कांग्रेस और शिव सेना का याराना भी कम पुराना नहीं: नज़रिया

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- Author, अनिल जैन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
- प्रकाशित
महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद तीन सप्ताह तक अनिश्चिता के माहौल में चले नाटकीय घटनाक्रम के बाद अब शिव सेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और कांग्रेस की साझा सरकार बनना तय हो गया है.
महाराष्ट्र की राजनीति में शिव सेना और कांग्रेस के साथ आने की घटना को मीडिया का एक बडा हिस्सा और कई राजनीतिक विश्लेषक एक अजूबे की तरह देख रहे हैं.
12 नवंबर को राष्ट्रपति शासन लागू होने से पहले चले घटनाक्रम में भी जब शिव सेना और कांग्रेस के साथ आने की चर्चाएं चल रही थीं, तब भी टेलीविजन चैनलों पर कई राजनीतिक विश्लेषक और टिप्पणीकार हैरानी जता रहे थे.
सभी का कहना था कि अगर कांग्रेस और शिव सेना साथ आते हैं तो यह भारतीय राजनीति में अनोखी घटना मानी जाएगी और इससे अभूतपूर्व अवसरवाद की मिसाल कायम होगी.
अपने उग्र हिंदुवादी तेवरों के लिए जानी जाने वाली शिव सेना द्वारा बीजेपी से अपना क़रीब 30 साल पुराना नाता तोड़कर एनसीपी और कांग्रेस हाथ मिलाने की घटना राजनीतिक विश्लेषकों से इतर कई आम लोगों को भी हैरान कर रही है.
मगर सवाल है कि क्या वाकई शिवसेना और कांग्रेस राजनीतिक तौर पर एक-दूसरे के लिए वैसे ही अछूत हैं, जैसा कि उन्हें समझा जा रहा है?

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शिव सेना ने किया था बीजेपी का 'अछूतोद्धार'
यह सही है कि बीजेपी और शिव सेना का साथ तीन दशक से भी ज़्यादा पुराना है. 1980 और 1990 के दशक में जब कोई भी पार्टी बीजेपी से हाथ मिलाने में हिचकिचाती थी और देश में गठबंधन की राजनीति दौर भी शुरू नहीं हुआ था, तब शिव सेना ही वह पार्टी थी जिसने बीजेपी के साथ महाराष्ट्र में गठबंधन कर उसका 'अछूतोद्धार' किया था.
इन तीन दशकों के दौरान दोनों पार्टियों ने लोकसभा और महाराष्ट्र विधानसभा के लगभग सभी चुनाव मिलकर लड़े और केंद्र तथा राज्य सरकार में भी साझेदारी की.
सिर्फ 2014 का विधानसभा चुनाव ही दोनों पार्टियों ने अलग-अलग लड़ा था लेकिन चुनाव के कुछ समय बाद शिव सेना बीजेपी के साथ सरकार में साझेदार हो गई थी.
इस बार का चुनाव भी दोनों पार्टियों ने मिलकर लड़ा था. उनके गठबंधन को बहुमत भी हासिल हुआ लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर दोनों का रिश्ता टूट गया, जिसके चलते विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद बीजेपी सरकार नहीं बना सकी.
इस सबके बावजूद राज्य में नई सरकार के गठन को लेकर बने नए राजनीतिक समीकरण के तहत अब शिव सेना और कांग्रेस के साथ आने में हैरानी या ताज्जुब जैसी कोई बात नहीं है.

