कर्नाटक में नाटक जारी, विश्वास मत पर वोटिंग फिर टली

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कर्नाटक विधानसभा में शुक्रवार का दिन भी नाटकीय रहा. राज्यपाल के कहने के बावजूद विश्वास मत पर वोटिंग नहीं हुई और विधानसभा अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही सोमवार तक के लिए स्थगित कर दी.
कर्नाटक की कांग्रेस और जनता दल सेक्यूलर की गठबंधन सरकार को राज्यपाल ने विश्वास मत हासिल करने के लिए शुक्रवार तक की नई समयसीमा तय की थी. बहस के बाद विश्वास मत पर वोटिंग होनी है.

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गुजरात के राज्यपाल वुजुभाई वाला ने पत्र लिखकर पहले शुक्रवार दोपहर डेढ़ बजे तक विश्वास मत पर वोटिंग कराने को कहा था. लेकिन जब विधानसभा अध्यक्ष ने ऐसा नहीं किया तो उन्होंने दूसरा पत्र भेजा और कहा कि शुक्रवार को विश्वास मत पर वोटिंग हो जानी चाहिए.
लेकिन ऐसा हुआ नहीं और विधानसभा अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही सोमवार तक के लिए स्थगित कर दी. कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने कहा कि राज्यपाल के दूसरे प्रेमपत्र से उन्हें पीड़ा हुई है.

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राज्यपाल ने अपने दूसरे पत्र में लिखा है कि विस्तार से हो रही चर्चा और बहस इसलिए हो रही है ताकि विश्वास मत पर वोटिंग में देरी हो. उन्होंने लिखा है कि विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त के व्यापक आरोप उनके सामने आए हैं, इसलिए संविधान के मुताबिक़ बिना किसी देरी के विश्वास मत पर वोटिंग होनी चाहिए.
भारतीय जनता पार्टी की ओर से शिकायत मिलने के बाद राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को लिखे अपने पहले पत्र में कहा था- आपके सदन का विश्वास खो दिया है. बीजेपी की शिकायत है कि 18 विधायकों का समर्थन खो देने के बाद सरकार जानबूझकर देरी कर रही है.
दूसरी ओर अपने लंबे संबोधन में मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने बीजेपी पर आरोप लगाया कि वो दल-बदल के लिए विधायकों को 40 से 50 करोड़ का ऑफ़र दे रही है.
लेकिन भारतीय जनता पार्टी के नेता बीएस येदियुरप्पा ने जल्द से जल्द विश्वास मत पर वोटिंग की मांग की. दूसरी ओर सत्ताधारी गठबंधन के नेताओं का आरोप है कि राज्यपाल पर राष्ट्रपति शासन की सिफ़ारिश करने का दबाव बनाया जा रहा है.

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गुरुवार को विश्वास मत पर वोटिंग ना होने के बाद बीजेपी विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया और रातभर विधानसभा परिसर में डटे रहे.
सुप्रीम कोर्ट ने विधायकों के इस्तीफ़े का मामला स्पीकर पर छोड़ दिया है. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा था कि बाग़ी विधायकों को सदन की कार्यवाही में शामिल होने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.

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पिछले दो सप्ताह में कांग्रेस के 13 और जेडीएस के तीन विधायकों ने त्यागपत्र दे दिया है. जबकि दो निर्दलीय विधायकों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया है. माना जा रहा है कि कांग्रेस के एक बाग़ी विधायक वापस अपने खेमे में लौट आए हैं.
224 सदस्यीय विधानसभा में सत्ताधारी गठबंधन के 118 सदस्य हैं. अगर 15 विधायकों का इस्तीफ़ा स्वीकार कर लिए जाता है, तो सरकार के पास सिर्फ़ 101 विधायकों का समर्थन रह जाएगा. जबकि बीजेपी के 107 विधायक हैं, जो उस स्थिति में बहुमत की संख्या (105) से दो ज़्यादा होंगे.
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