सुधीर दर: कार्टूनों के स्वर्ण युग का अंतिम स्तंभ चला गया

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- Author, राजेंद्र धोड़पकर
- पदनाम, जाने-माने कार्टूनिस्ट
- प्रकाशित
मशहूर कार्टूनिस्ट सुधीर दर के निधन का समाचार उन पुराने दिनों की याद दिला गया जब कार्टूनों का स्वर्ण युग था.
हम लोग अपने करियर के शुरुआती दौर में उस युग का हिस्सा थे और बड़े सम्मान और अदब के साथ कार्टूनिस्टों की उस पीढ़ी को देखते थे जिसने इस स्वर्ण युग के निर्माण में सबसे बड़ी भूमिका अदा की थी और जिनके कार्टून देख-देखकर हमने अपना हुनर सीखा था.
दर साहब उसी पीढ़ी के सदस्य थे. उस दौर के बड़े कार्टूनिस्टों में अबू अब्राहम थे, ओवी विजयन थे, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया में लक्ष्मण थे तो द हिंदुस्तान टाइम्स में सुधीर दर थे.
इन कार्टूनिस्टों का बडा सम्मान और ग्लैमर था, प्रधानमंत्री से लेकर आम आदमी तक उनके कार्टूनों की चर्चा करते थे.
इन सब कार्टूनिस्टों की अपनी-अपनी शैली थी, अबू और विजयन गहरे राजनैतिक और बौद्धिक आयामों वाले तीखे कार्टून बनाते थे, लक्ष्मण और सुधीर दर अपेक्षाकृत कम राजनैतिक रंग वाले मध्यमवर्गीय आशयों के कार्टून बनाते थे.
इन लोगों ने काम नेहरू युग में शुरू किया था जो अपेक्षाकृत शालीन और आदर्शपरक राजनीति का दौर था.

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यह सौम्यता और सरलता लक्ष्मण और दर साहब में हमेशा बनी रही, वैसे भी दोनों मध्यमार्गी अख़बारों के कार्टूनिस्ट थे.
हमारे साथ के कार्टूनिस्टों ने आग़ाज़ आपातकाल के बाद के उथल-पुथल वाले दौर में किया था इसलिए मेरे ज्यादातर साथी कार्टूनिस्ट अबू, विजयन और रजिंदर पुरी से ज्यादा प्रभावित थे जो तीखे, आक्रामक राजनैतिक कार्टून बनाते थे, हालाँकि संयोगवश मेरा व्यक्तिगत परिचय लक्ष्मण और दर साहब से ही हुआ.
दर साहब बड़े शालीन और व्यवहारकुशल व्यक्ति थे, चूँकि वे दिल्ली में रहते थे तो यदाकदा कहीं-कहीं उनसे मुलाक़ात हो जाती थी.
उनसे मिलना अच्छा लगता था, वे लहीम-शहीम, बला के प्रभावशाली व्यक्तित्व के इंसान थे और अक्सर बड़े तपाक से मिलते थे और बातें करते थे.
हम लोग जो कभी उनके काम को फ़ैन की तरह देखा करते थे, उनसे मिलकर बडा फ़ख़्र और आत्मविश्वास महसूस करते थे.
दर साहब के कार्टून तीखे राजनैतिक आशयों वाले न होकर मज़े लेने वाले कार्टून होते थे.
उनका हास्यबोध चुभने वाला नहीं, बल्कि कुछ शरारती क़िस्म का चुटकी लेने वाला था.
उनके चित्र भी बड़े चुटीले और शरारती क़िस्म के होते थे.

