एनजीटी ने साफ़ कहा है कि रबींद्र सरोवर में छठ पूजा की इजाज़त नहीं दी जा सकती क्योंकि इससे पर्यावरण को नुक़सान पहुंचेगा.
क्या है मामला
पर्यावरण कार्यकर्ता सुभाष दत्त ने इसके लिए एनजीटी में एक याचिका दायर की थी कि पूजा के आयोजन से सरोवर और उसके आसपास के पर्यावरण को भारी नुक़सान पहुंचता है और इसलिए इस पर तत्काल रोक लगाई जानी चाहिए.
साल 2018 में एनजीटी ने रबींद्र सरोवर में छठ पूजा के आयोजन पर रोक लगा दी थी.
राज्य सरकार ने बीते साल भी इस पाबंदी को हटाने की अपील की थी. लेकिन एनजीटी अपने फ़ैसले पर अड़ा रहा.
सरकारी एजेंसी कोलकाता मेट्रोपोलिटन विकास प्राधिकरण (केएमडीए) 73 एकड़ में फैले इस सरोवर यानी झील की संरक्षक है. प्राधिकरण ने उसे साल 2018 के फ़ैसले को सख़्ती से लागू करने का निर्देश दिया है.
इस झील में 35 से 40 हजार लोगों की भीड़ छठ-पूजा के दौरान उमड़ती है. हुगली नदी से दूर दक्षिण कोलकाता में यह अकेली ऐसी विशाल झील है जहां लंबे अरसे से छठ पूजा आयोजित होती रही है.
दो साल पहले लगी पाबंदी के बावजूद पिछले साल सैकड़ों की तादाद में लोगों ने मुख्य द्वार पर लगा ताला तोड़ कर भीतर प्रवेश किया और वहां छठ पूजा आयोजित की.
वहां खड़ी पुलिस मूक दर्शक बनी रही. तब इस पर काफ़ी विवाद हुआ था. लेकिन कोलकाता पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, "यह मुख्य रूप से महिलाओं का पर्व है. हम बीते साल उनके ख़िलाफ़ बल प्रयोग नहीं कर सकते थे. नतीजतन हमें मूक दर्शक बने रहना पड़ा."
केएमडीए के एक अधिकारी बताते हैं, "वर्ष 2016 और 17 में एनजीटी ने सरोवर में छठ पूजा करने की अनुमति दी थी. उसके बाद से यहां छठ पूजा के लिए पूरी तरह रोक लगा दी गई थी."
हालांकि एनजीटी की रोक के बावजूद लोग यहां छठ पूजा के लिए पहुंचते रहे हैं.
इसको लेकर बीते साल भी काफी हंगामा हुआ था. केएमडीए ने हाल ही में एनजीटी में दायर याचिका में लोगों की धार्मिक भावना को देखते हुए सरोवर में छठ पूजा करने की अनुमति मांगी थी.
केएमडीए ने अदालत के समक्ष यह भी दावा किया था कि आयोजन की अनुमति नहीं देने की स्थिति में कानून और व्यवस्था की समस्या भी हो सकती है.
इसकी वजह यह है कि बीते साल हज़ारों श्रद्धालुओं ने झील के बंद दरवाज़ों को तोड़ दिया था और एनजीटी के आदेशों का उल्लंघन करते हुए पूजा की थी.
लेकिन न्यायमूर्ति एसपी वांगदी और दो विशेषज्ञ सदस्यों वाली एक पीठ ने यह याचिका खारिज कर दी. केएमडीए के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, "हम अदालत के फैसले का सम्मान करते हैं और सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद अगला कदम उठाएंगे."
शहरी विकास मंत्री फिरहाद हकीम बताते हैं, "हम इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट जाएंगे. हम लोगों की धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए चाहते थे कि सरोवर में छठ पूजा के आयोजन को हरी झंडी मिल जाए. सरकार छठ पूजा आयोजित करने वालों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है."
केएमडीए की मुख्य कार्यकारी अधिकारी अंतरा आचार्य कहती हैं, "इसमें धार्मिक भावनाएं शामिल हैं और इस मौक़े पर कई महिलाएं और बच्चे एकत्र होते हैं. उन्हें झील परिसर में प्रवेश करने से रोकना मुश्किल है."
उधर, पर्यावरणविद सोमेंद्र नाथ घोष और सुमिता बंद्योपाध्याय ने एनजीटी के आदेश का स्वागत करते हुए सवाल किया है कि आखिर केएमडीए ने ऐसी अर्जी क्यों दायर की?
पर्यावरणविद सुभाष दत्त ने भी प्राधिकरण के फ़ैसले का स्वागत किया है. वह कहते हैं, "सरकार प्राधिकरण के आदेश का पालन करने की बजाय उसके उल्लंघन का प्रयास कर रही है. सरकार को प्रदूषण की कोई चिंता नहीं है. यह मामला धर्म का हो गया है और सरकार को लग रहा है कि कहीं हमारा वोट बैंक न गड़बड़ा जाए. इसीलिए वह यहां छठ पूजा का आयोजन कराना चाहती है."
विपक्ष कर रहा है ममता सरकार पर हमला
दूसरी ओर, विपक्ष का आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस राज्य में अगले साल होने वाले अहम विधानसभा चुनावों से पहले हिंदी भाषियों को लुभाने का प्रयास कर रही है. एनजीटी के समक्ष अपील भी उसकी इसी रणनीति का हिस्सा है.
सीपीएम नेता सुजन चक्रवर्ती कहते हैं, "सरकार इस मुद्दे का सियासी फ़ायदा उठाना चाहती है. लेकिन उसे प्राधिकरण के फैसलों को ध्यान में रखते हुए समय रहते वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए थी."
भाजपा के राष्ट्रीय सचिव राहुल सिन्हा कहते हैं, "एनजीटी से छठ पूजा के आयोजन की अनुमति देने की अपील करना शर्मनाक है. सरकार जानती है कि इससे झील और उसके आसपास के माहौल को भारी नुक़सान पहुंचेगा. ममता को हिंदी भाषी लोगों की भावनाओं को समझने में नौ साल का समय लग गया."
भाजपा नेता शमीक भट्टाचार्य कहते हैं, "सरकार छठ पूजा समारोहों पर धुव्रीकरण की राजनीति कर रही है. उसे प्राधिकरण के निर्देश के मुताबिक़ पूजा के आयोजन के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए. लेकिन वोट बैंक की राजनीति के तहत तृणमूल कांग्रेस हिंदीभाषियों को लुभाने की कोशिश में जुटी है."
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि तृणमूल कांग्रेस सरकार का मक़सद अगले साल के चुनावों से पहले हिंदी भाषी वोटरों को अपने पाले में खींचना है.
पर्यवेक्षक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, "सरकार ने इसी सप्ताह हिंदी अकादमी के पुनर्गठन और विस्तार के अलावा तृणमूल कांग्रेस के हिंदी सेल का भी गठन किया है. अब उसके बाद छठ पूजा के लिए उसकी सक्रियता से साफ़ है कि उसकी निगाहें उसी हिंदीभाषी वोट बैंक पर है जिस पर भाजपा की भी निगाहें हैं."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)