लोकसभा चुनाव 2019: ये पांच राज्य तय करेंगे लोकसभा चुनाव के नतीजे

नरेंद्र मोदी
    • Author, सिन्धुवासिनी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित
  • उत्तर प्रदेश - 80
  • महाराष्ट्र - 48
  • पश्चिम बंगाल - 42
  • बिहार - 40
  • तमिलनाडु - 39

लोकसभा सीटों की संख्या के लिहाज़ से देखें तो भारत के ये पांच राज्य बेहद अहम नज़र आते हैं इसलिए ज़ाहिर है कि दिल्ली में सरकार बनाने में इन राज्यों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी.

पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों पर नज़र डालें तो उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को 71, महाराष्ट्र में 23, पश्चिम बंगाल में 2, बिहार में 22, और तमिलनाडु में 1 सीट मिली थी.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2014 के आम चुनाव और 2019 के आम चुनाव में बहुत फ़र्क है. जानकारों का अनुमान है कि इस बार के लोकसभा चुनाव में पिछली बार के लगभग सारे आंकड़े उलटे-पलटे नज़र आएंगे और इसकी कई वजहे हैं.

अगर कुछ नहीं बदलेगा तो केंद्र में सरकार बनाने में इन पांच राज्यों का योगदान. अब एक-एक करके सभी पांचों राज्यों की सियासी स्थिति पर नज़र डालते हैं.

शुरुआत भारत के मानचित्र में नीचे की ओर या दक्षिण से करते हैं. यानी सबसे पहले बात तमिलनाडु की.

राहुल गांधी, स्टालिन
इमेज कैप्शन, तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके का गठबंधन है

तमिलनाडु

दक्षिण भारत के तमिलनाडु राज्य में लोकसभा की 39 सीटें हैं. हालांकि इस बार चुनाव सिर्फ़ 38 सीटों पर हुआ है क्योंकि वेल्लोर में चुनाव रद्द कर दिया गया था.

यहां बीजेपी ने ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके), डीएमडीके और पाटली मक्कल काची (पीएमके) के साथ गठबंधन किया है. दूसरी तरफ़ कांग्रेस ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके), मरुमलार्ची द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एमडीएमके), विदुथलाई चिरुताइगल काची (वीएसके), सीपीआई और सीपीआई (एम) के साथ मिलकर महागठबंधन किया है.

इन दो महागठबंधनों के अलावा तमिलनाडु में दो नई पार्टियों का उदय हुआ है. जिनमें से एक है फ़िल्म स्टार कमल हासन की पार्टी 'मक्कल निधि मय्यम' (एमएनएम) और शशिकला के भतीजे टीटीवी दिनाकरण की पार्टी 'अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम' (एएमएमके). दिनाकरण ने एआईएडीएमके से अलग होकर ये अलग पार्टी बनाई है.

ये दोनों पार्टियां लोकसभा चुनाव में पहली बार हिस्सा ले रही हैं. दिनाकरण ने सभी निर्वाचन क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं लेकिन ये सभी निर्दलीय उम्मीदवार की तरह चुनाव लड़ रहे हैं क्योंकि चुनाव से पहले तक उनकी पार्टी पंजीकृत नहीं हो पाई थी.

अंग्रेज़ी अख़बार 'द हिंदू' के पत्रकार और तमिलनाडु की राजनीति पर नज़र रखने वाले डी. सुरेश कुमार कहते हैं कि तमिलनाडु में बीजेपी और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों की भूमिका बहुत सीमित है. यही वजह है कि इन्हें राज्य में प्रमुख द्रविड़ पार्टियों (एआईएडीएमके और डीएमके) का सहारा लेना पड़ता है.

डी. सुरेश का मानना है कि तमिलनाडु में बीजेपी के ख़िलाफ़ विरोध की लहर तो है ही, इसके साथ ही जयललिता के निधन के बाद एडापडी के. पलानीस्वामी सरकार के ख़िलाफ़ भी सत्ताविरोधी लहर है.

