डर और असुरक्षा के बीच कैसी है एक आशा वर्कर की ज़िंदगी

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- Author, चिंकी सिन्हा
- पदनाम, कांधला, शामली
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 21 मिनट
शनिवार की सुबह धुंधले फूलों वाले मास्क से मुंह ढंके, एप्रन पहने और टोपी के अंदर अपने बालों को समेटे हुए मेडिकल ऑफ़िसर अमरीश तोमर भागती हुई आती हैं. शामली के कांधला में गुलाबी रंग में पुते हुए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के अंदर वह तेज़ी से दाख़िल होती हैं.
गांव में वापस लौटे लोगों की पड़ताल
वह कहती हैं कि उन्हें दो गांवों की आशा वर्कर्स से जानकारी मिली है कि पिछले दो दिनों में कम से कम दो प्रवासी यहां वापस लौटकर आए हैं. उन लोगों को ख़ुद को आइसोलेशन में रहने की सलाह दी गई थी. लेकिन, वह वहां पर उनका तापमान लेने और दूसरे ब्योरे दर्ज करने पहुंची हैं. तोमर की निगरानी में इलाके में 24 गांव आते हैं.

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली ज़िले में शुरुआत में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों के 17 मामले सामने आए थे.
बाद में ऐलान किया गया कि यह संख्या महज 13 ही है.
स्वास्थ्य केंद्र के परिसर में एक बड़ा बिलबोर्ड लगा हुआ है.

इस बिलबोर्ड पर कोरोना वायरस से बचने के लिए क्या सावधानियां रखी जानी चाहिए, इस बीमारी के क्या लक्षण होते हैं और स्वास्थ्य अधिकारियों के कॉन्टैक्ट नंबर लिखे हुए हैं.
शनिवार की सुबह यहां ज्यादा मरीज़ नहीं थे. शायद संक्रमण का डर लोगों को उनके घरों में रोके हुए था. एक डॉक्टर ने कहा कि उनके पास हमारे सवालों के जवाब देने का वक्त नहीं है.

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कांधला क्यों हुआ मशहूर?
कांधला. यह एक छोटा सा कस्बा है जो कि मेरठ से करीब 80 किमी दूर है. मुज़फ्फ़रनगर से इस कस्बे की दूरी महज 16 किमी है.
हालांकि, कांधला कोरोना वायरस महामारी की जद से बचा हुआ है, लेकिन यह कस्बा इस्लामिक सुधारवादी आंदोलन तब्लीग़ी जमात के मुखिया मुहम्मद साद का घर होने की वजह से ख़बरों में छाया हुआ है. यहां पर मुहम्मद साद का एक शानदार, लंबा-चौड़ा फार्महाउस है.
तब्लीग़ी जमात मार्च में दिल्ली में अपने हेडक्वार्टर निज़ामुद्दीन में लोगों को इकट्ठा करने की वजह से सुर्ख़ियों में बना हुआ है.
डॉक्टरों और सुविधाओं के अभाव में देश का रूरल हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर कोविड-19 को संभालने के लिए तैयार नहीं हैं. आशा वर्कर्स और दूसरे सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के नेटवर्क का इस्तेमाल इस महामारी के बारे में लोगों को जानकारी देने और इससे संक्रमित संदिग्धों को ट्रैक करने में किया जा रहा है. लेकिन, कोरोना के ख़िलाफ़ इस जंग में सबसे आगे खड़े होकर लड़ने वाले इन वर्कर्स का कहना है कि उन्हें खुद को बचाने के लिए पर्याप्त सुरक्षा नहीं दी जा रही है.
इनका कहना है कि घर-घर जाकर लोगों को ट्रैक करने के लिए सर्वे करना और संक्रमण को फैलने से रोकना उनके काम में शामिल है और इस तह से वे जोखिम के दायरे में आते हैं.

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काम में जोखिम बढ़ा
पहले ठीकठाक चल रहा तोमर का कामकाज अचानक से ख़तरनाक हो गया है. ऐसे वक्त पर जबकि एक बड़ी महामारी का दौर चल रहा है, वह प्रोटेक्टिव गीयर के अभाव से जूझ रही हैं और इसने उनके काम को और जोखिमभरा बना दिया है.
मरीज़ों के संपर्क में आने के चलते लाखों हेल्थकेयर वर्कर्स कोरोना वायरस से संक्रमित होने के ख़तरे का रोज़ाना सामना करते हैं.
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के बाहर एक युवा लड़का एक ठेले पर एक बुज़ुर्ग शख़्स को ला रहा था, इस शख़्स के चेहरे पर काला कपड़ा लिपटा हुआ था. उत्तर प्रदेश के इस हिस्से में इन दिनों गलियों में एक भुतहा शहर जैसा सन्नाटा पसरा हुआ है.
वह बताती हैं कि यह एक टाइम बॉम्ब जैसा है. शामली को 2011 में एक जिला बना दिया गया था. लेकिन, डॉक्टरों और सुविधाओं के अभाव में यहां के जिला अस्पताल में कोई काम नहीं होता है.
हालांकि, जिला अस्पताल के निर्माण का काम 2015 में शुरू हो गया था, लेकिन बाद में यह बजट के मसलों में फंस गया. इसे मार्च 2020 में बनकर तैयार हो जाना था.

