कौन हैं 'ब्रू', जिनको मिलेंगे 600 करोड़ रुपये

ब्रू समुदाय

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    • Author, अभिजीत श्रीवास्तव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

त्रिपुरा में शरणार्थी ब्रू जनजातियों के लिए केंद्र सरकार ने 600 करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा की है. इसके बाद से ही यह समुदाय चर्चा में है.

ब्रू आदिवासी समुदाय के क़रीब 35 हज़ार सदस्य त्रिपुरा के सात कैंपों में बीते 22 सालों से रह रहे हैं.

अब केंद्र सरकार ने मिज़ोरम के इन आदिवासी शरणार्थियों की लंबे समय से चली आ रही समस्या को समाप्त करके इन्हें स्थायी रूप से त्रिपुरा में बसाने का फ़ैसला किया है.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में ब्रू शरणार्थियों के प्रतिनिधियों और त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लव देब और मिजोरम के उनके समकक्ष जोरमथांगा ने इस बाबत एक समझौते पर हस्ताक्षर किया है.

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केंद्र की योजना में क्या क्या?

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में ब्रू शरणार्थियों के प्रतिनिधियों और त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लव देब और मिजोरम के उनके समकक्ष जोरमथांगा ने इस बाबत एक समझौते पर हस्ताक्षर किया है.

इस समझौते के मुताबिक अब केंद्र सरकार इन्हें घर बनाने के लिए 40x30 वर्ग फ़ीट की जगह और डेढ़ लाख रुपये की मदद देगी.

साथ ही उन्हें 4 लाख रुपये की फिक्स्ड डिपॉज़िट, दो साल तक हर महीने मासिक 5,000 रुपये और दो साल के लिए मुफ़्त राशन भी दिया जाएगा.

ब्रू जनजाति, रियांग जनजाति

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ब्रू समुदाय मिज़ोरम का सबसे बड़ा अल्‍पसंख्‍यक आदिवासी समूह है. इस जनजातीय समूह के सदस्य म्‍यांमार के शान प्रांत के पहाड़ी इलाके के मूल निवासी हैं जो कुछ कुछ सदियों पहले म्यांमार से आकर मिज़ोरम में बसे थे.

मिज़ोरम की बहुसंख्यक जनजाति मिज़ो इन्हें 'बाहरी' कहती है.

ब्रू जनजाति

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मिज़ोरम से त्रिपुरा क्यों आए 'ब्रू'?

1996 में ब्रू समुदाय और बहुसंख्यक मिज़ो समुदाय से स्वायत्त ज़िला परिषद के मुद्दे पर ख़ूनी संघर्ष हुआ. तब अक्तूबर 1997 में ब्रू जनजाति की क़रीब आधी आबादी (लगभग पांच हज़ार परिवारों) ने पलायन कर त्रिपुरा में शरण ले ली थी.

त्रिपुरा में ये कैंपों में रह रहे हैं. त्रिपुरा लगातार यह कोशिशें करता रहा कि ब्रू वापस मिज़ोरम लौटें. केंद्र सरकार के साथ मिलकर इस मसले को सुलझाने की कोशिशें की गईं.

ब्रू जनजाति, रियांग जनजाति

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कुछ परिवारों को वापस भेजने में मिली कामयाबी

सरकारी मध्यस्थता से कुछ परिवार वापस लौटे भी और उन्हें सरकारी सहायता भी दी गईं. 2012 की पीआईबी की प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक पांच हज़ार विस्थापित ब्रू परिवारों में से 800 को वापस भेजा जा चुका था.

एक अन्य विज्ञप्ति के मुताबिक बीते 10 सालों में हो हज़़ार के क़रीब ब्रू परिवारों को वापस भेजा जा चुका है. लेकिन 2011, 2012 और 2015 में मिज़ो में गैर सरकारी संगठनों ने ब्रू जनजातियों की वापसी का विरोध किया तो इस प्रक्रिया पर विराम लग गया. 2018 में इन्हें वापस भेजने के लिए एक समझौता हुआ लेकिन वह लागू नहीं हो सका.

