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कोरोना वायरसः मुंबई में डब्बावाले ने लगाई रोक, नहीं मिलेगा टिफ़िन
- Author, राहुल रणसुभे
- पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
- प्रकाशित
डब्बावाला रोहिदास सावंत कहते हैं, "डब्बेवालों के पास मुंबई लोकल के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नहीं है. कोरोना की वजह से लोकल से घूमते वक़्त मुझे डर लगता था लेकिन मजबूरी होने के कारण हमको ये काम करना ही पड़ता है. एक भी ग्राहक कम हुआ तो हमारा हज़ार रुपये का नुकसान होता है."
चौबीसों घंटे खुले रहने वाली मुंबई के लोगों को टिफ़िन पहुंचाने वाले मुंबई के डब्बेवालों के मन में कोरोना वायरस का डर बैठ गया है.
सरकार के आदेशानुसार पहले ही सभी स्कूल, कॉलेज बंद कर दिए गए हैं. बहुत लोक 'वर्क फ्रॉम होम' कर रहे हैं. डब्बावालों की सेहत का ध्यान रखते हुए इसके यूनियन ने भी 31 मार्च तक टिफ़िन बंद करने का फ़ैसला किया है.
बीबीसी मराठी ने यह जानने की कोशिश की डब्बावालों पर इस फ़ैसले का क्या असर पड़ेगा.
पुणे के पास राजगुरु नगर गांव से रोहिदास सावंत मुंबई में 15 साल से टिफ़िन पहुंचाने का काम करते हैं. 16 साल की उम्र में उन्होंने ये काम चालू किया.
वो कहते हैं, "मैं चर्च गेट से अंधेरी इस रूट पर टिफ़िन पहुंचाने काम करता हूं. 30 डब्बावालों का हमारा ग्रुप है. हम रोज़ 5,000 लोगों को टिफ़िन पहुंचाते हैं. मेरा दिन सुबह 8.30 बजे शुरू होता है और शाम 5.30 बजे तक ख़त्म होता है. मुझे महीने में क़रीब 15 हज़ार रुपये तनख़्वाह मिलती है."
पुणे के पास खेड़ इलाके में रहने वाले शंकर सावंत बीते सात सालों से डब्बा पहुंचाने का काम करते हैं. शंकर रोज़ घाटकोपर से परेल का सफ़र मुंबई लोकल से ही करते हैं.
वो कहते हैं, "हम लोअर परेल में पहले जमा होते हैं फिर वहां से टिफ़िन पहुंचाने निकल जाते हैं, कोई दादर जाता है तो कई चर्च गेट. मेरे पास 15 से 30 डब्बे होते हैं. कोरोना की वजह से अब लोकल में घूमने में मुझे डर लगता है. लोकल में भीड़ होती है. किसे क्या बीमारी है ये हम नहीं जानते. लेकिन हम हमारा काम नहीं बंद कर सकते. अगर सारे ऑफ़िस ही बंद हो गए तभी हमारा काम बंद हो सकता है."
कोरोना मुंबई में तेज़ी से फ़ैल रहा है. इस वायरस से समूचे देश में सबसे ज़्यादा प्रभावित राज्य भी महाराष्ट्र ही है. सरकार और आरोग्य विभाग ने कई उपाय और योजनाएं शुरू की हैं. लेकिन क्या डब्बावाले भी वो सभी सावधानियां बरत सकते हैं?
इसके जवाब में सावंत कहते हैं, "जब हम किसी भीड़-भाड़ वाली जगह या किसी बिल्डिंग में जाते हैं तब हम अपने मुंह को रूमाल से ढक लेते हैं. हम ग्राहकों के घर में डब्बा लेने जाते हैं तब पानी से हाथ धोते हैं. साबुन का तो कोई सवाल ही नहीं उठता. हमारा काम ही ऐसा है. हर बार साबुन साथ रखना संभव नहीं है. हम साइकिल से घूमते हैं इसलिए ज़्यादा सावधानी भी नहीं बरत सकते."
वहीं शंकर बताते हैं, "हम किसी भी सोसाइटी में जाते हैं तब हमको हाथ धोने के बाद ही वहां एंट्री मिलती है. हम मास्क भी इस्तेमाल करते हैं. सरकार ने जितने उपाय बताए हैं, हम सभी का पालन करने की कोशिश करते हैं. लेकिन भीड़ को हम नहीं टाल सकते."
जहां एक तरफ डब्बावालों की सेवाएं स्थगित की गई हैं वहीं सवाल यह भी है कि उनके अपने घरों में इसका क्या असर पड़ेगा?
रोहिदास कहते हैं, "अब काम बंद हो गया है तो हमें घर में बैठना पड़ेगा. पढ़ाई भी अधूरी छोड़ने के कारण हम घर बैठे दूसरा कुछ काम नहीं कर सकते. अपने गांव वापस भी नहीं जा सकते. वहां गए तो डॉक्टर पहले चेकअप करेंगे. गांव पहुंचने पर जांच की सूचना सरपंच को भी देनी पड़ती है. इसलिए हम यहीं रुकेंगे."
इस बारे में शंकर बोलते हैं, "हमारी यूनियन है, जो वो फ़ैसला लेंगे हम उसका पालन करेंगे. वो लोग जो अभी दफ़्तरों में काम के लिए जा रहे हैं उन्हें हमने बता दिया है कि 31 मार्च तक हमारी सेवा बंद है. अब काम बंद है तो हमारे कई लोग गांव वापस जाएंगे. वहां हम 10 दिन आराम करेंगे."
इसके बारे में हमने मुंबई डब्बेवाला एसोसिएशन के अध्यक्ष सुभाष तलेकर से भी बात की.
तलेकर कहते हैं, "मुंबई में चर्चगेट से विरार, सीएसएमटी से कल्याण और वाशी इस रूट पर साढ़े चार से पांच हज़ार डब्बेवाले काम करते हैं. वो हर रोज़ दो लाख डब्बे पहुंचाते हैं. कोरोना वायरस का प्रभाव मुंबई में पहले ही दिख रहा है. स्कूल, कॉलेज तो बंद ही हैं, अधिकतर दफ़्तर भी बंद हैं. उससे हमारी सेवा पर पहले से ही असर पड़ रहा था. फिर भी डब्बावाले मास्क लगाकर और सरकार के बताए तरीक़ों को अपना कर अपना काम कर रहे थे. अब सरकार ने भीड़ को कम करने के उपाय किए हैं तो उसका पालन करते हुए हमने 20 से 31 मार्च तक के लिए अपनी सेवाएं बंद कर दी हैं."
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