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नाकाफी हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर
जिला अस्पताल के न होने से मरीज़ों को मेरठ या मुज़फ्फ़रनगर भेजना पड़ता है. यहां तक कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में भी जनरल सर्जन, फ़िजीशियन, कार्डियोलॉजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट जैसे ट्रेन्ड लोग नहीं हैं.
इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड गाइड में कहा गया है कि हर जिला अस्पताल में चार डॉक्टर, दो फ़िजीशियन, दो सर्जन, दो ऑर्थोपेडिक सर्जन, एक ईएनटी सर्जन, एक डेंटिस्ट, दो महिला डॉक्टर, एक पैथोलॉजिस्ट, दो बाल विशेषज्ञ, दो एक्स-रे डॉक्टर, 20 स्टाफ़ नर्स, 12 वॉर्ड बॉय, छह सफाईकर्मी समेत अन्य प्रोफ़ेशनल्स होने चाहिए.
2011 के जनगणना के मुताबिक, कांधला नगर पालिका परिषद की आबादी 46,796 है.

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सुरक्षा उपकरणों का अभाव
पर्सनल प्रोटेक्टिव गीयर अभी भी या तो सबको नहीं मिल पा रहे या फिर इन्हें पूरी तरह से अपनाया नहीं गया है. इसकी वजह से ऐसे लोगों के लिए कोविड-19 से लड़ाई में सबसे अग्रिम पंक्ति में खड़े हुए योद्धाओं के लिए यह लड़ाई बेहद जोखिमभरी हो गई है. तोमर कहती हैं कि यह एक रेस्पिरेटरी बीमारी है जो कि संक्रमण फैलाती है और जिसके बारे में हम अभी तक सबकुछ नहीं जानते हैं.
तोमर अपने बैग में एक छोटा प्लास्टिक बॉक्स रखती हैं. इस बॉक्स में उनके पास दो स्टरलाइज्ड मास्क रहते हैं. इनमें से एक एन95 और एक सर्जिकल मास्क है.
वह कहती हैं, 'ये केवल इमर्जेंसी के लिए हैं. मैंने यह अपने पैसों से खरीदे हैं.' पूरे देश में डॉक्टर पीपीई और यहां तक कि सैनिटाइज़र्स की कमी की शिकायत कर रहे हैं. इन डॉक्टरों का कहना है कि उनसे शहीद होने के लिए कहा जा रहा है.

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लॉकडाउन के जरिए हेल्थ इंफ्रा बढ़ाने की कोशिश
शहरों से लोगों का अपने गृह जिलों, गांवों और कस्बों में वापस आने का सिलसिला मार्च से शुरू होकर अप्रैल में भी जारी रहा है. मार्च के आखिर में सरकार ने देशभर में लॉकडाउन लागू करने का ऐलान कर दिया था.
सरकार की मंशा इस कोरोना वायरस महामारी को लोगों में फैलने से रोकने, इसके संक्रमितों की पहचान कर उनका इलाज करना, संदिग्धों को क्वारंटीन और आइसोलेशन में रखने और इस तरह से इसके संक्रमितों की संख्या पर लगाम लगान की रही है. इसके लिए लॉकडाउन लागू करने का फैसला किया गया. लेकिन, लॉकडाउन के ऐलान के बाद से ही देशभर में बड़े शहरों से लोगों का अपने गांव-कस्बों में पलायन शुरू हो गया.
सरकार की मंशा यह भी थी कि लॉकडाउन की अवधि का इस्तेमाल देश में हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने में किया जाए. देश वेंटिलेटर्स और इमर्जेंसी मेडिकल केयर में इस्तेमाल होने वाले इक्विपमेंट की बड़ी कमी से जूझ रहा है. कोरोना के मामलों में इन संसाधनों की खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में बड़े पैमाने पर जरूरत पड़ने के आसार हैं.
शामली जिले में एक भी वेंटिलेटर नहीं है. मरीज़ों को मुज़फ्फ़रनगर जाना पड़ता है जो कि 16 किमी दूर है. मुज़फ्फ़रनगर के जिला अस्पताल में अब 14 वेंटिलेटर बेगराजपुर और दो जिला महिला अस्पताल से आ गए हैं.

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पल्स पोलियो अभियान की तर्ज पर काम
मुज़फ्फ़रनगर के चीफ़ मेडिकल ऑफिसर डॉ. प्रवीण चोपड़ा कहते हैं कि चुनौतियां जरूर हैं मगर वे पहले से इसके लिए तैयार हैं. वह कहते हैं कि उन्होंने 1995 में लॉन्च हुए पल्स पोलियो अभियान के मॉडल को इस मामले में भी अपनाया है.
पोलियोमाएलाइटिस एक बेहद संक्रामक वायरल बीमारी है जो कि बच्चों पर हमला करती है. पल्स पोलियो अभियान के तहत राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने रैपिड रेस्पॉन्स टीमें बनाईं ताकि वे देश में पोलियो के किसी भी मामले से निपट सकें.
किसी खास इलाके पर कम्युनिटी वर्कर्स के काम करने के इस माइक्रो प्लान ने असर दिखाना शुरू किया और भारत 2011 तक पोलियो से पूरी तरह से मुक्त हो गया.
उन्होंने कहा, 'हमने कंटेनमेंट जोन्स की पहचान की है.' मुज़फ्फ़रनगर में कोविड-19 के 19 मामले थे.
वह कहते हैं, 'हमारे सामने कई तरह की चुनौतियां हैं. लोगों में काफी डर है. वे दूसरी सभी बीमारियों को भूल गए हैं. पैनिक का माहौल है और हमारा वर्कलोड बढ़ गया है.'
सहारनपुर और मेरठ की सीमाएं मुज़फ्फ़रनगर से लगती हैं. इन जिलों में कोरोना वायरस के मामलों में तेजी देखी गई है.
वह कहते हैं, 'हम घिरे हुए हैं. हमें और ज्यादा सजग रहना होगा. सीमाएं सील की जा चुकी हैं और हमारे पास कम्युनिटी हेल्थ वर्कर्स हैं जो कि घर-घर जाकर सर्वे और स्क्रीनिंग कर रहे हैं.'