डी. सुरेश ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा, "मौजूदा हालात को देखते हुए लगता है कि तमिलनाडु में इस बार कांग्रेस-डीएमके गठबंधन अपेक्षाकृत मज़बूत स्थिति में है. शायद वो 25-30 सीट जीत सकते हैं. वहीं एआईएडीएमके-बीजेपी गठबंधन को 10-12 सीट जीत सकता है."

पारंपरिक तौर पर देखें तो कन्याकुमारी और कोयंबटूर सीट पर बीजेपी की अच्छी पकड़ रही है.

इस बारे में डी. सुरेश कहते हैं, "कन्याकुमारी में बीजेपी के एक सांसद है जो वहां मंत्री भी है-पोन राधाकृष्णन. लेकिन इसके बावजूद इस बार कन्याकुमारी में बीजेपी मज़बूत स्थिति में नहीं है क्योंकि वहां कांग्रेस-डीएमके गठबंधन बहुत मज़बूत है. इसके अलावा कन्याकुमारी में पोन राधाकृष्णन के ख़िलाफ़ भी सत्ता विरोधी लहर है."

तमिलनाडु मछुआरे

मछुआरों की नाराज़गी ले डूबेगी?

डी. सुरेश के मुताबिक राधाकृष्णन के विरोध की एक वजह ये है कि साल 2017 में यहां आए ओकी चक्रवात में मछुआरों का बहुत नुक़सान हुआ था. इसमें कई मछुआरों की मौत भी हुई थी. इसके बाद कन्याकुमारी के लोगों में ये असंतोष फैल गया कि प्राकृतिक आपदा के ऐसे मुश्किल वक़्त में भी राधाकृष्णन मछुआरों के लिए केंद्र सरकार और भारतीय तटरक्षक बल से पर्याप्त मदद नहीं मांग पाए.

पोन राधाकृष्णन के ख़िलाफ़ सत्ता विरोधी लहर की दूसरी वजह डी सुरेश ये बताते हैं कि वो कन्याकुमारी में एक बंदरगाह बनवाना चाहते थे और स्थानीय मछुआरा समुदाय इसके पक्ष में नहीं था. यहां के मछुआरों को लगता था कि बंदरगाह की वजह से उनके मछली पकड़ने का काम बुरी तरह प्रभावित होगा.

इसके अलावा, अब तक बीजेपी को लग रहा था कि पोन राधाकृष्णन की वजह से हिंदू वोट उसके पक्ष में आएंगे लेकिन कांग्रेस ने एच. वसंत कुमार नाम के रिटेल कारोबारी को कन्याकुमारी से अपना प्रत्याशी बना लिया. वसंत कुमार भी उसी समुदाय (नादर हिंदू) से ताल्लुक रखते हैं जिससे पोन राधाकृष्णन. ऐसे में हिंदू वोटों के बंटने की भी पूरी संभावना है.

एक और अहम बात ये है कि कन्याकुमारी में अल्पसंख्यक वोट भी पर्याप्त संख्या में हैं और उनके ज़्यादातर वोटों के डीएमके-कांग्रेस गठबंधन के पक्ष में जाने का अनुमान है. यानी कुल मिलाकर देखें तो इस बार कन्याकुमारी में बीजेपी मज़बूत स्थिति में नहीं है.

हालांकि डी.सुरेश इस बात से सहमति ज़रूर जताते हैं कि कोयंबटूर में बीजेपी पारंपरिक रूप से मज़बूत रही है.

वो कहते हैं, "इसके अलावा डीएमके-कांग्रेस ने कोयंबटूर से सीपीआई (एम) के पीआर नटराजन को अपना प्रत्याशी बनाया है जो पूर्व सांसद रह चुके हैं. दूसरी ओर बीजेपी ने सीपी राधाकृष्णन को अपना उम्मीदवार बनाया है. सीपी राधाकृष्णन भी पूर्व सासंद रह चुके हैं. ऐसे में कोयंबटूर में दोनों पक्षों में कड़ी टक्कर होने की उम्मीद है.

