कोरोना से लड़ती, केक पहुंचाती और लोगों को संभालती भारत की पुलिस

- Author, विकास पांडेय
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
- प्रकाशित
पुलिस इंस्पेक्टर मुनीश प्रताप सिंह रात के 10 बजे अपनी ड्यूटी शिफ़्ट पूरी करने वाले थे तभी उनके पास एक लाचार पिता का फ़ोन आया.
पिता ने पुलिस इंस्पेक्टर से अनुरोध करते हुए कहा, "क्या आप मेरे बेटे के लिए बर्थडे का केक ला सकते हैं? आज उसका बर्थडे है और वह बेहद उदास है."
इन दिनों इंस्पेक्टर मुनीश के पास ऐसे अनुरोध भी आ रहे हैं और यह सब उनके लिए एक अलग ही अनुभव है. रात के 10 बजे इलाके की सभी दुकानें बंद हो चुकी थीं फिर उन्होंने केक बनाने वाले अपने एक परिचित को फ़ोन किया. अच्छी बात यह थी कि केक मिल गया.
मुनीश प्रताप सिंह ने बताया, "इस केक को देखकर बच्चा बेहद खुश था. मैं और मेरे साथी उसकी खुशी देखकर अपनी थकान भूल गए."
इंस्पेक्टर सिंह की तरह दूसरे पुलिसकर्मी भी इस तरह के अनुरोधों को पूरा कर रहे हैं, जिसमें बच्चों और बुज़ुर्गों के जन्मदिन पर केक पहुंचाने से लेकर बेघरों को खाना मुहैया कराना और ज़रूरतमंदों को दवाइयां पहुंचाना तक शामिल है.
इतना ही नहीं, लोगों का उत्साह बढ़ाने और उनका मनोरंजन करने के लिए पुलिसवाले बॉलीवुड के लोकप्रिय गाने गाते भी नज़र आए हैं. ऐसे पुलिसवालों के वीडियो सोशल मीडिया पर खूब शेयर हुए हैं और कई जगहों पर लोगों ने पुलिसकर्मियों पर फूल भी बरसाए हैं.

एकदम नई छवि
पुलिसवालों की यह छवि कुछ महीने पहले की छवि से बिलकुल अलग है. तब पुलिसवालों की छवि लाठियां बरसाने वाले भ्रष्ट लोगों की थी जिन पर मानवाधिकार मामलों के उल्लंघन के भी आरोप भी लगे थे.
बहरहाल, कोरोना महामारी के इस दौर में दिल जीत लेने वाले तमाम नेक काम पुलिस वालों की आधी कहानी ही बयां करते हैं.
दरअसल, इन नेक कामों के अलावा कोरोना से लड़ने वाले फ्रंटलाइन योद्धा के तौर पर पुलिस वाले प्रतिबद्धता के साथ अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा कर रहे हैं.
पुलिसकर्मी इन दिनों कई मोर्चे पर डटे हुए हैं- वो लॉकडाउन लागू कराने से लेकर कोरोना संक्रमित मरीज़ के संपर्क में आए लोगों की पहचान कर रहे हैं. चेक पॉइंट्स पर लोगों की चेकिंग के साथ-साथ अस्पताल, क्वारंटीन सेंटर और कंटेनमेंट ज़ोन जैसी जोख़िम वाली जगहों पर सुरक्षा मुहैया करा रहे हैं.
इन सबके साथ वो कोरोना को लेकर आम लोगों के मन में आ रहे डर को भी दूर करने की कोशिश कर रहे हैं.
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ख़तरे से जूझते हुए
उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह के मुताबिक़ पुलिसकर्मियों को इन कामों की कभी ट्रेनिंग नहीं मिली है.
उन्होंने कहा, "उन्हें तो केवल कानून और शासन व्यवस्था कायम रखने की ट्रेनिंग मिलती है. महामारी और मेडिकल सुरक्षा के प्रोटोकॉल की ट्रेनिंग तो कभी नहीं हुई. इस लिहाज़ से देखें तो तमाम चुनौतियों के बीच वे शानदार काम कर रह हैं."
पुलिसवाले, ख़ासकर फ़ील्ड में ड्यूटी कर रहे कमतर रैंक वाले अधिकारी रोज़ाना ढेरों लोगों के संपर्क में आते हैं और ऐसे एक्सपोज़र से कोरोना संक्रमित होने का ख़तरा ज़्यादा होता है.
महाराष्ट्र में एक हज़ार से ज़्यादा पुलिसकर्मी कोरोना संक्रमित हुए हैं और अब तक चार पुलिसकर्मियों की मौत भी हुई है. दिल्ली में अब तक 100 से ज़्यादा पुलिस कोरोना संक्रमित हुए हैं और एक कॉन्स्टेबल की कोरोना से मौत हुई है.
मृतक कॉन्स्टेबल के परिवार में उनकी पत्नी और एक बेटा है. बेटा भी कोरोना संक्रमित है. भारत के दूसरे राज्यों से भी ऐसी रिपोर्टें देखने को मिल रही हैं.