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जब शिव सेना ने किया कांग्रेस के उम्मीदवार का समर्थन!
पिछले तीन दशक तक भले ही शिवसेना का बीजेपी से गठबंधन रहा हो, मगर महाराष्ट्र की राजनीति में कांग्रेस और शिवसेना के सहयोगपूर्ण रिश्तों का इतिहास इससे भी पुराना है और यह उतना पुराना है, जितनी शिवसेना की कुल उम्र है.
पिछले तीन दशक की ही बात करें तो ऐसे कई मौके आए हैं जब शिवसेना ने बीजेपी के साथ रहते हुए भी उसकी राजनीतिक लाइन से हटकर फ़ैसले किए और राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस का समर्थन किया.
बहुत पहले की नहीं, बल्कि 2012 की ही बात करें तो राष्ट्रपति पद के चुनाव में शिवसेना ने कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी का समर्थन किया था, जबकि बीजेपी ने उनके ख़िलाफ़ पीए संगमा को एनडीए का उम्मीदवार बनाकर मैदान में उतारा था.
शिवसेना के समर्थन का शुक्रिया अदा करने खुद प्रणब मुखर्जी शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे से मिलने उनके निवास पर पहुंचे थे.
इससे पहले 2007 में भी शिवसेना ने राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस की उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल को समर्थन दिया था. उस चुनाव में तत्कालीन उपराष्ट्रपति और बीजेपी के वरिष्ठ नेता रहे भैरोसिंह शेखावत बीजेपी नीत एनडीए के उम्मीदवार थे.
राष्ट्रपति पद के दोनों चुनावों में शिवसेना का समर्थन लेने से कांग्रेस ने कोई परहेज नहीं किया.

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बाल ठाकरे ने किया था इमरजेंसी का समर्थन
यही नहीं, शिव सेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने 1975 में इंदिरा गांधी सरकार के लगाए आपातकाल का और फिर 1977 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस का समर्थन किया था.
1977 में मुंबई के मेयर के चुनाव में कांग्रेस नेता मुरली देवड़ा को जिताने में भी बाल ठाकरे ने अहम भूमिका निभाई थी.
हालांकि शिव सेना को इन चुनावों में कांग्रेस का समर्थन करने की राजनीतिक क़ीमत भी चुकानी पडी.
1978 में महाराष्ट्र विधानसभा और बंबई म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन (बीएमसी) के चुनाव में शिव सेना को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा.
आपातकाल के प्रति अपना समर्थन जताने के लिए तो बाल ठाकरे खुद बंबई के राजभवन में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलने गए थे. उन्होंने न सिर्फ़ आपातकाल का समर्थन किया था बल्कि उसे उन्होंने श्रीमती गांधी का साहसिक क़दम बताते हुए उन्हें बधाई भी दी थी.

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संघ का आपातकाल को सशर्त समर्थन
हालांकि आपातकाल का समर्थन करने की पेशकश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सर संघचालक मधुकर दत्तात्रय उर्फ बाला साहब देवरस ने भी की थी, लेकिन उनकी पेशकश सशर्त थी.
उनकी शर्त थी कि यदि सरकार संघ पर लगाया गया प्रतिबंध हटा लेती है और संघ के गिरफ़्तार स्वयंसेवकों को रिहा कर देती तो संघ किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहते हुए श्रीमती इंदिरा गांधी के बीस सूत्रीय तथा संजय गांधी के पांच सूत्रीय कार्यक्रम का समर्थन करेगा. यह और बात है कि श्रीमती गांधी ने देवरस की यह पेशकश मंजूर नहीं की थी.
असल में कांग्रेस ने पिछले पांच-छह दशक के दौरान इसी तरह शिव सेना का इस्तेमाल किया. यानी जाहिर तौर पर शिव सेना की कट्टर हिंदुवादी और मराठी मानुष की नीति का विरोध भी किया और जब जरूरत पड़ी तब उसका सहयोग भी लिया.

