गुजरात पुलिस के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर इतनी पाबंदी क्यों?

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, अर्जुन परमार
- पदनाम, बीबीसी गुजराती संवाददाता
- प्रकाशित
गुजरात के पुलिस महकमे ने 20 जुलाई को पुलिसकर्मियों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल के लिए एक आचार संहिता जारी की थी.
पुलिस विभाग द्वारा जारी किए गए गाइडलाइंस में सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर कई तरह की सलाह दी गई है. साथ ही इस गाइडलाइन में क़ानूनी और विभागीय कार्रवाई का भी प्रावधान किया गया है.
यदि गुजरात पुलिस का कोई भी कर्मचारी सोशल मीडिया का उपयोग करते समय इस आचार संहिता में निर्धारित प्रतिबंधों का उल्लंघन करता है तो उसे क़ानूनी या विभागीय कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है.
ग़ौरतलब है कि हाल ही में गुजरात पुलिसकर्मियों के ग्रेड-पे को बढ़ाने के लिए सोशल मीडिया पर एक अभियान चलाया गया था.
इस घटना के बाद, राज्य पुलिस विभाग ने राज्य पुलिस बल में काम करने वाले पुलिसकर्मियों के लिए सोमवार को ये आचार संहिता जारी की.
इस पर एक नई बहस छिड़ गई है और ये सवाल उठने लगे हैं कि क्या पुलिस कर्मी सोशल मीडिया पर अपनी मांगें नहीं रख सकें, इसलिए तो ये दिशा-निर्देश जारी नहीं किए गए थे?

इमेज स्रोत, Getty Images
साथ ही, इस घटना के बाद ये भी कहा जाने लगा है कि क्या पुलिसकर्मियों को सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने का अधिकार नहीं है?
क्या उन्हें अपनी जायज़ मांगों को सरकार के सामने रखने का अधिकार नहीं है?
इस पर बीबीसी गुजराती ने कुछ विशेषज्ञों से चर्चा की है.
इन सभी सवालों के जवाब जानने से पहले, आइए जानते हैं कि आख़िर इन पुलिसकर्मियों के लिए इस गाइडलाइन में कौन-कौन सी बातें शामिल की गई हैं?

इमेज स्रोत, Getty Images
गाइडलाइन में क्या है?
पुलिस विभाग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों में आचार संहिता के पाँच प्रमुख मूल्य शामिल हैं.
जिनमें से पहला है पुलिसकर्मियों का अराजनैतिक और धर्मनिरपेक्ष होना.
इसके तहत, पुलिस अधिकारियों से कहा गया है कि वे राजनीतिक बयान नहीं देंगे और राजनीतिक पार्टियों की गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे.
पुलिसकर्मियों को ये भी कहा गया है कि वे इंस्टैंट मैसेजिंग ऐप पर धर्म, जाति, उपजाति या समाज के किसी विशेष वर्ग की वकालत करने के लिए बनाए गए समूह में शामिल न होंगे.
गाइडलाइन की दूसरी प्रमुख बात ये है कि पुलिसकर्मी ड्यूटी से जुड़ी बातों पर सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया नहीं देंगे. इसके तहत ड्यूटी के संबंध में सोशल मीडिया का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा. पुलिस विभाग या सरकार की आलोचना करने वाली सार्वजनिक टिप्पणियां पोस्ट नहीं की जाएंगी.
साथ ही, आधिकारिक उद्देश्यों के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करते समय व्यक्तिगत राय व्यक्त करने से बचने के लिए कहा गया है.
निजी उद्देश्यों के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करते समय पुलिसकर्मियों को भी सावधान रहने की सलाह दी गई है.
निजी उद्देश्यों के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करते समय, पुलिसकर्मी को ये स्पष्ट करना होगा कि गुजरात सरकार की गतिविधियों के बारे में कोई भी टिप्पणी आधिकारिक नहीं है, अर्थात् व्यक्तिगत है.

इमेज स्रोत, Getty Images
इसके बाद, सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए, उन्हें शिष्टाचार के मानकों का पालन करके विश्वास बनाए रखने के लिए कहा गया है ताकि वे अपने विभाग की प्रतिष्ठा को ख़तरे में न डालें.
इसके अलावा सोशल मीडिया के उपयोग के लिए सरकारी संसाधनों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया गया है.
अंत में सोशल मीडिया में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा के बारे में संयमित, उद्देश्यपूर्ण और विनम्र होने के लिए कहा गया है.