हालांकि बीजेपी की नोटबंदी और जीएसटी जैसी आर्थिक नीतियां कोयंबटूर में उसके ख़िलाफ़ जा सकती हैं.

तमिलनाडु के मतदाता

युवाओं को आकर्षित करते कमल हासन

डी. सुरेश कहते हैं, "चूंकि कोयंबटूर एक औद्योगिक शहर है और यहां हज़ारों छोटे उद्योग हैं. नोटबंदी और जीएसटी की वजह से यहां के कारोबारियों को काफ़ी नुक़सान हुआ है. इसलिए मुमकिन है कि इस बार बीजेपी के कुछ वोट कट जाएं लेकिन इसके बावजूद कोयंबटूर में कांटे की टक्कर देखने को मिल सकती है."

डी. सुरेश के मुताबिक बीजेपी को रामनाथपुरम सीट पर फ़ायदा मिल सकता है.

बीजेपी ने यहां से नायनर नागेंद्रन को अपना प्रत्याशी बनाया है जो एआईएडीएमके सरकार में मंत्री रह चुके हैं. बाद में वो एआईएडीएम से इस्तीफ़ा देकर बीजेपी में शामिल हो गए थे. वहीं, कांग्रेस ने इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) से नवाज़ कनी को उम्मीदवार बनाया है, जिन्हें वहां बहुत ज़्यादा मज़बूत नहीं माना जा रहा है. इसलिए, फ़िलहाल रामनाथपुरम में बीजेपी फ़ायदे में दिख रही है.

अगर बात कमल हासन की पार्टी की करें तो डी. सुरेश मानते हैं कि शहरी इलाकों के युवाओं और महिलाओं के एक वर्ग का रुझान कमल हासन की पार्टी की ओर रहा है. ये वो तबका है जो एआईएडीएमके-बीजेपी गठबंधन को वोट नहीं देना चाहता था. ऐसे में कुछ लोगों ने डीएमके-कांग्रेस गठबंधन के बजाय कमल हासन की पार्टी को तरजीह दी.

डी. सुरेश कुमार कहते हैं, "चूंकि ये पार्टी बिल्कुल नई है इसलिए इनके आधार के बारे में बहुत ज़्यादा अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता. इसके लिए हमें नतीजों का इंतज़ार करना होगा. शहरी इलाकों में इनका थोड़ा असर ज़रूर होगा. हालांकि इतना असर भी नहीं होगा कि वो जीत सके लेकिन वो बड़ी पार्टियों के वोट काटें इसकी पूरी संभावना है."

वहीं, दिनाकरण की पार्टी की बात करें तो वो एआईएडीएमके के वोट ज़रूर बांटेगी. डी. सुरेश के मुताबिक़ कावेरी-डेल्टा इलाके में दिनाकरण बहुत मज़बूत हैं क्योंकि उनकी बुआ शशिकला मन्नारगुडी कस्बे से हैं इसलिए वहां उनका आधार मज़बूत है.

इसके अलावा दक्षिण तमिलनाडु में भी दिनाकरण ठीकठाक स्थिति में हैं. अनुमान लगाया जा रहा है कि दिनकरण को 6-8% वोट मिल सकते हैं क्योंकि कुछ अल्पसंख्यक वोट भी उनके खाते में आ सकते हैं.

साल 2017 में तमिलनाडु के अरियलूर के एक गांव में रहने वाली अनीता की आत्महत्या ने नीट को बड़ा मुद्दा बना दिया था.
इमेज कैप्शन, अनीता

नाराज़गी के पीछे NEET

डी. सुरेश कहते हैं कि पिछले दो-तीन साल में यानी जयललिता के निधन के बाद तमिलनाडु की पार्टियों ने वहां के लोगों के मन में ये धारणा बिठा दी है कि बीजेपी तमिलनाडु के ख़िलाफ़ है. इसके प्रमुख कारणों में से एक है-नीट (NEET) परीक्षा.