'पुलिसवाले भी इंसान ही हैं..'
इंस्पेक्टर मुनीश प्रताप सिंह के मुताबिक संक्रमण का डर तो होता ही है.
वो कहते हैं कि संक्रमण रोकने के तरीक़े से कई बार मुश्किलें हो जाती हैं. वो उन इलाकों का उदाहरण देते हैं जहां कोरोना के एक से ज़्यादा मामले हैं. ऐसे इलाक़ों को कंटेनमेंट ज़ोन में तब्दील किया गया है.
मुनीश नोएडा में तैनात हैं और उनके इलाके में कई कंटेनमेंट ज़ोन हैं. पुलिस अधिकारी के तौर पर उनकी ड्यूटी यह सुनिश्चित करना है कि केंटेनमेंट ज़ोन से ना तो कोई बाहर निकले और ना ही कोई अंदर जाए.
इस काम में काफ़ी सावधानी बरतनी होती है.
मुनीश प्रताप सिंह ने बताया, "कंटेनमेंट ज़ोन में रहने वाले लोग भी हालात से ऊब जाते हैं और उनमें से कुछ पुलिसवालों से बहस करने लगते हैं. लेकिन हमें धैर्य बनाए रखना होता है. पुलिसकर्मियों को भी संक्रमण की चपेट में आने का ख़तरा होता है. लेकिन मेरे साथियों में से किसी ने नौकरी नहीं करने की बात नहीं सोची है. इस चुनौती के सामने हम पीठ नहीं दिखा सकते. मैं नहीं डरता हूं, ऐसा कहूं तो यह झूठ ही होगा."
कई पुलिसकर्मी अपने परिवार से दूर रह रहे हैं ताकि अगर ख़ुद संक्रमित हो जाएं तो घर वाले सुरक्षित रहें.
कॉन्स्टेबल विक्रांत राणा और पंकज चौधरी दो महीनों से अपने घर नहीं गए हैं. मोबाइल फ़ोन पर अपने परिवारवालों की तस्वीरें दिखाते दिखाते उनकी आंखें नम हो जाती हैं.
कांस्टेबल विक्रांत राणा ने कहा, "मैं जानता हूं कि पुलिसवालों को कठोर होना चाहिए लेकिन हम लोग भी इंसान हैं. लंबे समय से परिवार से नहीं मिल पाए हैं. प्रार्थना यही है कि हम यह युद्ध जल्दी जीतें."

नोएडा के एक दूसरे चेक प्वाइंट पर मेरी मुलाकात कॉन्स्टेबल ध्रुव तोमर से हुई. फरवरी महीने से उन्होंने एक साल के अपने जुड़वां बच्चों को नहीं देखा है.
उन्होंने कहा, "मैं उनके बारे में सोचने से ख़ुद को रोक नहीं पाता हूं. बहुत जल्दी मिलने भी नहीं जा पाऊंगा. चेक पोस्ट पर रोज़ाना सैकड़ों कार और बाइक रोकनी होती हैं. हमें यह भी पता नहीं होता है कि कौन संक्रमित है और कौन नहीं. मेडिकल टीम को तो कम से कम मालूम होता है कि वे संक्रमित मरीज़ से डील कर रहे हैं या नहीं. हमें तो बिना जानकारी के लोगों से डील करना होता है."
पुलिसवाले भी मास्क और ग्लव्स पहनते हैं लेकिन तेज़ धूप में आठ घंटे तक सड़कों पर खड़ा रहना काफ़ी थकाने वाला होता है.
यही वजह है कि कर्नाटक में तैनात रहे पूर्व पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) गोपाल होसुर पुलिसकर्मियों के ड्यूटी के समय को कम करने का सुझाव देते हैं.
उनके मुताबिक़ महमारी के दौर में पुलिसकर्मियों पर मनोवैज्ञानिक असर से इनकार नहीं किया जा सकता है, इसलिए पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को अपने अधीनस्थ कर्मियों का ख्याल रखना चाहिए.
उन्होंने कहा, "एक तरीक़ा यह हो सकता है कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी नियमित तौर पर फ़ील्ड में जाएं और फ़ील्ड टीम से मिलें. इससे फ़ील्ड टीम में यह संदेश जाएगा कि मुश्किल वक्त में वे अकेले नहीं हैं."

