कोरोना: मां-पिता को खोने के बाद उनकी आख़िरी निशानी के लिए अस्पताल से जंग

तारा रावल और गणपत रावल की तस्वीर

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    • Author, भार्गव पारिख
    • पदनाम, बीबीसी गुजराती संवाददाता
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 4 मिनट

गुजरात के गांधीनगर में रहने वाली 28 साल की तेजल शुक्ला की ज़िंदगी कोरोना वायरस ने उलट कर रख दी है. 48 घंटों के भीतर तेजल ने अपने माता-पिता को खो दिया.

कोरोना संक्रमण होने के शक में तेजल के माता-पिता को गांधीनगर के एक सरकरी अस्पताल में भर्ती कराया गया था.

अब तेजल ने ज़िला कलेक्टर से इस मामले की जांच करने की गुज़ारिश की है और इस बारे में 20 अगस्त को उन्हें पत्र भी लिखा है.

माता-पिता को खोने के बाद अब तेजल अपने माता-पिता के गहने वापस पाने की लड़ाई लड़ रही हैं. वो कहती हैं कि ये गहने उनकी आख़िरी निशानी हैं और परिवार के लिए इनका अलग भावनात्मक मूल्य है.

तेजल का आरोप है कि अस्पताल के अधिकारियों ने अब तक उनके माता-पिता के गहने उन्हें नहीं लौटाए हैं.

तेजल शुक्ला

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मामला शुरू हुआ जून से

तेजल ने बीबीसी को बताया, "चार साल पहले मेरी मां को दिल की बीमारी हुई थी जिसके बाद से उनका इलाज चल रहा था. 15 जून को अचानक उनका स्वास्थ्य बिगड़ा. उन्होंने सीने में दर्द की शिकायत की. उस वक्त प्राइवेट डॉक्टर उनका इलाज करने के लिए राज़ी नहीं हुए जिसके बाद हम उन्हें गांधीनगर के सरकारी अस्पताल में लेकर गए."

तेजल की मां तारा रावल आंगनवाड़ी वर्कर के तौर पर काम करती थीं और अब रिटायर्ड हो चुकी थीं. वहीं उनके पिता गणपत रावल ड्राइवर का काम करते थे.

तेजल की एक बहन हैं पूनम जो अपने पति से अलग रहती हैं. पूनम और उनके बेटे की ज़िम्मेदारी तारा और गणपत पर ही थी.

अस्पताल में भर्ती कराए जाने को लेकर तेजल कहती हैं, "मेरी मां कोविड-19 मरीज़ हैं या नहीं अस्पताल में अधिकारियों ने ये पुष्टि नहीं की बल्कि उन्होंने उन्हें सीधे कोविड-19 वार्ड में भर्ती कर दिया. हमें ये देखकर आश्चर्य हुआ लेकिन हम कुछ नहीं कर सकते थे."

"मां के अस्पताल में भर्ती होने के बाद मेरे पिता बेचैन हो गए. मां ने अस्पताल से हमें वीडियो कॉल किया, वो रो रही थीं. मेरे पिता के लिए उनको उस हालत में देखना मुश्किल था."

वीडियो कैप्शन, कोरोना वायरस की वैक्सीन से दुनिया अभी कितनी दूर?

अपने पिता के अस्पताल में भर्ती होने को लेकर तेजल कहती हैं, "दूसरे दिन सैनिटाइज़ेशन के लिए और हम सभी की मेडिकल जांच करने के लिए एक मेडिकल टीम हमारे घर आई. उस समय मेरे पिता ने कहा कि उन्हें बेचैनी और थकान महसूस हो रही है."

तेजल कहती हैं कि उनके पिता को भी गांधीनगर के एक सरकारी अस्पताल ले जाया गया और 17 जून को उन्हें एक कोविड-19 वार्ड में भर्ती कर दिया गया.

वो कहती हैं कि परिवार के किसी भी सदस्य को उनसे मिलने की इजाज़त नहीं थी. वो कहती हैं, "मुझे याद है कि वो दोनों अस्पताल से हमें वीडियो कॉल करते और हमसे कहते कि हम उन्हें घर ले आएं. अब इस बारे में सोच-सोच कर मैं सो नहीं पाती हूं."