इमेज स्रोत, Getty Images
गाइडलाइंस की ज़रूरत क्यों?
दिशा-निर्देश जारी होने के बाद इसकी आवश्यकता के बारे में बात करते हुए, राज्य के वर्तमान पुलिस महानिदेशक शिवानंद झा ने मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और पुलिसकर्मियों को वेतन बढ़ोतरी के बारे में सोशल मीडिया पर पोस्ट करने और पुलिस विभाग की एकता को तोड़ने से परहेज़ करने की सलाह दी.
ये अटकलें तेज़ हो गई हैं कि ग्रेड-पे के मुद्दे पर जिस तरह से ऑनलाइन आंदोलन चलाया जा रहा था, ये गाइडलाइन उसी का नतीजा है.
शिवानंद झा ने कहा, "वर्तमान में, ग्रेड-पे बढ़ोतरी को लेकर पुलिसवालों को उकसाया जा रहा है. गुजरात पुलिस कॉन्स्टेबल कर्मियों का ग्रेड-पे बढ़ाने के लिए विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मुहिम चलाई जा रही है. इस तरह की गतिविधियों पर कड़ी नज़र रखी जा रही है. इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों की पहचान की जा रही है."
उन्होंने नियमों के उल्लंघन करने वालों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करने का दृढ़ संकल्प व्यक्त करते हुए कहा, "मैं पुलिस विभाग या ऐसी गतिविधियों में शामिल सभी बाहरी लोगों को सूचित करना चाहूंगा कि किसी भी परिस्थिति में झूठे, भ्रामक और दुर्भावनापूर्ण इरादे से पुलिसकर्मियों को इस तरह के उकसावे को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. वेतन वृद्धि की इस तरह की अनुचित बात कहकर पुलिसकर्मियों में असंतोष फैलाने की कोशिश को वर्दी की गरिमा पर हमला माना जाएगा और ऐसा करने वाले तत्वों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की जाएगी."
"मैं उन लोगों को याद दिलाता हूं जो वेतन वृद्धि के बारे में बात करते हैं कि सोशल मीडिया पर इस तरह की गतिविधि करना न केवल अनुशासन का उल्लंघन है, बल्कि एक आपराधिक कृत्य भी है. पुलिसकर्मियों को भ्रमित करना और उनकी एकता को तोड़ने का प्रयास करना न केवल अनुशासनहीनता का अपराध है, बल्कि पुलिस (इनसाइट टू डिसकशन) एक्ट, 1922 और कोरोना महामारी के मद्देनज़र आपदा प्रबंधन अधिनियम और महामारी रोग अधिनियम के तहत भी अपराध की श्रेणी में आता है. ड्यूटी से संबंधित किसी भी शिकायत को निर्धारित विभागीय प्रक्रिया के माध्यम से ही हल करना होगा."

इमेज स्रोत, Getty Images
क्या पुलिसकर्मी सरकारी नीति का विरोध कर सकते हैं?
राज्य में पुलिस कर्मियों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग के लिए एक आचार संहिता जारी करने से इस बात पर भी बहस छिड़ गई है कि क्या कोई सरकारी कर्मचारी सरकार या उसकी नीति के ख़िलाफ़ बोल सकता है? इस पर गुजरात राज्य सेवा (आचरण) नियम, 1971 में स्थिति स्पष्ट की गई है.
नियम 9 के अनुसार, कोई भी सरकारी कर्मचारी किसी भी रेडियो प्रसारण में या अपने नाम से प्रकाशित किसी भी लेख में या किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर या अख़बारों को भेजे गए पाठ में या सार्वजनिक भाषण में बयान नहीं दे सकता है.
इस संबंध में स्थिति और स्पष्ट करने के लिए हमने सेवानिवृत्त आईजीपी (महानिरीक्षक) आरजे सवानी से बात की.
उनका कहना है, "सेवा, अनुशासन और आचरण के कुछ नियम पुलिस सहित सभी सरकारी कर्मचारियों पर लागू होते हैं. इन नियमों के तहत, सरकारी सेवा में एक अधिकारी किसी भी तरह से सरकार या उसकी नीतियों की सार्वजनिक रूप से आलोचना नहीं कर सकता है. इन माध्यमों में सोशल मीडिया भी शामिल है."
हालांकि, एक सरकारी कर्मचारी अपनी वाजिब मांगों के लिए उपयुक्त प्राधिकारी से संपर्क कर सकता है. ये ज़रूरी है कि उसकी मांग सेवा संबंधी हो.