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ग्रामीण इलाकों में डॉक्टरों का अभाव
तोमर बताती हैं कि कांधला में अभी तक कोरोना का कोई मामला सामने नहीं आया है, लेकिन कमजोर रूरल हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टाफ़ की कमी के चलते कई समस्याएं हैं. ऐसे में अगर संक्रमण किसी तरह से यहां फैलना शुरू होता है तो इसे संभालना मुश्किल हो जाएगा.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि हर 1,000 लोगों पर कम से कम 22.8 डॉक्टर और नर्सें होनी चाहिए. हालांकि, भारत में सभी राज्यों और शहरी-ग्रामीण इलाकों में आबादी के हिसाब से डॉक्टरों और नर्सों का कम अनुपात कोरोना वायरस के दौर में और भी चिंताजनक हो गया है.
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ पब्लिक हेल्थ (आईआईपीएच), गुड़गांव की कराई एक स्टडी के मुताबिक, देश की 71 फीसदी आबादी के ग्रामीण इलाकों में मौजूद होने के बावजूद इन इलाकों में डॉक्टरों औऱ नर्सों का अनुपात क्रमशः 34 फीसदी और 33 फीसदी है. सर्वे के मुताबिक, 80 फीसदी से ज्यादा डॉक्टर और 70 फीसदी पैरामिक्स निजी सेक्टर में काम करते हैं.

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हेल्थकेयर की तीन स्तरीय व्यवस्था
नेशनल रूरल हेल्थ मिशन (एनआरएचएम) के तहत, भारत के गावों में हेल्थकेयर एक त्रिस्तरीय संरचना है. इसमें उपकेंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र आते हैं.
2011 की जनगणना के मुताबिक, देश के छह बड़े शहरों- दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, हैदराबाद और बेंगलुरु में प्रवासियों की तादाद कुल नागरिकों की 48 फीसदी है.
आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के मुताबिक, कम से कम 60 फीसदी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) में केवल एक डॉक्टर ही है जबकि करीब 5 फीसदी पीएचसी ऐसे हैं जहां एक भी डॉक्टर नहीं है.
देश में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की 22 फीसदी कमी है. दूसरी ओर, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) की 30 फीसदी कमी है. इनकी सबसे ज्यादा कमी वाले राज्यों में पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान और मध्य प्रदेश आते हैं.

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गांवों में पसरा है सन्नाटा
कार धूलभरी सड़क पर दौड़ पड़ी. रास्ते पर दोनों तरफ गन्ने के खेत और चिमनियों से धुंआ फेंकते ईंट भट्ठे दिखाई दे रहे हैं.
पहला ठिकाना किवाना गांव के प्रधान का घर था. यहां पर आशा वर्कर्स को तोमर और 24 साल के प्रवीण चौधरी से मिलने बुलाया गया था. चौधरी एक कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर हैं जिन्होंने अप्रैल में ही ज्वॉइन किया है.

दोपहर में यहां सन्नाटा पसरा हुआ है. यहां तक कि सड़कों और गलियों में कुत्ते भी नहीं भौंक रहे हैं.
53 साल की तोमर 1993 में शादी के बाद कांधला आई थीं. सात साल बाद वह कम्युनिटी हेल्थ सेंटर से जुड़ गईं. वह कहती हैं कि वह सावधानियां बरतती हैं, ऐसे में उन्हें डर नहीं लगता.
वह कहती हैं, 'हमें काम करते रहना चाहिए.' इस इलाके में हालात में सुधार आया है. पिछले साल यहां का आठवां सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जसाला गांव में बनकर तैयार हो गया. इस सेंटर का उद्घाटन इसी अप्रैल में होना था, लेकिन महामारी के हालात देखते हुए यह सेंटर शुरू नहीं हो पाया. यह एक 30 बेड वाला अस्पताल है.

लेकिन, तोमर समस्याओं को नहीं गिनाना चाहतीं.
वह कहती हैं, 'मैं खामियों का जिक्र नहीं करना चाहती क्योंकि इससे मनोबल कमजोर पड़ सकता है. यह सब आसान नहीं रहा है. लोग सहयोग नहीं करते हैं और उन्हें इस बात का डर रहता है कि कहीं उन्हें क्वारंटीन सेंटर न भेज दिया जाए.'

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जोखिम के चलते सेल्फ-आइसोलेशन की मजबूरी
तोमर की निगरानी में 24 गांव आते हैं. चूंकि, वह ऐसे लोगों के संपर्क में आती हैं जिनके संक्रमित होने का संदेह होता है, ऐसे में वह खुद को सेल्फ-आइसोलेट कर चुकी हैं.
उनके तीन बड़े बच्चे हैं जो कि उन्हें काफी सपोर्ट करते हैं. जब लॉकडाउन शुरू हुआ और उन्होंने गांवों का दौरा शुरू किया, तब उन्होंने अपना सामान एक अटैच्ड टॉयलेट वाले कमरे में रख लिया. इस कमरे में आने का एक अलग दरवाजा है. उन्होंने इस कमरे में रहना शुरू कर दिया.