तमिलनाडु में तक़रीबन 10 साल पहले मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में दाख़िले के लिए होने वाली प्रवेश परीक्षा का सिस्टम ख़त्म कर दिया गया था. तमिलनाडु में छात्रों को 12वीं के नंबरों के आधार पर ग्रैजुएशन में दाख़िला मिलता था.

इसके बाद जब NEET लागू किया गया तो यहां कहा जाने लगा कि इससे ग्रामीण इलाकों के छात्रों को अच्छे कॉलेज मिलना मुश्किल होगा. उस समय बीजेपी नेता निर्मला सीतारमण (जो ख़ुद तमिलनाडु से हैं) ने कहा था कि राज्य को एक साल के लिए NEET से राहत मिलेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

इस बीच दलित परिवार की लड़की अनीता ने ख़ुदकुशी कर ली. अनीता वो लड़की थी, जिन्होंने NEET के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की थी. इस घटना के बाद तमिलनाडु का एक वर्ग बीजेपी से ख़फ़ा हो गया.

इसके अलावा केंद्र की कई परियोजनाओं को लेकर भी तमिलनाडु में खासी नाराज़गी है- मसलन जैसे हाइड्रो कार्बन प्रोजेक्ट और सेलम-चेन्नई कॉरिडोर प्रोजेक्ट, जिस पर अदालत ने फ़िलहाल रोक भी लगाई हुई है.

इन परियोजनाओं को लेकर तमिलनाडु में नकारात्मक माहौल है क्योंकि यहां कि जनता को लगता है कि इन सबसे खेती और स्थानीय कारोबार पर बुरा असर पड़ेगा.

डी सुरेश कहते हैं कि एक और अहम बात ये है कि चूंकि अभी न तो करुणानिधि जीवित हैं और न जयललिता इसलिए तमिलनाडु की जनता को लगता है कि मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी राज्य में अपनी विचारधारा थोप रही है.

मिसाल के तौर पर जब जयललिता जीवित थीं तब उन्होंने खाद्य सुरक्षा विधेयक. उज्ज्वला योजना और जीएसटी का विरोध किया था लेकिन उनके निधन के बाद ये सभी योजनाएं तमिलनाडु में लागू कर दी गईं. इसलिए लोगों को लगता है कि केंद्र सरकार तमिलनाडु के साथ 'बिग ब्रदर' वाला रवैया अपना रही है.

डी सुरेश कहते हैं कि, "इन सभी वजहों को ध्यान में रखते हुए ही बीजेपी ने इस बार एआईएडीएमके से गठबंधन किया क्योंकि पिछले बार उसे नोटा से भी कम वोट मिले थे. इस बार इतनी ख़राब हालत तो बिल्कुल नहीं होगी लेकिन बेहतर स्थिति में डीएमके-कांग्रेस गठबंधन ही दिख रहा है."

ममता बनर्जी

पश्चिम बंगाल

कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद चुनाव के विभिन्न चरणों के दौरान पश्चिम बंगाल में हिंसा क़ायम रही है. अंग्रेज़ी अख़बार 'द टेलीग्राफ़' के वरिष्ठ पत्रकार तपस चक्रवती मानते हैं कि बंगाल में इस बार लड़ाई 'मोदी बनाम ममता' है.

ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) साल 2011 में सत्ता में आई थी. शुरुआत में सियासी हिंसा वामदलों और टीएमसी कार्यकर्ताओं के बीच होती थी लेकिन पिछले दो साल से संघर्ष टीएमसी और बीजेपी कार्यकर्ताओं में होने लगा है. ये इसी बात का संकेत है कि सत्ता की लड़ाई अब बीजेपी और टीएमसी में है.

