EIA-2020: किस तरह लोगों ने दो पहाड़ों को रेत बनने से बचाया

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    • Author, ए डी बालासुब्रमण्यम
    • पदनाम, बीबीसी तमिल सेवा
  • प्रकाशित

क़रीब बारह साल पहले तमिलनाडु के लगभग 20 गाँवों के लोग एक साथ जमा हुए. उन्होंने सरकार द्वारा आयोजित जन-सुनवाई में हिस्सा लिया और खुदाई करने वाली एक बड़ी कंपनी को पहाड़ों को ध्वस्त करने से रोक दिया.

इन पहाड़ियों को लेकर उनका विश्वास था कि 'ये उनकी ज़िंदगी के लिए ज़रूरी हैं.' लेकिन जो बात बारह साल पुरानी हो चुकी है उसका ज़िक्र आज क्यों?

क्योंकि जन-सुनवाई के जिस हथियार का इस्तेमाल उन गाँव वालों ने अपने हितों के लिए उस वक़्त किया था उसे लेकर सरकार का जो रुख़ है, उसपर पर्यावरणविदों ने चिंता ज़ाहिर की है.

हाल ही में भारत सरकार ने एक मसौदा पेश किया है जिसमें इस 'हथियार' को कमज़ोर किये जाने का प्रस्ताव है.

किसी भी इलाक़े में खुदाई या माइनिंग के काम के लिए लाइसेंस जारी किये जाने से पहले जन-सुनवाई किया जाना अनिवार्य होता है. भारत में लागू 'इन्वायरमेंट इम्पेक्ट असेसमेंट नोटिफ़िकेशन-2006' के तहत अभी तक ऐसा ही होता आया है.

लेकिन अब सरकार ने इस नोटिफ़िकेशन को एक नए नोटिफ़िकेशन से बदलने का प्रस्ताव रखा है.

'इन्वायरमेंट इम्पेक्ट असेसमेंट -2020' का प्रस्ताव कुछ दिन पहले ही जारी किया गया है. पर्यावरणविदों का मानना है कि इस प्रस्ताव में जन-सुनवाई की अनिवार्यता को समाप्त किये जाने के कई उपक्रम शामिल हैं, और फिर यहीं पर आता है उन दो पहाड़ियों का उदाहरण.

कावुथी पहाड़ी और वेदियप्पन पहाड़ी, ये दोनों मशहूर तिरुवनमलाई पहाड़ी के निकट स्थित हैं.

इन दोनों पहाड़ियों पर घने और विशाल आरक्षित वन हैं, साथ ही ये लौह अयस्क से भी परिपूर्ण हैं.

जिंदल विजयनगर स्टील लिमिटेड यहाँ माइनिंग का काम शुरू करना चाहती थी और यहाँ दबे लोहे को निकालना चाहती थी.

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तमिलनाडु लौह अयस्क खनन निगम (टीआईएमसीओ) राज्य के स्वामित्व वाले टीआईडीसीओ और जिंदल समूह के बीच एक संयुक्त उद्यम था और इसमें उसका 99 फ़ीसदी शेयर था.

उन्होंने कवुथीमालाई रिज़र्व फ़ॉरेस्ट में माइनिंग के लिए आवेदन किया था. उन्होंने 325 हेक्टेअर आरक्षित वन क्षेत्र में पट्टा देने की माँग की थी.

वहीं दूसरी ओर इस पहाड़ी के आस-पास रह रहे लोगों को इस बारे में कोई जानकारी भी नहीं थी. यहाँ तक कि जब उन्हें पता चला तो उन्हें लगा कि यह कोई इंडस्ट्रीयल प्रोजेक्ट है जिससे उनका भी भला ही होगा. कुछ समाजिक कार्यकर्ताओं ने इस पर सवाल किये.

उन्होंने ईआईए-2006 नोटिफ़िकेशन के तहत रैपिड इन्वायरमेंट इंपेक्ट असेसमेंट के अनुसार इस परियोजना के प्रस्ताव स्वरूप पहाड़ी पर प्रभाव, जंगल और लोगों के स्वास्थ्य पर होने वाले असर का अध्ययन किया.

रैपिड इन्वायरमेंट इंपेक्ट असेसमेंट का कहना था कि निश्चित तौर पर इस परियोजना का असर जंगल पर पड़ेगा. साथ ही वहाँ के जीवों और पादपों पर भी.

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हालांकि यह भी कहा गया कि वन संरक्षण अधिनियमों और नियामकों के अनुसार प्रभाव को कम करने के लिए आवश्यक पहल भी की जाएगी.

