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तो क्या सितंबर में खुल जाएंगे कॉलेज ?
- Author, भूमिका राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
क्या अगले महीने भारत में खुल जाएंगे कॉलेज ? ये सवाल देश में हर कोई पूछ रहा है.
दरअसल केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफ़नाम दायर कर यूजीसी दिशानिर्देशों के आधार पर शैक्षणिक संस्थानों में अंतिम वर्ष की परीक्षा कराने और मूल्यांकन कराने के लिए प्रतिबंध से छूट की बात कही है.
इससे इस बात का अंदाज़ा भी लगाया जा रहा है कि संभव है कि सितंबर महीने से कॉलेज दोबारा से खुल जाएं. फिलहाल भारत में अनलॉक 3 के तहत जारी नई गाइडलाइन्स में 31 अगस्त तक स्कूल-कॉलेज खुलने पर प्रतिबंध है.
दरअसल, दिल्ली और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में छात्रों और शिक्षाविदों की मांग है कि परीक्षाएं कराए बिना ही अंतीम वर्ष में पढ़ाई कर रहे ग्रेजुएशन के छात्रों को उनके असाइनमेंट्स और सेमेस्टर के परिणामों से आधार पर आगे बढ़ा दिया जाए लेकिन यूजीसी चाहता है कि परीक्षाएं हों.
यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है जिसे 18 अगस्त तक के लिए स्थगित कर दिया गया है.
सुप्रीम कोर्ट कैसे पहुँचा मामला
कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को इस संबंध में पत्र लिखा था और परीक्षा ना कराने की अपील की थी.
महाराष्ट्र सरकार ने राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के निर्णय के आधार पर अंतिम वर्ष की परीक्षा रद्द करने के लिए 19 जून को एक प्रस्ताव पारित किया था. जिसके बाद 11 जुलाई को दिल्ली सरकार ने राज्य विश्वविद्यालयों मे अंतिम वर्ष की परीक्षाएँ रद्द कर दी हैं.
वहीं यूजीसी के पूर्व अध्यक्ष समेत 27 अन्य शिक्षाविदों ने यूजीसी को पत्र लिखकर परीक्षाएँ आयोजित ना कराने की अपील की है.
छात्रों और अध्यापकों का क्या कहना है
छात्रों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि जब कॉलेज बंद हुए थे तब तक सिलेबस पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ था.
दूसरी फ़िक्र संसाधनों की भी है.
तीसरा यह कि अगर कोई बच्चा ऑफ़लाइन परीक्षा दे रहा है और कोई दूसरा ऑनलाइन तो दोनों के अवसरों और विकल्पों में अंतर है... ऐसे में मार्किंग का आधार क्या होगा.
मुकेश कहते हैं कि ऑनलाइन परीक्षा में जो सबसे बड़ी समस्या है वो पैटर्न और नेटवर्क की है.
मुकेश डीयू की दो ऑनलाइन परीक्षा दे चुके हैं.
वो बताते हैं, 'प्रश्न पत्र क़रीब आधे घंटे पहले ही मेल पर आ जाता है. नौ बजे वही पेपर डीयू के पोर्टल पर अपलोड किया जाता है और फिर वहां लॉगइन करना होता है. कुल समय चार घंटे का दिया जाता है जिसमें दो घंटे जवाब लिखने के और दो घंटे अपलोड के होते हैं. सवालों के जवाब लिखने के बाद फ़ाइल बनानी होती है और फिर अपलोड करना होता है.'
यहीं पर ज़्यादातर छात्र जूझ रहे हैं.
'जवाब लिखने के बाद उसे अपलोड करना होता है. कभी साइट क्रैश कर जाती है तो कभी पोर्टल पर अपलोड होने में दिक्क़त होती है. ऐसे में मेल करना पड़ता है. लेकिन छात्रों के लिए ये बड़ा डर है.'
छात्रों में एक डर इस बात का भी है कि अगर इंटरनेट और पोर्टल में तकनीकी कमी के कारण फ़ाइल तय समय से देर से गई तो क्या उनकी उत्तर-पुस्तिका जांची जाएगी या नहीं.