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वह बताती हैं, 'इसमें एक कांच की खिड़की है और मैं अपने कमरे से टेलीविजन देख सकती हूं साथ ही अपने परिवार को भी देख सकती हूं.' उनका खाना कमरे के बाहर रख दिया जाता है. कई बार वह अपनी बेटियों के गले लगने के लिए बेकरार हो जाती हैं.
शनिवार को उनकी लिस्ट में चार गांवों का दौरा शामिल है. इस तरह के दौरों में वह अपना खाना साथ रखती हैं. जानकारियां साझा करने के लिए बनाया व्हॉट्सएप ग्रुप
किवाना के प्रधान शिव कुमार 60 साल के हैं. वह अपने गांव में बाहर से आने वाले लोगों की जानकारी देने को लेकर काफी सक्रिय हैं.
लॉकडाउन के लागू होने के बाद कांधला ब्लॉक के 35 गांवों के प्रधानों और जिला प्रशासन का एक व्हॉट्सएप ग्रुप तैयार किया गया. इसके जरिए जानकारियों का आदान-प्रदान किया जाता है. इनमें संक्रमण के मामले, खाद्य आपूर्ति जैसी जानकारियां होती हैं. किवाना गांव की आबादी करीब 6,000 है.
शिव कुमार बताते हैं, 'इससे हमें खुद को अपडेट रखने में मदद मिलती है.'

उनके पास ही 31 साल की पिंकी देवी बैठी हैं. वह अपना चेहरा ढके हैं. पिंकी इस गांव की एक आशा वर्कर हैं और सर्वे और स्क्रीनिंग का काम करती हैं.
इन सभी को शुरुआत में एक मास्क दिया गया था. तब ये लोग सर्वे कर रहे थे. लेकिन, अब ये चेहरा ढकने के लिए अपने मास्क बना रहे हैं या फिर अपना दुपट्टा इस्तेमाल कर रहे हैं. इसी तरह से ये गांव में दौरे कर रहे हैं और पता कर रहे हैं कि हाल-फिलहाल में कोई गांव में वापस तो नहीं लौटा है. ये ऐसे वापस लौटे लोगों की जानकारी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में देने के लिए कहते हैं. ये वर्कर्स लोगों को अपने हाथ अच्छी तरह से और बार-बार धोने, एक-दूसरे से दूरी रखने समेत दूसरी जानकारियां भी देते हैं ताकि कोरोना से बचाव हो सके.

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बार-बार उन्हीं सवालों से चिड़चिड़ा जाते हैं लोग
एक दिन में चार आशा वर्कर्स की टीम 50 घरों का सर्वे करती है.
वह कहती हैं, 'हम दरवाजों को नहीं छूते हैं. अगर घर में कोई अलग कमरा नहीं है तो हम लोगों को गांव के स्कूल में खुद को क्वारंटीन करने के लिए कहते हैं.'
वह बताती हैं, 'हम बार-बार उन्हीं चीजों को दोहराते हैं और इससे कई बार लोग चिड़चिड़ा जाते हैं. हमें लोगों से पूछना पड़ता है कि उन्हें बुखार या सर्दी-खांसी तो नहीं है. लेकिन, मुझे पता है कि मेरा काम कितना अहम है.'

तोमर के साथ ये लोग देवेंदर मलिक के घर पर पहुंचते हैं. मलिक 50 साल के हैं और दो दिन पहले ही बिहार के भागलपुर से किवाना लौटे हैं. वहां वह काम करते थे.
वह घर पर नहीं थे. बाद में वह आए और उन्होंने बताया कि वह अपने खेतों पर गए थे. लेकिन, तोमर ने कहा कि उन्हें खुद को आइसोलेट करने की सलाह दी गई थी. शनिवार को उनका तापमान 97.5 डिग्री फारेनहाइट निकला.

मलिक ने कहा, 'मुझमें किसी तरह के लक्षण नहीं नजर आ रहे हैं.' पिंकी, रविता और सुनीता- तीनों आशा वर्कर्स ने कमरे के बाहर खड़े होकर उन्हें पूरे निर्देश दोबारा बताए.
अगला पड़ाव रामपुर खेरी था. वहां आशा वर्कर्स ने बताया था कि दो लोग पंजाब और दिल्ली से हाल में ही वापस लौटकर आए हैं.

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भट्ठे के मजदूरों की सुध लेने वाला कोई नहीं
रास्ते में ईंट के भट्ठे दिखे, लेकिन यहां कोई आशा वर्कर या मेडिकल ऑफिसर जाने की जहमत नहीं उठाता. इन लोगों को पीडीएस जैसी किसी भी स्कीम का फायदा नहीं मिलता है. कुछ वर्कर्स ने कहा कि वे सामान्य के मुकाबले ज्यादा पैसे देकर राशन का सामान खरीदते हैं. लेकिन, इनके पास इसका कोई विकल्प नहीं है.
यूपी के प्रतापगढ़ के राम किशन पिछले 10 साल से चौधरी ईंट भट्ठे पर काम कर रहे हैं.

30 साल के राम किशन बताते हैं, 'हमें इस बीमारी के बारे में पता है. हम एक-दूसरे से दूरी बनाए रखने की कोशिश करते हैं. लेकिन, यहां कोई भी हमारा हालचाल पूछने नहीं आता है.'
गांव में 36 साल की मंजू गोस्वामी एक घर के बाहर तोमर का इंतजार कर रही हैं.