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शिव सेना की स्थापना के वक्त क्या थे महाराष्ट्र के हालात?
बाल ठाकरे ने शिव सेना की स्थापना 1960 के दशक के मध्य में की थी. यह वह दौर था जब फायरब्रांड समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीस को मुंबई का बेताज बादशाह कहा जाता था.
महानगर की तमाम छोटी-बडी ट्रेड यूनियनों के वे नेता हुआ करते थे और उनके एक आह्वान पर पूरा महानगर बंद हो जाता था, थम जाता था.
महाराष्ट्र के बाक़ी हिस्सों में भी मजदूर संगठनों का नेतृत्व उसी दौर में 1967 के लोकसभा चुनाव में 35 वर्षीय जॉर्ज ने मुंबई में कांग्रेस के अजेय माने जाने वाले दिग्गज नेता एसके पाटिल को हराकर उनकी राजनीतिक पारी समाप्त कर दी थी.
चूंकि महाराष्ट्र तब भी एक औद्योगिक राज्य था और पूरे राज्य में समाजवादी तथा वामपंथी मजदूर संगठन बहुत मजबूत हुआ करते थे. औद्योगिक राज्य होने की वजह से सरकार को नियमित रूप से मजदूर संगठनों से जूझना होता था.
जिस समय बाल ठाकरे ने शिव सेना की स्थापना की उस वक्त महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री वसंतराव नाइक हुआ करते थे और बाल ठाकरे से उनकी काफ़ी नजदीकी थी.
कहा जाता है कि मुंबई के कामगार वर्ग में जॉर्ज के दबदबे को तोड़ने के लिए वसंत राव नाइक ने शिव सेना को खाद-पानी देते हुए बाल ठाकरे का भरपूर इस्तेमाल किया. इसी वजह से उस दौर में शिव सेना को कई लोग मजाक़ में 'वसंत सेना' भी कहा करते थे.
आपातकाल के बाद जॉर्ज जब पूरी तरह राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हो गए तो उन्होंने मुंबई में समय देना कम कर दिया. उसी दौर में मुंबई में मजदूर नेता के तौर दत्ता सामंत का उदय हुआ.
शुरुआती दौर में तो जॉर्ज के नेतृत्व वाली यूनियनों के दबदबे को कम करने के लिए कांग्रेस ने भी दत्ता सामंत को खूब बढ़ावा दिया, लेकिन जब वे भी टेक्सटाइल मिलों में हड़ताल और मजदूरों के प्रदर्शन के जरिए जब महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार के लिए सिरदर्द बनने लगे तो कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों ने उनका भी 'इलाज' बाल ठाकरे की मदद से ही किया.

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बाल ठाकरे ने दोस्ती का फ़ायदा भी वसूला
सिर्फ वसंतराव नाइक ही नहीं, बल्कि उनके बाद शंकरराव चह्वाण, वसंतदादा पाटील, शरद पवार, अब्दुल रहमान अंतुले, बाबा साहेब भोंसले, शिवाजीराव पाटील निलंगेकर आदि कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने भी समय-समय पर महाराष्ट्र और मुंबई की राजनीति में बाल ठाकरे का अपने लिए भी और कांग्रेस के लिए भी भरपूर इस्तेमाल किया. शरद पवार से तो उनकी दोस्ती जगजाहिर ही रही.
ऐसा नहीं कि सिर्फ़ बाल ठाकरे कांग्रेस की मदद ही किया करते थे. वे कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों से बाक़ायदा अपनी मदद की राजनीतिक क़ीमत वसूल करते थे. यह क़ीमत होती थी विधानसभा और विधान परिषद में अपने उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित कराने के रूप में भी और इससे इतर दूसरे स्तरों पर भी.
उसी दौर में और उसके बाद भी महाराष्ट्र के विभिन्न इलाकों में कई जगह कांग्रेस के ज़िला स्तर के नेताओं ने शिवसेना के साथ तालमेल करते हुए ज़िला परिषद, नगर पालिका और नगर निगमों में बोर्ड का गठन भी किया.
उस पूरे दौर में तो बाल ठाकरे पर उनके भड़काऊ बयानों और भाषणों को लेकर कई मुक़दमे भी दर्ज हुए, लेकिन पुलिस उन्हें कभी छू भी नहीं पाई. ऐसा सिर्फ़ कांग्रेस से उनके दोस्ताना रिश्तों के चलते ही हुआ.
1980 के दशक के अंत में बीजेपी के साथ गठबंधन होने से पहले तक शिव सेना और कांग्रेस के दोस्ताना रिश्ते जारी रहे.
इसलिए यह कहना बेमतलब है कि कांग्रेस और शिव सेना एक दूसरे के लिए राजनीतिक तौर पर अछूत रहे हैं और अब उनके साथ आने से कांग्रेस की 'धर्मनिरपेक्षता' या शिवसेना की 'हिंदूवाद' 'मराठी मानुष' पर आसमान टूट पड़ेगा.
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