तपस चक्रवर्ती के मुताबिक़ पश्चिम बंगाल की राजनीति में दक्षिणपंथी विचारधारा या बीजेपी का असर उस वक़्त दिखना शुरू हुआ जब ममता बैनर्जी पर अल्पसंख्यकों ख़ासकर मुसलमानों के तुष्टिकरण के आरोप लगे. इससे बंगाल के बहुसंख्यक समाज का एक तबका ममता से दूर होने लगा. इसी का फ़ायदा उठाकर बीजेपी कार्यकर्ता यहां आकर पार्टी का आधार बनाने की कोशिशों में लग गए.

इतना ही नहीं, बीजेपी ने बांग्लादेश सीमा से लगे ज़िलों में बांग्लादेश से आए हिंदुओं का समर्थन करना शुरू कर दिया.

अमित शाह

बीजेपी के लिए सहानुभूति

इन सबका नतीज़ा बंगाल में 2016 में हुए पंचायत चुनाव के नतीजों में साफ़ देखने को मिलता है. पंचायत चुनावों में बीजेपी के वोट प्रतिशत में अच्छी बढ़त मिली थी.

पंचायत चुनाव में वैसे तो टीएमसी क्लीन स्वीप करने में कामयाब रही थी लेकिन साथ ही बीजेपी सीपीआई (एम) को पछाड़कर दूसरे नबंर पर काबिज़ हो गई थी.

तपस चक्रवर्ती कहते हैं कि पंचायत चुनाव के साथ ही टीएमसी और बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच हिंसा का दौर भी शुरू हो गया था. उस समय से दोनों पार्टियों के बीच हिंसा की जो शुरुआत हुई वो इस लोकसभा चुनाव में भी क़ायम है. बीजेपी कार्यकर्ताओं पर हमले और उनकी हत्या की वजह से भी बंगाल के एक वर्ग में बीजेपी के लिए सहानुभूति पैदा हुई.

तपस के अनुसार पश्चिम बंगाल की राजनीति पर नज़र रखने वाले विश्लेषकों के अनुमान और अब तक के रुझान को देखें तो इस बार बीजेपी 8-10 सीटें जीतने में कामयाब हो सकती है या कम से कम इतना तो तय है कि उसे पश्चिम बंगाल में पिछले लोकसभा चुनाव से ज़्यादा सीटें मिलेंगी. हालांकि दावा वो क़रीब 23 सीटें जीतने का कर रही है.

तपस कहते हैं कि 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के लिए पश्चिम बंगाल इसलिए भी ज़्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि बीजेपी चाहती है कि वो उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-आरलडी गठबंधन की वजह से होने वाले नुक़सान की भरपाई पश्चिम बंगाल से कर ले.

कोलकाता के युवा

चेन्नई-मुंबई भागते कोलकाता के नौजवान

पश्चिम बंगाल की जनता मुद्दों के बारे में पूछने पर तपस कहते हैं कि शिक्षित बंगाली युवाओं को मनचाहा रोज़गार न मिलने की वजह से उनका बैंगलोर, चेन्नई और मुंबई जैसे शहरों में पलायन एक बड़ा मुद्दा है.

तपस के अनुसार तृणमूल कांग्रेस के शासन में आने और वामदलों के पतन की एक बड़ी वजह रोज़गार का अभाव था. कम्युनिस्ट पार्टियों के शासन में कुछ समय तक कृषि की स्थिति तो ठीक रही लेकिन धीरे-धीरे वो भी स्थिर होती चली गई. रोज़गार और विदेशी निवेश का बुरा हाल तो था ही.

हालांकि ममता बनर्जी भी रोज़गार और विदेशी निवेश लाने में कुछ ख़ास सफलता नहीं पा सकीं. वो कुछ देशों की यात्राओं पर ज़रूर गईं लेकिन वहां से ठोस निवेश नहीं ला पाईं. लोगों में अब भी इस बात को लेकर निराशा है.