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क्वारंटीन का पोस्टर
30 साल के जॉनी 24 अप्रैल को पंजाब के होशियारपुर से गांव वापस लौटे हैं. उन्हें गांव तक आने में तीन दिन का वक्त लगा क्योंकि वह पंजाब से साइकिल से वापस आए हैं. जॉनी होशियारपुर में एक गुड़ बनाने के कारखाने में काम करते थे. लॉकडाउन लागू के बाद उनके पास काम नहीं था. भूख और बेरोजगारी से कई दिन तक लड़ने के बाद आखिरकार उन्होंने यह लंबा सफर साइकिल से पूरा करने की ठानी.

स्क्रीनिंग के बाद उनके घर के बाहर एक पोस्टर चिपका दिया गया. इस पोस्टर पर लिखा था कि इस घर में एक शख्स क्वारंटीन में है.
अगला घर 22 साल के मोहित गिरी का था. मोहित 22 अप्रैल को दिल्ली से लौटे हैं. उनके साथ भी वही प्रक्रिया अपनाई गई और आशा वर्कर्स ने उन्हें भी घर पर ही रहने के लिए कहा.
30 साल की मोनिका एक आशा वर्कर हैं. वह चार से यह काम कर रही हैं. अपने काम में मौजूद जोखिम के बावजूद उन्हें खुद पर गर्व है.
वह कहती हैं, 'हम लोगों में जागरूकता फैला रहे हैं. हम गांव और शहर के बीच का लिंक हैं. हम कोरोना के खिलाफ यह जंग जीतकर रहेंगे.'
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बड़ी जिम्मेदारी, लेकिन बेहद कम मानदेय
औसतन एक आशा वर्कर को 2,000 से 3,000 रुपये महीना मिलता है. कोरोना वायरस महामारी के इस वक्त में सरकार उन्हें 1,000 रुपए अतिरिक्त मुहैया करा रही है जो कि मोटे तौर पर 33 रुपये रोज़ाना के हिसाब से बैठता है.
इन्हें स्थायी कर्मचारी नहीं माना जाता है. इसके बावजूद आंकड़े तैयार करने और जमीनी स्तर पर घर-घर जाकर काम करने के लिहाज से ये आशा वर्कर्स प्रशासन की सबसे अहम कड़ी होते हैं.
आमतौर पर एक आशा वर्कर किसी गर्भवती महिला का पूरा ब्योरा रखती है. इसके अलावा, बच्चों के जन्म से लेकर किसी शख्स की मौत होने जैसे सभी रिकॉर्ड्स इन्हें ही दर्ज करने और आगे पहुंचाने होते हैं. आशा वर्कर्स समुदाय और हेल्थ केयर मैनेजमेंट के बीच का एक माध्यम बन गई हैं. कोरोना वायरस की महामारी के दौर में इन्हें हर दिन 5-6 घंटे तक फ़ील्ड में रहना पड़ता है.

