भारत-चीन सीमा तनाव: भारतीय सैनिकों ने इन समझौतों के कारण नहीं उठाए हथियार?

विदेश मंत्री जयशंकर ने हथियार न उठाने के कारण बताए
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    • Author, शुभम किशोर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

15-16 जून की रात गलवान घाटी में भारत और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक संघर्ष हुए, जिसमें 20 सैनिकों की मौत हो गई. भारतीय सेना के मुताबिक़ चीन के सैनिकों ने कील लगे लोहे की रॉड से हमला किया.

इस मामले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो बयान भी आया जिसमें उन्होंने कहा था, ‘’भारतीय सैनिक मारते-मारते मरे हैं.’’

लेकिन इन सबके बीच एक ख़बर ने सभी को हैरान कर दिया है कि चीन के हमले का जवाब देने के लिए भारतीय सैनिकों ने हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसपर सवाल उठाया और पूछा कि भारतीय सेना को बिना हथियार के चीनी सैनिकों के पास किसने भेजा था?

जवाब में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बताया कि गलवान घाटी में भारत-चीन सीमा पर तैनात भारतीय जवानों के पास हथियार थे लेकिन चीन से समझौतों के तहत उन्होंने हथियार का इस्तेमाल नहीं किया.

भारतीय सैनिक

उन्होंने ट्विटर पर लिखा, ''सीमा पर तैनात सभी जवान हथियार लेकर चलते हैं. ख़ासकर पोस्ट छोड़ते समय भी उनके पास हथियार होते हैं. 15 जून को गलवान में तैनात जवानों के पास भी हथियार थे. लेकिन 1996 और 2005 में हुई भारत-चीन संधि के कारण लंबे समय से ये प्रक्रिया चली आ रही है कि फ़ेस-ऑफ़ के दौरान जवान फ़ायरआर्म्स (बंदूक़) का इस्तेमाल नहीं करते हैं.''

किस समझौते का हवाला दे रहे हैं विदेश मंत्री?

चीनी सैनिक

जिस समझौते का ज़िक्र विदेश मंत्री जयशंकर कर रहे हैं, उसपर 29 नवंबर 1996 को दोनों देशों ने हस्ताक्षर किए थे. समझौता इस बात पर ज़ोर देता है कि “दोनों ही पक्ष एक-दूसरे के ख़िलाफ़ किसी तरह की ताक़त का इस्तेमाल नहीं करेंगे या इस्तेमाल की धमकी नहीं देंगे या सैन्य श्रेष्ठता हासिल करने की कोशिश नहीं करेंगे.”

समझौते के पहले अनुच्छेद में लिखा है – “दोनों में से कोई भी देश दूसरे के ख़िलाफ सैन्य क्षमता का इस्तेमाल नहीं करेगा. एलएसी के दोनों तरफ़ पर तैनात कोई भी सेना, अपनी सैन्य क्षमता के तहत दूसरे पक्ष पर हमला नहीं करेगी या किसी तरह की ऐसी सैन्य गतिविधि में हिस्सा नहीं लेगी, न ही ऐसा करने की धमकी देगी, जिससे भारत-चीन के सीमावर्ती इलाक़ों में शांति और स्थिरता को ख़तरा हो.”

समझौते के जिस हिस्से का ज़िक्र जयशंकर कर रहे हैं, वो अनुच्छेद 6 में है. इसके मुताबिक़, “एलएसी के दो किलोमीटर के दायरे में कोई भी पक्ष गोलीबारी, जैविक हथियार, हानिकारक केमिकल का इस्तेमाल, ब्लास्ट ऑपरेशन या बदूंक़ों और विस्फोटकों से हमला नहीं करेगा.”

इससे पहले चीन के साथ साल 1993 में भी एक समझौता हुआ था. समझौते के मुताबिक़, “दोनों ही पक्षों का मानना है कि भारत-चीन के बीच सीमा विवाद शांतिपूर्ण और दोस्ताना बातचीत से हल किया जाएगा. कोई भी पक्ष ताक़त का इस्तेमाल नहीं करेगा, या इस्तेमाल की धमकी नहीं देगा.”

इसके बाद साल 2005 में हुए समझौते में 1993 और 1996 के समझौतों की कई बातों को दोहराया गया.

क्या संधि हथियारों के इस्तेमाल से पूरी तरह रोकती है?

नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग

दोनों देशों के बीच हुए समझौतों से ये तो स्पष्ट है कि किसी भी देश को हथियार का इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं है, लेकिन क्या उस स्थिति में भी ये नियम लागू होते हैं, जब हमला सामने से हुआ हो, जैसा कि इस मामले में भारतीय सेना दावा कर रही है?

बीबीसी ने रिटायर्ट मेजर जनरल अशोक के मेहता से बात की. उनके मुताबिक़, “अगर आप पर हमला हुआ है, अगर कोई घात लगाए बैठा है और आप पर पत्थरों से हमला कर रहा हैं, तो आप अपनी सुरक्षा पत्थर फेंक कर नहीं करेंगे. वहाँ मौजूद कमांडर को ये फ़ैसला लेना है कि जो नियम हैं उनको आत्मरक्षा में तोड़ना चाहिए या नहीं. अगर कमांडर नहीं बचे, तो सेकेंड-इन-कमांड को आदेश देना चाहिए. आत्मरक्षा के लिए आप हथियार का इस्तेमाल कर सकते हैं.”

मेहता के मुताबिक़ जिन समझौतों की बात जयशंकर कर रहे हैं, वो चीन पहले ही तोड़ चुका था, “आमतौर पर बॉर्डर विवाद के दौरान बैनर निकाल दिए जाते हैं. इस मामले में कोई बैनर डिस्प्ले नहीं किया गया, शाम का समय था और वो घात लगा कर बैठे थे, इसका मतलब है कि सीमा समझौता उनकी तरफ़ से पहले ही तोड़ा जा चुका था.”

मेहता आगे बताते हैं, “लेकिन हमें ये नहीं पता है कि वहाँ के हालात क्या थे. कितने लोग ऊपर थे, कितने नीचे थे, कितने पानी में गिर गए थे. हमें ये नहीं पता कि वो लोग गोली चलाने की स्थिति में थे भी या नहीं. जो हमला करता है उसके पास एडवांटेज होता है.”

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार एसडी मुनि कहते हैं, “अगर एक डंडे का भी इस्तेमाल हुआ है, तो समझौते का उल्लंघन है. जब तक पूरा ब्यौरा नहीं मिले कि दोनों तरफ़ से किस तरह के फ़ोर्स का इस्तेमाल हुआ है, किसने इसका ज़्यादा उल्लंघन किया है, ये बताना मुश्किल है. लेकिन इतने सैनिकों की जान जाना कोई आम बात नहीं है. ये बात सही है कि जान बचाने के लिए हथियार उठाए जा सकते हैं. अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल ये कहता है कि अगर आपको ख़ुद को बचाना हो तो आप हथियार का इस्तेमाल कर सकते हैं.”

इन समझौतों का भविष्य क्या है?

मुनि कहते हैं, “अगर भारत सरकार मानती है कि समझौता टूटा है तो चीन से नए सिरे से इन समझौतों पर बात करनी चाहिए, भारत सरकार को चीन से पूछना चाहिए कि वो दोनों देशों के बीच विश्वास बढ़ाने के लिए क़दम उठाना चाहता है या नहीं.”

इसके अलावा मुनि का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर के दूसरे मंचों पर भारत को चीन से जुड़े दूसरे भी मुद्दे उठाने चाहिए.

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