इमेज स्रोत, Getty Images
विभागीय प्रक्रिया के माध्यम से
क्या कोई पुलिसकर्मी अपनी वाजिब मांगों को सोशल मीडिया पर नहीं डाल सकता है?
पुलिस विभाग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के बारे में बात करते हुए आरजे सवानी ने कहा, "कर्मचारियों को अपनी उचित मांगों को पूरा करने के लिए एक विभागीय प्रक्रिया का पालन करना होगा. पहले तो आप उनसे बात करेंगे जो आपके ऑफ़िस के प्रमुख हों. किसी भी सरकारी कर्मचारी के लिए ये ज़रूरी है और इसमें पुलिसवाले भी शामिल हैं कि वे अपनी वाजिब मांगों के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करने से बचें. इसलिए मेरा मानना है कि ये नई आचार संहिता कर्मचारियों पर किसी विशेष नियंत्रण के लिए नहीं है. ये प्रतिबंध पहले से ही लागू हैं."
उन्होंने कहा, "सरकारी कर्मचारियों को अनुशासित रहने के लिए किसी भी तरह से उनकी सेवा संबंधी मुद्दों पर किसी भी माध्यम में बोलने का अधिकार नहीं दिया जा सकता है. भले ही ये ग्रेड-पे सुधार की बात क्यों न हो. स्थापित प्रक्रिया का पालन करना ज़रूरी है."
हालांकि गुजरात राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक आरबी श्रीकुमार इससे सहमत नहीं हैं.
वे कहते हैं, "सरकारी सेवा में कर्मचारी सार्वजनिक रूप से सरकार या उसकी नीतियों की आलोचना नहीं कर सकते, लेकिन वे अपनी सर्विस, सेवा की परिस्थितियों और सेवा की शर्तों, सुरक्षा, विशेषाधिकारों और सुविधाओं के बारे में सोशल मीडिया पर अपनी बात रख सकते हैं. अगर कोई सरकारी कर्मचारी ऐसी कोई मांग या कोई बात सोशल मीडिया पर शेयर करता है तो इस पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए."
हालांकि, मौजूदा डीजीपी शिवानंद झा ने भी ये कहा है कि ड्यूटी से संबंधित सभी शिकायतों को विभागीय प्रक्रिया के माध्यम से निपटाया जाना चाहिए.

इमेज स्रोत, Getty Images
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन?
दिशा-निर्देशों पर प्रतिक्रिया देते हुए गुजरात कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता मनीष दोशी ने कहा, "देश का संविधान अनुच्छेद 19 के तहत देश के प्रत्येक नागरिक को बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है. प्रत्येक नागरिक उचित प्रतिबंधों के तहत इस स्वतंत्रता का आनंद ले सकता है. इस प्रकार, सभी को अपने मन की बात कहने की स्वतंत्रता दी जाती है. दुर्भाग्य से, गुजरात में भाजपा सरकार लोगों के अधिकारों पर कुठाराघात कर रही है."
उन्होंने पुलिसकर्मियों के सामने आने वाली कठिनाइयों के बारे में बात करते हुए कहा, "पुलिस बल द्वारा सरकार को इसकी वाजिब मांग करने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई है. उनके अधिकारों, भुगतान-ग्रेड और सुविधाओं से जुड़ी मांगों को व्यक्त करने का कोई ज़रिया नहीं है. एक तरफ, किसी की मांगों को पेश करने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है और जब एक पुलिसकर्मी अपने अधिकारों के लिए बोलता है, तो सरकार आचार संहिता के नाम पर उस पर दबाव बनाने की कोशिश करती है. यदि सरकार संविधान में विश्वास करती है, तो उसे सरकारी कर्मचारियों सहित सभी नागरिकों के अधिकारों को बरकरार रखना चाहिए."
कोरोना महामारी के बंद के दौरान गुजरात पुलिस के योगदान को याद करते हुए, उन्होंने कहा, "ये सरकार का कर्तव्य है कि गरिमा के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करने और सिस्टम में अपना विश्वास बढ़ाने के लिए कदम उठाने के लिए वे उन्हें वित्तीय लाभ और सुविधाएं प्रदान करें, जिसके वे पात्र हैं. हालांकि, सरकार उन्हें अधिक काम देती है और उन्हें वाजिब मुआवज़ा नहीं देकर उनके साथ अन्याय करती है."
उन्होंने पुलिस कर्मियों की कार्य स्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा, "कांग्रेस पार्टी विधान सभा में एक प्रस्तुति देगी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि नागरिकों के रूप में पुलिस कर्मियों के अधिकारों को बरकरार रखा जाए, उन्हें वे लाभ मिलें जिनके वे हकदार हैं और उनके साथ न्याय हो."
उन्होंने कहा, "सरकारी विभाग में विभागीय अनुशासन के नियम हैं और प्रत्येक अधिकारी और कर्मचारी को उनका पालन करना चाहिए, लेकिन अनुशासन के नाम पर सरकार अपनी मनमानी नहीं करे."
उन्होंने यह भी कहा कि यह सुनिश्चित करना सरकार की ज़िम्मेदारी थी कि पुलिसकर्मियों की गरिमा बनी रहे और उनका मनोबल न गिरे.
मनीष दोषी के अनुसार, सरकार क़ानून तोड़ने वालों के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि क़ानून लागू करने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करती है, जिससे राज्य पुलिस बल का मनोबल गिरता है.