एक तरफ मेडिकल ऑफ़िसरों को 50,000 रुपये महीना मिलता है, वहीं आशा वर्कर्स को इसका 10 फीसदी भी नहीं दिया जाता है. ऐसा तब है जबकि आशा वर्कर्स के जमीनी स्तर पर रिपोर्ट्स लाए बगैर मेडिकल अफ़सरों के लिए काम करना तकरीबन नामुमकिन है.
लोगों को स्टांप लगाना और उन्हें क्वारंटीन करने के काम भी आशा वर्कर्स के ही हवाले हैं. इसका मतलब यह भी है कि उन्हें लोगों के सबसे ज्यादा विरोध और असहयोग का सामना करना पड़ता है.
तोमर कहती हैं कि कुछ इलाकों में तो आशा वर्कर्स को काम करने की इजाजत ही नहीं है क्योंकि लोग समझते हैं कि सरकार इनके जरिए एनआरसी लिस्ट के लिए उनका ब्योरा निकलवाना चाहती है.
ग्रामीण इलाकों में हर 1,000 लोगों पर एक आशा वर्कर काम कर रही है. शहरी इलाकों में यह अनुपात हर 15,000 लोगों पर एक आशा वर्कर का है.
35 साल की मुर्शिदा बेगम एक आशा वर्कर हैं. वह कांधला देहात में काम करती हैं. वह कहती हैं, 'हमें केवल एक मास्क दिया गया था. 15-17 अप्रैल के बीच हमने कोरोना से संबंधित सर्वे किया था और अब हम मॉनिटरिंग का काम कर रहे हैं.'
मुर्शिदा बेगम को हर महीने 2,000 रुपये मिलते हैं. वह कहती हैं, 'हमारा काम बढ़ गया है. हमारे पास मास्क नहीं हैं. लोग हमसे मास्क मांगते हैं. वे दवाइयों की मांग करते हैं. हमें कई दफ़ा डर भी लगता है और हम एकसाथ जाते हैं. कोरोना वायरस महामारी की ख़बर से हम भी डरे हुए हैं. अभी तक हम 100 घरों का सर्वे कर चुके हैं.'
सुनीता कुमारी भी आशा वर्कर हैं. वह बताती हैं कि शुरुआत में वे बिना मास्क लगाए ही बाहर चली जाती थीं क्योंकि उन्हें काफी बाद में मास्क दिए गए.
न्यू इंडिया एश्योरेंस को हेल्थ इंश्योरेंस स्कीम को लागू करने का जिम्मा सौंपा गया है. कंपनी ने एक पॉलिसी डॉक्युमेंट बनाया है जिसमें कहा गया है कि मरीजों को देखने और उनका इलाज करने के दौरान कोविड-19 महामारी के संपर्क में आने के चलते पैदा होने वाले कॉम्प्लिकेशंस की वजह से होने वाली मौत को इसमें कवर किया गया है. यह दस्तावेज 30 मार्च को जारी किया गया है. लेकिन, इस स्कीम में बीमार होने को कवर नहीं किया गया है.
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गांवों में कोविड-19 की पूरी जिम्मेदारी आशा वर्कर्स के हवाले
सरकार ने कोविड-19 के संक्रमितों का पता लगाने के लिए सामुदायिक स्तर पर स्क्रीनिंग और ट्रेसिंग का काम सामुदायिक हेल्थ वर्कर्स यानी आशा के हवाले किया है.
देश के अलग-अलग राज्यों ने 9 लाख से ज्यादा आशा वर्कर्स को कोविड-19 के काम पर लगाया है. इन आशा वर्कर्स को निर्देश दिया गया है कि वे लोगों को इस वायरस के बारे में शिक्षित करें, लोगों में मौजूद संक्रमण के लक्षणों को चेक करें और लोगों को कोविड-19 से बचने के लिए ली जाने वाली सावधानियों के बारे में बताएं. इसके अलावा इन्हें ऐसे लोगों के बारे में जानकारियां भी इकट्ठा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है जो कि कोरोना वायरस से प्रभावित देशों से यात्रा कर भारत लौटे हैं या फिर दूसरे राज्यों से होकर आए हैं.
आशा वर्कर्स को हेल्थकेयर डिलीवरी सर्विसेज के परफ़ॉर्मेंस के आधार पर इंसेंटिव दिया जाता है. मसलन, किसी गर्भवती महिला को डिलीवरी के लिए साथ में अस्पताल लेकर जाने के लिए इन्हें 300 रुपये मिलते हैं. इसके अलावा गर्भधारण करने से बचाने वाली कॉन्ट्रासेप्टिव डिवाइस लगवाने के लिए किसी महिला को ले जाने के काम के इन्हें 150 रुपये मिलते हैं. इस तरह के इंसेंटिव्स के अलावा इन्हें 2,000 से 4,000 रुपये महीना मानदेय भी मिलता है. यह रकम राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के हिसाब से अलग-अलग है.
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देश में हैं करीब 9 लाख आशा वर्कर्स
सरकार की ओर से प्रेशर के चलते डॉक्टर और दूसरे हेल्थकेयर स्टाफ हेल्थकेयर सिस्टम में मौजूद खामियों के बारे में बात करने से बचते दिखाई दिए हैं.
नेशनल रूरल हेल्थ मिशन (एनआरएचएम) को 12 साल पहले लॉन्च किया गया था. इस मिशन के तहत ही देशभर में करीब 9 लाख आशा वर्कर्स काम कर रही हैं. इनमें से ज्यादातर आशाएं अपने राज्यों में न्यूनतम तनख्वाह के मानक से भी कम पर काम कर रही हैं. हालांकि, इन्हें अलग-अलग तरह के काम करने के लिए अलग से इंसेंटिव्स दिए जाते हैं.
महाराष्ट्र में पुणे के पास एक गांव वाल्हे में रहने वाली 32 साल की रोहिणी पवार एक आशा वर्कर हैं.
पवार को अपने काम की वजह से गांववालों के लांछन का सामना करना पड़ रहा है. पिछले साल अक्टूबर में उनके इलाके की आशा वर्कर्स ने बेहतर मानदेय दिए जाने के लिए मोर्चा खोल दिया था.