हालांकि लोगों की इन तमाम शिकायतों के बावजूद ममता बनर्जी अब भी वहां अपना प्रभुत्व रखने में कामयाब हैं क्योंकि उनकी पार्टी का कैडर बहुत मज़बूत है.

तपस चक्रवर्ती बताते हैं, "टीएमसी का कैडर कितना मज़बूत हो गया है इसका सबूत है विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में उसके छात्र संगठनों की मौजूदगी. वाम छात्र संघ स्टूडेंट फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया (एसएफ़ाई) तो जैसे कहीं गुम ही हो गया है."

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी भी अपना कैडर दिन प्रतिदिन और मज़बूत कर रही है लेकिन अब भी उसकी पहुंच हिंदी-भाषियों तक ही ज़्यादा है. जानकार ये भी मानते हैं कि बीजेपी के इन कोशिशों का नतीजा इस लोकसभा चुनाव में कम लेकिन अगले विधानसभा चुनाव में ज़्यादा देखने को मिलेगा.

नरेंद्र मोदी, उद्धव ठाकरे

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र में शिवसेना और बीजेपी में आख़िरी वक़्त तक 'तू-तू-मैं-मैं' होती रही लेकिन आख़िकार दोनों पार्टियों ने फिर गठबंधन कर लिया.

दूसरी तरफ़ राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) ने चुनाव में हिस्सा तो नहीं लिया लेकिन उन्होंने रैलियां ख़ूब कीं और रैलियों 'ए लावा तो रे वीडियो' कहकर मोदी सरकार के दावों की धज्जियां उड़ाते रहे.

इस बारे में मराठी भाषा के लोकप्रिय अख़बार 'लोकसत्ता' के संपादक गिरीश कुबेर का मानना है कि 2019 के चुनाव में असल मायनों में सबसे बुरी हार शिवसेना की होगी.

गिरीश कहते हैं, "पिछले लोकसभा चुनाव में शिवसेना-बीजेपी गठबंधन को 41 सीटें मिली थीं. मुझे लगता है कि इस बार ये आंकड़ा सिमटकर 30-32 पर आ जाएगा. शिवसेना ने जिस तरह आख़िरी वक़्त तक बीजेपी के प्रति जैसा कटु बर्ताव दिखाया और अंत में उसी से हाथ मिला लिया, इससे मतदाताओं में अच्छा संदेश तो नहीं ही गया है."

गिरीश कुबेर इस बार महाराष्ट्र में राज ठाकरे को 'एक्स-फ़ैक्टर' मानते हैं.

राज ठाकरे

एक्स फ़ैक्टर: राज ठाकरे

उन्होंने बीबीसी से कहा, "हर चुनाव में कोई न कोई ऐसी पार्टी होती है जिसके बारे में ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल होता है कि वो आगे क्या करेगी. महाराष्ट्र में ये एमएनएस प्रमुख राज ठाकरे ने किया. उन्होंने 11-12 रैलियां कीं और हर रैली में मोदी सरकार के दावों को झुठलाने वाले वीडियो दिखाते रहे. इससे बीजेपी के कुछ वोट तो ज़रूर कट गए होंगे."

गिरीश के मुताबिक़ महाराष्ट्र में शिवसेना की स्थिति बिगड़ने और राज ठाकरे के उभरने से राज्य की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका और दिलचस्प हो जाएगी.

गिरीश कुबेर ये भी मानते हैं कि चुनाव से कुछ वक़्त पहले ही नेशनल कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) प्रमुख ने जिस तरह स्थानीय मुद्दों को उठाना शुरू किया, उसका असर भी नतीजों में कहीं न कहीं ज़रूर दिखेगा.