स्वास्थ्य एवं सुरक्षा रिपोर्ट में कहा गया, "इसके कारण सुनाई देना बंद हो जाना, सीलिका और लोहे के बारीक कणों के शरीर में प्रवेश से फेफड़ों से जुड़ी बीमारी होने का ख़तरा होता है. इसके अलावा 15 सेंटीमीटर से अधिक के क़रीब 2.2 लाख पेड़ गिरा दिए जाएंगे."

पर्यावरण कार्यकर्ताओं द्वारा चलाये जा रहे अभियानों ने परियोजना को लेकर लोगों के दृष्टिकोण को बदल दिया. वे इस प्रोजेक्ट के ख़िलाफ़ खड़े हो गए. सड़कों पर कोई बहुत बड़ी संख्या में प्रदर्शन नहीं हुआ लेकिन वे इस बात को लेकर जागरूक हो चुके थे कि उन्हें अपना असंतोष कहाँ दर्ज करना है.

इस प्रोजेक्ट के लिए होने वाली जन-सुनवाई के लिए 27 दिसंबर 2008 की तारीख़ तय की गई. वे सभी इस तारीख़ के लिए ख़ुद को तैयार कर रहे थे.

तिरुवन्नामलाई में हज़ारों की संख्या में गाँव वालों ने अपनी राय दर्ज कराने के लिए ज़िला कलेक्ट्रेट का घेराव किया. कलेक्ट्रेट के भीतर जो हॉल था, उसमें सिर्फ़ सौ लोगों के बैठने की व्यवस्था थी.

बतौर पत्रकार मैं इस मूवमेंट को उसके शुरुआती दौर से देख रहा था.

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कार्यकर्ताओं की मदद से गाँव वालों ने इस मामले में जानकारी हासिल की. उसे समझा और फिर यह तय किया कि उन्हें क्या कहना है और कैसे कहना है. वो किसी रट्टू तोते की तरह नहीं थे जो सिर्फ़ किसी और का कहा दोहरा रहे हों. उन्होंने इस पूरे मामले पर जानकारी हासिल की और फिर अपनी बात रखी.

जिस हॉल में जन-सुनवाई होनी थी वो कंपनी के नुमाइंदों और सरकारी अधिकारियों से भरा दिख रहा था.

कंपनी के लोग जहाँ प्रोजेक्ट के पक्ष में बात रखने के लिए थे वहीं एक बड़ी संख्या उन गाँववालों की थी जो इसके विरोध में थे.

जैसे ही मीटिंग शुरू हुई कंपनी का एक अधिकारी प्रोजेक्ट के बारे में बताने के लिए खड़ा हुआ लेकिन अंग्रेज़ी में.

कलेक्टर एम राजेंद्रन ने उन्हें तमिल में बोलने को कहा ताकि सारी बात सबको समझ आये.

जैसे ही उन्होंने इस प्रोजेक्ट के बारे में एक संक्षिप्त परिचय समाप्त किया, चारों तरफ़ से आपत्तियाँ सुनाई देने लगीं. अधिवक्ता पादुर रमेश ने जैसे ही प्रोजेक्ट को स्वागत योग्य बताया लोग उन पर चीखने लगे. बाद में कलेक्टर को लोगों को शांत रहने के लिए कहना पड़ा.

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तिरुवन्नामलाई कस्बे के लोग और गाँव वालों ने अपनी बात रखनी शुरू की. सभी इस प्रोजेक्ट के ख़िलाफ़ थे. लेकिन सबके पास अपने तर्क थे, अपनी बात थी और उस बात को रखने का अपना-अपना तरीक़ा था.

इनाम करियांदल गाँव के पूर्व सरपंच आर बदराचलम का कहना था, "बीस गाँवों के लोग उन पहाड़ियों पर निर्भर करते हैं. पहाड़ियों से हम सिंचाई के लिए पानी पाते हैं. वो अपने आप में पर्याप्त नहीं है लेकिन अगर आपने उन्हें भी नष्ट कर दिया तो क्या होगा. खुदाई के कारण जो गाद निकलेगा वो थुरिंजालारु नदीं में जाएगा. हवा, जमीन, पानी, मवेशी और यहाँ तक कि इंसान, सभी की सेहत पर बुरा असर होगा. हमें यह प्रोजेक्ट नहीं चाहिए."

कुछ लोगों को ज़मीन के बंजर हो जाने का भी डर था. एक महिला जो अब जीवित नहीं हैं, उन्होंने कहा था कि उनके परिवार का पालन-पोषण इन पहाड़ियों पर निर्भर करता है. अगर किसी को पहाड़ियों को काटना है तो वो पहले उन्हें ही काट दें.