इस साल मार्च में कोरोना की महामारी के दस्तक देने के साथ ही पवार जैसी तमाम आशा वर्कर्स को सर्वे और दूसरे काम करने की जिम्मेदारी सौंप दी गई. लेकिन, तब इनके पास मास्क तक नहीं थे. 2 अप्रैल को वीडियो कॉल के जरिए इन्हें ट्रेनिंग दी गई. इस ट्रेनिंग में इन्हें इनको क्या जानकारियां इकट्ठी करनी हैं और कैसे काम करना है इसके बारे में बताया गया. इन्हें सवालों की लिस्ट दी गई जो कि सर्वे के वक्त इन्हें लोगों से पूछने होते हैं. क्या आपके घर किसी दूसरी जगह से कोई आया है? अगर हां तो उनका नंबर दीजिए और उनके लक्षण बताइए, जैसी जानकारियां इन्हें जुटानी हैं.
पवार बताती हैं, 'अगर हमें कोई लक्षण दिखाई देता है तो हम इन नामों को ग्राम पंचायत को देते हैं. हमें हर दिन 30 घरों का सर्वे करना होता है. इसका मतलब है करीब 100 लोग रोजाना. पिछले दो महीने से हम लगातार सर्वे कर रहे हैं. मेरे पास 1,500 लोग हैं जबकि सरकार का कहना है कि हर आशा वर्कर को 1,000 लोगों का सर्वे करना है.'
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समुदाय और परिवार के अवरोध
जब उन्होंने 15 मार्च को काम शुरू किया तो उन्हें चार सिंगल-यूज़ मास्क जिला अस्पताल की ओर से मिले थे. इसके अलावा इन्हें एक मास्क ग्राम पंचायत की ओर से और दो बोतल सैनिटाइजर भी दिए गए थे.
वाल्हे में कई प्रवासी मजदूर पुणे और मुंबई से वापस लौटे हैं. यह फसल कटाई का सीजन होता है और इस वजह से लोग अपने घर वापस आते हैं. लोग दिनभर खेतों में काम करते हैं और इसके चलते पवार को कई बार रात में जाकर सर्वे करना होता है क्योंकि उसी वक्त लोग खेतों से वापस आ चुके होते हैं और अपने घरों में मिलते हैं.
पवार कहती हैं, 'मैं अपने पति को साथ ले जाती हूं.' अपने समुदाय से उनके संबंध बिगड़ गए हैं क्योंकि लोगों को लगता है कि आशा वर्कर्स उनकी ख़बर सरकार को दे रही हैं और उन्हें क्वारंटीन सेंटरों में भेज रही हैं.
पवार ने फ़ोन पर बताया, 'हमें काफी डर लगता है. हम पर घर का बहुत दबाव है. सभी आशा वर्कर्स को इस चीज से चिंता हो रही है. हम काम भी नहीं छोड़ सकते. लेकिन, यह हमारे लिए जोखिमभरा है. हमारी जिंदगी दांव पर लगी हुई है. हर रोज़ हमें रोज़ाना के आंकड़े बताने होते हैं. हमने अपने लिए खुद ही मास्क बनाए हैं.'
उन्हें अपने परिवार के ताने सुनने पड़ते हैं. इनमें कहा जाता है कि वह जरा के पैसों के लिए किलोमीटरों चलती हैं और अपनी जिंदगी को जोखिम में डालती हैं.
वह कहती हैं, 'मैं अपने बेटे को भी नहीं छू सकती. मेरा तीन साल का बेटा है.'
पवार ने 2010 में काम शुरू किया था, उस वक्त उन्हें 100 रुपये महीना मिलते थे. यहां तक कि अभी भी उन्हें मिलने वाला मानदेय नाकाफी है. लेकिन, वह कहती हैं कि यह वक्त शिकायतों का नहीं है क्योंकि लोगों की जिंदगियां बचाने की जिम्मेदारी ज्यादा बड़ी है.
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टेस्टिंग का दायरा बढ़ाया गया
इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने शुरुआत में कोविड-19 की टेस्टिंग केवल के दायरे में केवल ऐसे लोग रखे थे जो कि अंतरराष्ट्रीय ट्रैवल करके भारत लौटे हैं. इसके अलावा इसमें ऐसे लोग भी शामिल किए गए थे जिनका संक्रमितों के साथ संपर्क हुआ था.
बाद में 20 मार्च को आईसीएमआर ने टेस्टिंग का दायरा बढ़ा दिया. इसमें बुखार और सर्दी-खांसी और बुखार और सांस लेने में दिक्कत जैसी गंभीर रेस्पिरेटरी इंफेक्शन वाले अस्पताल में भर्ती मरीजों को भी शामिल कर लिया गया.
केंद्र सरकार के लॉकडाउन का ऐलान करने के तुरंत बाद ही बड़े शहरों से मजदूरों का पलायन अपने गांव-देहात की ओर शुरू हो गया था.
उत्तर प्रदेश में राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने निर्देश जारी किया कि हर जिले का पंचायती विकास विभाग उन्हें दूसरे शहरों से वापस लौटे लोगों की सूची मुहैया कराए.
इन सूचियों को फिर हर जिले के मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी को और फिर उनके जरिए आशा वर्कर्स को भेजा गया ताकि वापस लौटे ऐसे मजदूरों को ट्रैक किया जा सके.
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व्यापक स्वास्थ्य प्रोग्राम
सितंबर 1978 में भारत ने अल्मा अता डिक्लेयरेशन पर दस्तखत किए थे. इस डिक्लेयरेशन का मकसद साल 2000 तक सबको स्वास्थ्य मुहैया कराना था. इसमें हेल्थकेयर को स्वास्थ्य के अन्य पहलुओं के साथ शामिल किया गया था. साथ ही देशों से कहा गया था कि वे शिक्षा, सैनिटेशन, न्यूट्रिशन, स्वच्छ जल की आपूर्ति, महिला और बाल स्वास्थ्य और क्यूरेटिव केयर को पूरी आबादी को उपलब्ध कराएं.
इस मिशन के तहत हेल्थ प्रोफ़ेशनल्स के जरिए आम लोगों तक जानकारियां पहुंचाने और उन्हें जागरुक बनाने के काम को अहमियत दी गई. इस काम में सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मचारियों (सीएचडब्ल्यू) या विलेज हेल्थ वर्कर्स को शामिल करने पर जोर दिया गया था. इन्हें आबादी आधारित स्वास्थ्य रणनीति के एक अहम अंग के तौर पर माना गया था.
सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से शोध कर रहीं कविता भाटिया बताती हैं, 'भारत में पब्लिक हेल्थकेयर का विस्तार हुआ है और यह आज हर गांव और झुग्गी-झोंपड़ी तक पहुंच गया है. इसकी वजह यह है कि हमारे यहां सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मचारियों के रूप में दुनिया की सबसे बड़ी महिला आबादी काम कर रही है.' भाटिया के काम का फोकस हेल्थ वर्कर्स प्रोग्रामों पर है और वह डब्ल्यूएचओ की अगुवाई वाले समूहों का हिस्सा रही हैं.
देश में 27 लाख आंगनवाड़ी कार्यकत्री और आंगनवाड़ी सहायिकाएं काम कर रही हैं. ये कर्मचारी समेकित बाल विकास योजना (इंटीग्रेटेड चाइल्ड डिवेलपमेंट स्कीम) के तहत आते हैं. एक्रेडिटेड सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट प्रोग्राम के तहत 8.7 लाख रूरल एक्रेडिटेड सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट्स (आशा) काम कर रही हैं. शहरी इलाकों में इनका नाम अर्बन सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट्स यानी ऊषा है. ऊषाएं झुग्गियों और मलिन बस्तियों में काम करती हैं. इन सभी को मिलाकर सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मियों की संख्या 10 लाख और बढ़ जाती है.
आशा प्रोग्राम की शुरुआत 2005 में हुई थी. ये आशाएं ग्रामीण इलाकों में महिला और बाल स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा और दूसरी कई तरह की सेवाओं को मुहैया कराती हैं. देश के त्रिस्तरीय हेल्थकेयर सिस्टम में ये सबसे आगे के मोर्चे पर मौजूद स्वास्थ्य कर्मी हैं.
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आंगनवाड़ी वर्कर्स की भी सेवाएं ली जा रहीं
आंगनवाड़ी वर्कर्स को किसी सामाजिक सुरक्षा या पेंशन के लाभ के बगैर हर महीने एक तयशुदा रकम दी जाती है. दूसरी ओर, आशा वर्कर्स को हर महीने टास्क आधारित इंसेंटिव्स मिलते हैं.
आशा वर्कर्स के साथ ही केंद्र ने ग्रामीण इलाकों में कोरोना वायरस के फैलने की स्थिति में आंगनवाड़ी वर्कर्स और ऑग्ज़िलियरी नर्स मिडवाइफ्स (एएनएम) को भी ट्रेनिंग दी है.
18 मार्च को सरकार ने एक आदेश दिया कि हालांकि एडब्ल्यूसी का काम 31 मार्च तक निलंबित रहेगा, लेकिन पंजीरी या पौष्टिक लड्डू जैसे सप्लीमेंटरी न्यूट्रीशन का वितरण 19 मार्च से फिर से शुरू कर दिया जाएगा. इसका मकसद यह है कि पौष्टिक आहार के वितरण का जो काम देशभर में चल रहा है उसके लाभार्थियों को कोई दिक्कत न हो. सप्लीमेंटरी न्यूट्रिशन में 315 ग्राम पंजीरी और 330 ग्राम के एक पैकेट में 12 लड्डू दिए जाते हैं.
कोरोना वायरस महामारी के चलते स्कूल बंद हैं और इस वजह से बच्चों को मिड-डे मील भी नहीं मिल पा रहा था. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया. राज्यों ने निर्देश दिया कि आंगनवाड़ी वर्कर्स बच्चों को मिड-डे मील भोजन उपलब्ध कराएं. समेकित बाल विकास सेवाएं (आईसीडीएस) 1975 से चल रही हैं.
मीना गोस्वामी 38 साल की हैं और एक आंगनवाड़ी वर्कर हैं. वह रामपु खेरी में काम करती हैं. उनका कहना है कि इस वक्त उनका काम काफी अहम हो गया है.
वह कहती हैं, 'अगर हम साथ मिलकर काम करें तो शायद हम वायरस को हरा सकते हैं.'
लेकिन, एक एक्टिविस्ट अकरम अकबर चौधरी बताते हैं कि तमाम योजनाओं के बावजूद गांवों में स्वास्थ्य की स्थिति बेहद चिंताजनक है.
वह कहते हैं, 'लॉकडाउन की वजह से दूसरी बीमारियों के शिकार लोगों को इलाज नहीं मिल पा रहा है. हमारे इलाके में टीबी के मरीजों की बड़ी तादाद है. ज्यादातर निजी अस्पताल बंद हैं.'
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अच्छी खबर और अगले जोखिमभरे दिन का इंतजार
गांवों में सन्नाटा सा पसरा हुआ है और डर साफ दिखाई दे रहा है. तोमर और सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मचारियों को आने वाले दिनों में और ज्यादा काम करना होगा क्योंकि दूसरे शहरों से बड़ी संख्या में मजदूरों की वापसी होने वाली है.
लेकिन, इस पूरी अनिश्चितता और डर के बीच एक अच्छी खबर भी है. कैराना में श्री बालाजी आईटीआई कॉलेज में तब्लीग़ी जमात के 28 सदस्यों को क्वारंटीन किया गया था. यहां ड्यूटी दे रहे एक शिक्षक कासिम शाह उपस्थिति दर्ज करने और यह सुनिश्चित करने का काम करते हैं कि कोई क्वारंटीन के नियमों को न तोड़े. वह बताते हैं कि सभी 28 लोगों के टेस्ट नेगेटिव हैं और जल्द ही इन्हें घर जाने की इजाजत मिल जाएगी.
उस रात शायद तोमर अपने शीशे की खिड़की वाले कमरे में लौटी होंगी. बाकी लोग भी अपने घरों को लौट चुके होंगे. इन्हें एक और मुश्किल अगले दिन का इंतजार होगा. इन्हें उम्मीद होगी कि उन्हें मास्क मिलेंगे और उनके काम को पहचाना जाएगा. साथ ही उन्हें उम्मीद है कि वे इस महामारी और अपने काम के बीच में जीवित भी बचा पाने में सफल होंगे.

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