इमेज स्रोत, Getty Images
सत्ता पक्ष क्या कहता है?
सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर गुजरात पुलिस के लिए जारी दिशा-निर्देशों पर प्रतिक्रिया देते हुए, गुजरात बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता भरत पंड्या ने कहा, "किसी भी कर्मचारी को विभाग, संविधान और नियमों का पालन करना चाहिए. जैसे सिविल कोड होता है, वैसे ही कर्मयोगी कोड भी होना चाहिए, हर किसी को उचित फोरम में अपना प्रतिनिधित्व और मांग करने का अधिकार हो सकता है, लेकिन विभाग के अनुशासन और नियमों को ध्यान में रखना चाहिए. सभी की अपनी भावनाएं सच्ची ही लगती हैं, लेकिन उसे ज़ाहिर करने का तरीक़ा अनुशासित होना चाहिए."
ग्रेड-पे की समस्या के समाधान का सुझाव देते हुए उन्होंने कहा, "वित्त मंत्रालय, विभाग और सरकार की सामान्य नीति को समन्वित किया जाना चाहिए और एक उचित समाधान ढूंढा जाना चाहिए."
सोशल मीडिया और गुजरात पुलिस
हाल ही में, गुजरात पुलिस कॉन्स्टेबल कैडर के कर्मचारियों के ग्रेड-पे में सुधार की मांग के लिए सोशल मीडिया पर #2800 गुजरात पुलिस अभियान चलाया गया था. इस अभियान को कई सोशल मीडिया यूजर्स ने समर्थन दिया, जिन्होंने इससे संबंधित पोस्ट शेयर किए. ट्विटर पर मांग के समर्थन में सैकड़ों ट्वीट भी किए गए.
इससे पहले, सूरत पुलिस की कॉन्स्टेबल सुनीता यादव और गुजरात सरकार के मंत्री कुमार कनानी के बेटे के बीच विवाद सोशल मीडिया पर फैल गया था.
घटना का वीडियो इतना वायरल हुआ कि ख़बर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो गई.
इससे पहले, कुछ स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अहमदाबाद में वाडज इलाक़े के पुलिस इंस्पेक्टर जेए राठवा ने कर्फ़्यू के दौरान निकल रही एक धर्मगुरु की कार को रोका था और उन पर कार्रवाई की थी. जिसके बाद उनका तबादला कर दिया गया. इसके बाद पुलिसकर्मियों ने अपने व्हॉट्सऐप स्टेटस में उनकी तस्वीर लगाकर उनके पक्ष में एकजुटता दिखाई थी.
इस प्रकार, पिछले कुछ दिनों में कई बार पुलिसकर्मियों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग किया गया था.
ये देखना बाक़ी है कि पुलिस विभाग द्वारा जारी ये दिशा-निर्देश पुलिस के मुद्दों को लेकर एक मंच के रूप में सोशल मीडिया के उपयोग को कम करने में कितना प्रभावी होते हैं?
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)






