"जून की 21 तारीख़ को मेरी मां की मौत हो गई. उसके बाद 23 जून को मेरे पिता चल बसे. हमारा घर ही उजड़ गया. हम उन्हें क़रीब से देख तक नहीं पाए."

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ऐसा लगा जैसे हम अछूत हो गए'

लेकिन तेजल और उनकी बहन पूनम की मुश्किलें इतने पर ख़त्म नहीं हुईं. उन्हें इससे भी बड़ा सदमा तब लगा जब कोई उन्हें सांत्वना देने तक नहीं आया.

तेजल ने बीबीसी को बताया, "जैसे ही हमारे घर को कोविड-19 संक्रमित घोषित कर दिया गया समाज में सभी हमसे दूर हो गए. मोहल्ले के लोग हमसे दूरी मेन्टेन करते, न कोई दोस्त, न कोई रिश्तेदार, यहां तक कि हमारे पड़ोसियों ने भी हमसे बात करना बंद कर दिया. हम एक तरह से अछूत बन गए थे."

हिंदू मान्यताओं के अनुसार परिवार में किसी की मौत होने पर घर में बारह दिनों तक चूल्हा नहीं जलता. लेकिन इन बारह दिनों के दौरान तेजल और उनकी बहन को कहीं से किसी तरह की कोई मदद नहीं मिली.

तेजल कहती हैं, "किसी को यो नहीं दिखा कि बच्चे भूख से रो रहे थे. हम होटल से खाना ऑर्डर करते थे ताकि बच्चे भूखे पेट न सोएं."

तेजल कहती हैं कि कुछ दिनों बाद जब वो घर आईं तो उन्होंने देखा कि उनके माता-पिता के गहने ग़ायब थे. उनके पिता की अंगूठी और सोने की चेन, मां की चूड़ियां ग़ायब थीं.

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'गहनों का ख़याल रखते थे माता-पिता'

अपने माता-पिता की तस्वीर देखते हुए तेजल कहती हैं कि उनके ससुर ने उनके पिता को उपहार में अंगूठी दी थी जिसको वो कभी नहीं उतारते थे.

वो कहती हैं, "शादी की 25वीं सालगिरह पर मेरे पिता ने मां को सोने की एक चेन और चांदी की चूड़ी दी थी जो मां ने कभी नहीं उतारी."

"इन गहनों की क़ीमत हम जानते हैं. हमारे लिए वो हमारे माता-पिता की ये आख़िरी निशानी है."

तेजल का आरोप है कि जब उन्होंने अस्पताल के कर्माचारियों से अपने मात-पिता के गहने मांगे तो उन्होंने उनके साथ ग़लत व्यवहार किया.

वो कहती हैं, "उन्होंने कहा कि दो महीने बीत गए हैं इसलिए हमारे पास कोई रिकॉर्ड नहीं है. इसके बाद फिर मैंने न्याय की उम्मीद में ज़िला कलेक्टर से मुलाक़ात की और उनकी मदद मांगी."

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तेजल के आरोपों को अस्पताल ने किया ख़ारिज

गांधीनगर के सिविल अस्पताल की रेज़िडेंट मेडिकल ऑफ़िसर सुधा शर्मा ने बीबीसी से कहा कि दोनों मरीज़ों को स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याएं थीं.

वो कहती हैं कि जब उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था तभी से उन्हें हेल्थ कॉम्प्लिकेशन्स थे. वो कहती हैं कि दोनों का इलाज प्रोटोकॉल के तहत ही किया गया है और इलाज के दौरान कर्मचारियों ने उनका पूरा ध्यान रखा है.

वो कहती हैं, "हम इस संबंध में ज़िला कलेक्टर को रिपोर्ट सौंपेंगे. हमारे पास परिजनों को गहने सौंपे जाने की रसीद समेत सभी संबधित दस्तावेज़ हैं."

हालांकि तेजल कहती हैं कि वो आख़िरी सांस तक ये लड़ाई जारी रखेंगी.

वो कहती हैं, "ज़रूरत पड़ी तो मैं अस्पताल के सामने धरने पर बैठूंगी, और ज़रूरत हुई तो भूख हड़ताल भी करूंगी. जब तक मुझे मेरे माता-पिता के गहने नहीं मिल जाते, मैं शांत नहीं बैठूंगी."

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