इस जन-सुनवाई में कंपनी की ओर से गाँव वालों के लिए अस्पताल और उनके बच्चों के लिए स्कूल खोले जाने की बात की गई. लेकिन इस पर गाँव वालों की दलील थी कि "हमारी सरकार हमें स्कूल और अस्पताल दे रही है. आप क्यों हमें अस्पताल और स्कूल बनाकर देंगे. पहले आप हमें बीमार करेंगे और बाद में अस्पताल बनाकर देंगे?"

विरोध में उठी इन आवाज़ों ने जिला कलेक्टर को काफ़ी प्रभावित किया.

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कलेक्टर एम राजेंद्रन ने उस वक़्त कहा था, "मैंने आप सभी की चिंताओं को नोट कर लिया है और ख़ुद ध्यान से सुना भी है. इस पूरे प्रकरण की वीडियो रिकॉर्डिंग की गई है. मैं इसे निश्चित तौर पर सरकार को भेजूंगा. यह सरकार की नीति के तहत नहीं है कि लाखों पेड़ों को काट डाला जाये. यह एक न्यूट्रल कंसर्न है. कंपनी ने सरकार को माइनिंग के एक प्रोजेक्ट के लिए निवेदन किया था. बहुत से चरणों के बाद आज यह जन-सुनवाई के दौर में है. तमिलनाडु सरकार आपकी बातों और चिंताओं को एक किनारे करके किसी भी प्रोजेक्ट के लिए सहमति नहीं दे देगी."

कलेक्टर राजेंद्रन की रिपोर्ट देखने के बाद सरकार को भी यह समझ आया कि लोग क्या चाहते हैं.

हालांकि सरकार ने कोई त्वरित फ़ैसला नहीं लिया और इस मुद्दे को अपनी परिणति ख़ुद तय करने के लिए छोड़ दिया.

कलेक्टर राजेंद्रन ने गाँव वालों के बयानों की जो वीडियो रिकॉर्डिंग तैयार करवायी थी, उसके आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने सीईसी की नियुक्ति की और अंतत: जून 2009 में माइनिंग के आवेदन को ख़ारिज कर दिया गया.

इसके बाद कंपनी ने साल 2014 में नये सिरे से आवेदन किया. इस बार कंपनी की ओर से 23 हेक्टेअर आरक्षित वन क्षेत्र की माँग की गई. लेकिन इस बार विपक्ष काफ़ी मजबूती के साथ खड़ा था.

मैंने एम राजेंद्रन को संपर्क किया. वो फ़िलहाल तमिलनाडु को-ऑपरेटिव इलेक्शन कमिश्नर के पद पर हैं.

जब मैंने उनसे इस मामले के बारे में पूछा और जानना चाहा कि उनके ज़ेहन में इस मामले से जुड़ी क्या यादें शेष हैं तो उन्होंने माना कि 'सार्वजनिक बैठकें हर जगह सुचारू ढंग से नहीं होतीं.'

उन्होंने कहा, "कई बार ऐसा होता है कि लोगों को प्रोजेक्ट के बारे में पता भी नहीं होता और वो सहमति दे देते हैं और उसके बाद पछताते हैं. इसलिए जब वो मीटिंग हुई थी तो मैंने ये आश्वस्त करना ज़रूरी समझा था कि सभी को इस परियोजना के बारे में जानकारी हो."

सालेम के एक कार्यकर्ता पीयूष सेथिया ही वो पहले शख़्स थे जिन्होंने इन दोनों पहाड़ियों पर माइनिंग के बारे में लोगों को बताया था और जागरूक भी किया था.

वो कहते हैं, "ईआईए-2020 का जो ड्राफ़्ट प्रस्तावित है वो जन-सुनवाई को आवश्यक नहीं मानता."

साल 2008 में जब कार्यकर्ता इस परियोजना के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे थे तो कंपनी ने अपनी ओर से कई वादे किये. ज़्यादातर झूठे. गाँव वालों से कहा गया कि इस प्रोजेक्ट से दस हज़ार नौकरियाँ मिलेंगी. लेकिन जब कलेक्टर के सामने सुनवाई हुई तो पता चला कि सिर्फ़ 180 ही नौकरियाँ मिलेंगी.

जब से ईआईए-2020 का ड्राफ़्ट सामने आया है, तब से कहा जा रहा है कि ये सार्वजनिक सुनवाई के विकल्प को प्रभावित करेगा.

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