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मैं अक्सर बड़ी देर तक उनके कार्टूनों को ध्यान से देखता था कि वे कैसे अपने चित्रों में पात्रों की भंगिमा से हास्य पैदा करते थे, यह मेरे लिए सीखने का, ट्रेनिंग का हिस्सा था.
बिना संवाद के कार्टून बनाने में उनकी महारत थी.
दिल्ली के डीडीए फ्लैट्स में रहने वाले आम मध्यमवर्गीय नागरिकों से लेकर तो राजनेताओं को वे जीवंत कर देते थे.
तत्कालीन दिल्ली उनके चित्रों में वैसे ही जीवंत हो उठती थी जैसे लक्ष्मण साहब के कार्टूनों में मुंबई.
बल्कि मेरा मानना है कि ये दोनों कार्टूनिस्ट राजनैतिक से ज्यादा सामाजिक कार्टूनिस्ट थे.
लक्ष्मण के सर्वश्रेष्ठ कार्टून वे हैं जहाँ वे मुंबई की गड्ढों भरी सड़कों और नागरिक सुविधाओं की स्थिति पर टिप्पणी करते हैं, सुधीर दर के ग़ैर-राजनैतिक कार्टून तो लाजवाब हैं. हालाँकि राजनैतिक विसंगतियों को चित्रित करने में भी वे लाजवाब थे.
उस भव्य पीढ़ी के वे आख़िरी स्तंभ थे. लक्ष्मण, विजयन, अबू पहले ही जा चुके थे, उनके बाद की पीढ़ी के राजिंदर पुरी भी पहले चले गए, सुधीर तैलंग हमारा हमउम्र था, वह भी असमय मृत्यु का शिकार हो गया.
ये वे लोग थे जो हमारे लिए उस दौर के हमसफ़र थे जब व्यंग्य करना या सरकार का विरोध करना देशद्रोह नहीं कहा जाता था बल्कि कार्टूनिस्टों की आवाज़ को सम्मान से सुना जाता था.
कुछ ही दिन पहले दर साहब ने ऐसा कुछ ट्वीट किया था कि अगर सरकार की आलोचना करना अपराध होता तो शायद वे और उनके साथी कार्टूनिस्ट कार्टून ही नहीं बना सकते थे.
ख़ैर भले ही कठिन दौर हो, कार्टून तो बनते ही रहेंगे. जब तक अन्याय है, विसंगतियाँ हैं और मनुष्य में हास्यबोध रहेगा कार्टून बनेंगे, और हर वक्त के कार्टूनिस्ट दर साहब और उनके साथियों को कृतज्ञता से याद करेंगे जिन्होंने एक समृद्ध परंपरा की राह बनाई.

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दर साहब हमें ऐसे दौर में छोड़कर गए हैं जब दुनिया भर में कार्टून की जगह सिमट रही है.
पिछले दिनों अमरीका के प्रतिष्ठित अख़बार 'द न्यूयॉर्क टाइम्स' ने कुछ कार्टूनों पर विवाद हो जाने के बाद अपने कार्टूनिस्ट पैट्रिक शैप्टे को निकाल दिया (हालाँकि विवादित कार्टून उनके बनाए हुए नहीं थे) और बाक़ायदा इस आशय की सूचना छापी कि आइंदा से अख़बार में कार्टून नहीं छपेंगे.

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इस प्रसंग को लेकर अमरीकी मीडिया में ज़बरदस्त वाद-विवाद हुआ हालाँकि सच यह है कि अमरीकी मीडिया में राजनैतिक या एडिटोरियल कार्टून की जगह सिमटती जा रही है.
एडिटोरियल कार्टूनिस्टों के अमरीकी संगठन के मुताबिक़ पिछली शताब्दी में अमरीकी अख़बारों में दो हज़ार से ज्यादा कार्टूनिस्ट नौकरी पर थे, अब यह संख्या पचास से भी कम है.
कमोबेश यह स्थिति सारी दुनिया में है, मीडिया ज़बर्दस्त आर्थिक संकट के दौर में है और ज्यादातर मीडिया संगठन कार्टून छापना बेवजह के विवाद की जड़ मानते हैं, सो कटौती की पहली तलवार जिनके सिर पर पड़ती है उनमें कार्टूनिस्ट अगली क़तार में होते हैं.

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जहाँ लोकतंत्र की जड़ें उतनी मज़बूत नहीं हैं वहाँ कार्टूनिस्टों पर ज्यादा ख़तरा है.
तुर्की के प्रतिष्ठित कार्टूनिस्ट मूसा कार्ट एक साल से भी ज्यादा जेल में हैं और उनके अख़बार पर पुलिस के छापे के बाद निकारागुआ के कार्टूनिस्ट पेड्रो मोलिना ने भाग कर अमरीका में शरण ली है.
चीन के विद्रोही कार्टूनिस्ट बादिआचाऊ आस्ट्रेलिया में रह रहे हैं फिर भी उन पर और उनके परिवार पर ख़तरा मँडरा रहा है.
अपने देश में भी कार्टून की स्थिति ठीक नहीं है.
आर्थिक कटौती और राजनेताओं से बिगाड़ के डर की वजह से ज्यादातर मीडिया संस्थान कार्टून नहीं छापना चाहते.
पिछले कुछ सालों में तो मीडिया कुछ ज्यादा ही सरकार-परस्त हुआ है या बनाया गया है और कार्टूनिस्टों के लिए इस निज़ाम में जगह कम-से-कम होती जा रही है.
डिजिटल मीडिया ने नए रास्ते खोले तो हैं लेकिन वहाँ भी पेशेवर एडिटोरियल कार्टूनिस्टों के लिए क़ायदे की जगह नहीं है.
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