छात्र यूनियन से जुड़े वरुण सरदेसाई का कहना है कि बात सिर्फ़ उन छात्रों की नहीं है जो शहरों में रह रहे हैं. ऐसे भी छात्र हैं जिनके पास ये सुविधाएँ नहीं हैं.
वो कहते हैं, "यूजीसी ने अपनी अप्रैल की गाइडलाइन्स में ख़ुद माना था कि ऑनलाइन परीक्षाएँ लेना संभव नहीं है और अब जब नई गाइडलाइन्स आई हैं तो पहला वाक्य ही इस पुष्टि से शुरू होता है कि कोरोना के केस बढ़ रहे हैं. ऐसे में परीक्षा लेने का सवाल कहां और किस सोच से आ सकता है."
दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफ़ेसर, डूटा और फेडरेशन ऑफ सेंट्रल यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष रह चुके आदित्य नारायण का कहना है 'हम तो शुरू से इस व्यवस्था का विरोध कर रहे हैं.'
उनका मानना है कि अभी हमारे यहां व्यवस्था इस प्रक्रिया के लिए तैयार है ही नहीं.
हाल के दिनों में हुईं ऑनलाइन परीक्षाओं का ज़िक्र करते हुए वे कहते हैं कि हर रोज़ रात के दस-दस बजे तक विद्यार्थियों के फ़ोन आते हैं किसी की उत्तर-पुस्तिका अपलोड नहीं हुई होती है तो किसी का एरर आ जाता है.
क्या है यूजीसी की दलील
यूजीसी ने इस साल सबसे पहली बार अप्रैल में दिशा-निर्देश जारी किये थे तब परीक्षाओं को जुलाई में कराने के लिए कहा था. बाद में यूजीसी ने जुलाई में नए दिशानिर्देश जारी किए.
इस पर कोर्ट ने स्पष्टीकरण मांगते हुए पूछा था कि क्या दिशानिर्देश आपदा प्रबंधन अधिनियम की अधिसूचना के तहत हैं?
गुरुवार को दायर किये गए यूजीसी के हलफ़नामे में कहा गया है कि परीक्षा कराने का फ़ैसला मानव संसाधन विकास मंत्रालय और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 की धारा 10 (2) (1) के तहत जारी किए गए दिशा-निर्देशों के अनुरूप हैं.
याचिकाकर्ताओं की दलील
याचिकाकर्ताओं की ओर से मामले को देख रही एक अधिवक्ता अनुभा श्रीवास्तव सहाय कहती हैं कि गृहमंत्रालय की मौजूदा गाइडलाइंस में 31 अगस्त तक किसी भी शैक्षणिक आयोजन, संस्थान या कॉलेज के खोले जाने पर प्रतिबंध है. ऐसे में परीक्षा का आयोजन कैसे किया जा सकता है.
वे कहती हैं 'कोरोना की स्थिति अभी संभली तो है नहीं जो परीक्षा करायी जा सके. जिस समय संस्थानों को बंद किया गया था और परीक्षाओं को टाला गया था उस समय महज़ कुछ हज़ार केस थे और अभी जब लाखों में केस हैं तो छात्रों और उनके परिवार वालों के साथ इतना ख़तरा उठाने का फ़ैसला क्यों?'
वो कहती हैं, 'सामान्य परिस्थितियों में यूजीसी गाइडलाइन्स का पालन नहीं करने पर यूजीसी विश्विद्यालयों को अनुदान देना बंद कर सकती है. डिग्री को मान्यता देना बंद कर सकती है लेकिन अभी परिस्थितियां सामान्य नहीं हैं.'
याचिकाकर्ता पीएमओ और गृह मंत्रालय से भी हस्तक्षेप की सिफ़ारिश करने पर विचार कर रहे हैं ताकि जिन छात्रों को कहीं बाहर नौकरी मिल गई हो, प्रवेश मिल गया हो, उनका नुकसान ना हो.
एक ओर जहां याचिकाकर्ता गृह मंत्रालय की नई गाइडलाइन्स का हवाला दे रहे हैं वहीं गृह मंत्रालय ने गुरुवार को जो हलफ़नामा दिया है वो पुरानी गाइडलाइन्स के आधार पर है.
ऐसे में भारत में अलग-अलग राज्यों के तकरबीन 30 लाख छात्रों का भविष्य दांव पर है.
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