राजनीतिक पार्टियों को अपराधी छवि के उम्मीदवारों की जानकारी सार्वजनिक करनी होगी: सुप्रीम कोर्ट

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राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण पर लगाम लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण फ़ैसला सुनाया है.

बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय ने राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी.

गुरुवार को जस्टिस आरएफ़ नरीमन और जस्टिस एस रवींद्र भट की बेंच ने फ़ैसला सुनाते हुए राजनीतिक दलों के लिए दिशा निर्देश जारी किए.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजनीतिक पार्टी अगर किसी आपराधिक बैकग्राउंड वाले व्यक्ति को अपना उम्मीदवार बनाती है तो उस उम्मीदवार के सभी आपराधिक मामलों की जानकारी पार्टी को अपनी वेबसाइट पर अपलोड करनी होगी.

पार्टी को ये भी बताना होगा कि पार्टी ने आख़िर किन कारणों से ऐसे व्यक्ति को अपना उम्मीदवार बनाया है.

इसके अलावा पार्टी की ये भी ज़िम्मेदारी होगी कि ऐसे दाग़दार छवि वाले उम्मीदवार की जानकारी पार्टी के आधिकारिक फ़ेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल पर दी जाए.

एक स्थानीय और कम से कम एक राष्ट्रीय अख़बार में भी पार्टी को ऐसे उम्मीदवार की जानकारी देनी होगी.

आपराधिक छवि वाले व्यक्ति को पार्टी का उम्मीदवार बनाए जाने के 72 घंटों के अंदर पार्टी को उम्मीदवार से जुड़ी सारी जानकारियां चुनाव आयोग को देनी होगी.

सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि अगर कोई पार्टी ऐसा नहीं करती है तो चुनाव आयोग कार्रवाई करेगा.

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अपराधीकरण पर पहले भी चिंता जताई

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पिछले चार आम चुनावों से राजनीति का अपराधीकरण चिंताजनक है.

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पार्टियों के ऐसे उम्मीदवारों को चुनने का कारण योग्यता के आधार पर होना चाहिए न कि जीतने के आधार पर.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पार्टियां सिर्फ़ ये नहीं कह सकतीं कि उम्मीदवार जीतने की योग्यता रखता है.

न्यायाधीशों ने कहा कि अगर राजनीतिक पार्टियां या चुनाव आयोग इन निर्देशों को लागू करने में असमर्थ रहता है तो इसे न्यायालय की अवमानना माना जाएगा.

सितंबर 2018 में पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने केंद्र सरकार को कहा था कि वो संगीन अपराधों में शामिल रहे राजनीतिक पार्टियों के पदाधिकारियों और चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को प्रतिबंधित करने के लिए तुरंत क़ानून बनाए.

इसी आदेश के उल्लंघन पर बीजेपी नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ याचिका दायर की थी. उनका आरोप था कि कोर्ट के आदेश के बाद भी राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए कुछ नहीं किया गया.

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