गोपाल होसुर ऐसे वक्त में पुलिस अधिकारियों को गोपनीयता के साथ काउंसलरों की मदद मुहैया कराने का सुझाव देते हैं ग़ाज़ियाबाद ग्रामीण के पुलिस अधीक्षक नीरज जादौन भी इस सुझाव से सहमत हैं.
नीरज जादौन ने बताया, "मैं अपनी टीम के अधिकांश सदस्यों से हर रोज़ मिलता हूं और उनकी मुश्किलों को सुनता हूं. यह चुनौती लंबे समय तक रहेगी ऐसे में ज़रूरी है कि सारा पुलिस बल एक टीम के तौर पर काम करे."
पुलिस के काम का सीधा असर पुलिस और जनता के भरोसे पर भी दिखा है. भारत में पुलिस पर बल प्रयोग, भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगते रहे हैं. इस वक्त दुनिया में सबसे सख्त लॉकडाउन भारत में लागू है और इसे लागू कराने के लिए पुलिसबल को ढेरों अधिकार दिए गए हैं.
कुछ जगहों पर पुलिस ने इन अधिकारों का बेजा इस्तेमाल किया है, लोगों को मारा पीटा है. इसके अलावा पुलिसकर्मियों पर छोटे दुकानदारों और वेंडरों को भी प्रताड़ित करने के आरोप लगे हैं.
लेकिन सिंह के मुताबिक़ ये छिटपुट घटनाएं हैं. वे कहते हैं, "कुल मिलाकर, लोगों ने पुलिस पर भरोसा और सम्मान करना शुरू कर दिया है."
ऐसे में सवाल यह है कि बदलाव कैसे हुआ?

गोपाल होसुर के मुताबिक़ पुलिस और आम लोगों के बीच हमेशा से भरोसे की कमी रही है लेकिन इस महामारी ने पुलिसवालों के मानवीय चेहरे को उभारने में मदद की है.
उन्होंने कहा, "इस वक़्त मुश्किल में आए हर शख्स के लिए पहला कॉन्टेक्ट पर्सन पुलिसकर्मी ही हैं. पुलिसवाले शिफ्ट से लंबी ड्यूटी कर रहे हैं. एकजुटता के सेवा भाव की मिसाल पेश कर रहे हैं."
गोपाल होसुर के मुताबिक़ इस वक़्त राजनेताओं के आदेशों में स्पष्टता के चलते भी मदद मिल रही है.
उन्होंने कहा, "अक्सर पुलिसकर्मियों को राजनीतिक दबाव में काम करना होता है, इसका असर उनके काम पर भी पड़ता है. लेकिन इस बार उनका मिशन स्पष्ट है और उसमें किसी का कोई दखल नहीं है."
लेकिन यह बदलाव कब तक बना रहेगा?
केरल के पूर्व पुलिस प्रमुक जैकब पुन्नोज ने बताया कि उन्हें इसके बने रहने की उम्मीद तो है. उनके मुताबिक़ कोरोना महामारी की मुश्किल जल्दी समाप्त होने वाली नहीं है.
उन्होंने बताया, "सामुदायिक पुलिस का यह नया विचार कब तक रहता है, ये देखना दिलचस्प होगा."

पुलिस को अधिकांश राज्यों में ऊंचे अपराध दर की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. इसके अलावा क़ानून व्यवस्था को लागू कराने के साथ वीआईपी लोगों को सुरक्षा भी मुहैया कराने की ज़िम्मेदारी भी पुलिस निभाती है.
इन चुनौतियों के बीच पुलिसकर्मियों की संख्या बेहद कम है. एक रिपोर्ट के मुताबिक़ प्रति एक लाख भारतीयों पर 144 पुलिसकर्मी तैनात हैं. इसलिए सामुदायिक पुलिस व्यवस्था की बहुत गुंजाइश नहीं है.
जैकब पुन्नोज के मुताबिक़ महामारी ने यह दिखाया है कि पुलिस और आम लोग मिलकर ना केवल काम कर सकते हैं बल्कि किसी भी चुनौती से पार पा सकते हैं.
उन्होंने कहा, "आप पुलिसकर्मियों की बॉडी लैंग्वेज देखिए. इन दिनों अधिकांश आपको विनम्र दिखेंगे. पुलिस को आम लोगों का सहयोग भी मिल रहा है."
पुन्नोज के मुताबिक़, सामुदायिक पुलिस की यह व्यवस्था के जारी रहने की संभावना वरिष्ठ अधिकारियों पर निर्भर है.
उन्होंने कहा, "इस महामारी से उन्हें अहम सबक सीखने होंगे और भविष्य के लिए एक पुलिस बल को तैयार करना होगा."
सिंह इससे एक कदम आगे जाने का सुझाव देते हैं. उनके मुताबिक़ महामारी का प्रबंधन, वरिष्ठ अधिकारियों को एक सब्जेक्ट के तौर पर पढ़ाया जाना चाहिए.
सिंह ने बताया, "इस समय तो हम लोगों को बहुत जानकारी नहीं थी. लेकिन अब तक हमने अच्छा किया है. लेकिन अगली बार के लिए हमें तैयार रहने की ज़रूरत है."
"अगर हम ऐसा नहीं कर पाए तो हालात फिर से पहले जैसे हो जाएंगे. इतनी मेहनत और त्याग सब बेमतलब हो जाएंगे. हमने बेहद मुश्किल से यह भरोसा हासिल किया है और हमें यह इतनी आसानी से जाने नहीं देना चाहिए."

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