ब्रू जनजाति, रियांग जनजाति

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विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह

ब्रू जनजातियों को रियांग भी कहा जाता है. गृह मंत्रालय ने चेंचू, बोडो, गरबा, असुर, कोतवाल, बैगा, बोंदो, मारम नागा, सौरा जैसे जिन 75 जनजातीय समूहों को विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) के रूप में वर्गीकृत किया है, रियांग उनमें से एक हैं. ये 75 जनजातीय समूह देश के 18 राज्यों और अण्डमान, निकोबार द्वीप समूह क्षेत्र में रहते हैं.

त्रिपुरा और मिज़ोरम के अलावा इस जनजाति के सदस्य असम और मणिपुर में भी रहते हैं.

इनकी बोली रियांग है जो तिब्बत-म्यांमार की कोकबोरोक भाषा परिवार का अंग है. रियांग बोली में 'ब्रू' का अर्थ 'मानव' होता है.

पूर्वोत्तर की अन्य जनजातियों की तरह रियांग जनजाति के लोगों की शक्ल भी मंगोलों से मिलती-जुलती है.

त्रिपुरी के बाद यह त्रिपुरा की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति है. रियांग जनजाति मुख्यतः दो बड़े गुटों में विभाजित है-मेस्का और मोलसोई.

रियांग जनजाति

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खेती-बुनाई पर आश्रित हैं ब्रू

यह मुख्यतः कृषि पर निर्भर रहने वाली जनजाति है. ये पहले झूम की खेती करते थे. इसमें जंगल के एक हिस्से को साफ़ करके वहां खेती की जाती है. जंगल के एक हिस्से में फसल उगाने और उसके उपयोग के बाद यह जनजाति दूसरे हिस्से में दोबारा इसी पद्धति से खेती करता था. लिहाजा, ये बंजारा जाति समूह रहे हैं. लेकिन अब वे खेती के आधुनिक तौर-तरीके अपना रहे हैं.

जीके घोष की पुस्तक इंडियन टेक्सटाइल- पास्ट ऐंड प्रेजेंट के मुताबिक इस समुदाय की महिलाएं बुनाई का काम करती हैं. हालांकि, ये कुछ गिने चुने कपड़े ही बुनती हैं जो इस समुदाय के लोगों के तन को ढकने के काम आते हैं.

ब्रू जनजाति, रियांग जनजाति

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महिलाएं जो परिधान बुनती हैं उनके नाम रिनाई (Rinai), रिसा (Risa), बासेई (Basei), पानद्री (Pandri), कुताई (Kutai), रिकातु (Rikatu), बाकी (Baki), कामचाई (Kamchai) हैं.

रिनाई को महिलाएं कमर से नीचे तो रिसा वक्ष पर पहनती हैं. बासेई वे बच्चों को अपने शरीर से बांधने के लिए इस्तेमाल करती हैं.

वहीं रिनाई की तरह पुरुष अपने कमर के नीचे पानद्री पहनते हैं. कुताई शर्ट को कहते हैं, जिसे पुरुष और महिलाएं दोनों पहन सकते हैं.

रिकातु और बाकी (यह रिकातु की तुलना में भारी होता है) आयताकार वस्त्र हैं जिन्हें शरीर को लपेटने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

कामचाई को सिर पर लपेटने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

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अपने ही समुदाय में शादी करने वाली यह जनजाति पारंपरिक वेशभूषा धारण करती है और नृत्य इसके जीवन का अभिन्न अंग है.

धार्मिक रूप से हिंदू धर्म के वैष्णव संप्रदाय को मानने वाली रियांग जनजाति के प्रमुख को राय कहा जाता है, जो विवाह और तलाक़ की अनुमति देता है और आपसी झगड़े निपटाता है.

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