वो कहते हैं, "महाराष्ट्र को हमें दो हिस्सों में बांटकर देखना होगा. राज्य की 30 सीटें ग्रामीण क्षेत्रों में और 18 सीटें पूरी तरह शहरी. मुझे लगता है ग्रामीण इलाकों में एनसीपी के पक्ष में ज़्यादा वोट जाएंगे क्योंकि इतने गंभीर कृषि संकट के बावजूद केंद्र सरकार की इन इलाकों के प्रति अनदेखी से लोगों में, ख़ासकर किसानों में नाराज़गी है. मुझे हैरत नहीं होगी अगर एनसीपी 10-12 सीटें निकालने में कामयाब हो जाए."

गिरीश मानते हैं कि चुनावी नतीजों के बाद एनसीपी की महाराष्ट्र की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका तो रहेगी ही, केंद्र के लिए भी उसकी अनदेखी करना मुश्किल होगा.

बीजेपी का 'राष्ट्रवाद' और 'हिंदुत्व' एजेंडा महाराष्ट्र में कितना सफल रहा? गिरीश कुबेर मानते हैं कि शहरी लोगों के बीच ये एजेंडा काफ़ी हद तक स्वीकार्य रहा.

वो कहते हैं, "शहरी मध्यमवर्गीय तबका इन राष्ट्रवाद और हिंदुत्व जैसे मुद्दों से अछूता नहीं रहा. उनमें 'पुलवामा', 'बालाकोट एयर स्ट्राइक' और 'पाकिस्तान को सबक सिखाने' की खासी चर्चा रही लेकिन गांवों में लोगों पर खेती, मुआवजा, कर्ज़ माफ़ी, पानी और रोज़गार जैसे अहम बुनियादी मुद्दे हावी रहे."

विदर्भ में ख़ुदकुशी करने वाले एक किसान की पत्नी
इमेज कैप्शन, विदर्भ में ख़ुदकुशी करने वाले एक किसान की पत्नी

राष्ट्रवाद तो ठीक लेकिन रोज़ी-रोटी का क्या?

गिरीश कहते हैं, "मैंने चुनाव से पहले चुनाव के दौरान महाराष्ट्र के कई शहरी और ग्रामीण इलाकों का दौरा किया. इस तरह मैं महसूस कर पाया कि शहरी और ग्रामीण लोगों के मुद्दों में गहरा विभाजन है. महाराष्ट्र एक ऐसा राज्य है जहां शहरीकरण ख़ूब हुआ है लेकिन ग्रामीण इलाके भी उतने ही हैं. शहरों से सटे हुए गांव भी हैं. ऐसे में यहां गांवों की अनदेखी करने चुनाव जीत पाना मुश्किल है."

गिरीश कुबेर पिछले 40 साल में छह-सात संसदीय चुनाव कवर चुके हैं. वो कहते हैं कि 2019 के आम चुनाव में मुद्दों की विभिन्नता इसे इससे पहले के आम चुनावों से अलग करती है.

उन्होंने कहा, "मैंने ग्रामीण और शहरी मतदाताओं के बीच मुद्दों का इतना ज़्यादा फ़र्क कभी महसूस नहीं किया. सामाजिक और आर्थिक स्तर पर कुछ ऐसी ही भिन्नता है. ये काफ़ी चौंकाने वाली बात है."

योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश

दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है, ये बात पुरानी भले लगे लेकिन रहेगी हमेशा सच. अयोध्या में राम मंदिर के मुद्दे से लेकर कुंभ और फिर अमेठी, रायबरेली से लेकर लखनऊ, ये सारी हाई प्रोफ़ाइल सीटें लगातार चर्चा का विषय रहती हैं.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश से युवा दलित नेता चंद्रशेखर का उभरना, उनकी वाराणसी से चुनाव लड़ने का ऐलान और फिर फ़ैसला बदलना, प्रियंका गांधी वाड्रा का उनसे मिलना, सपा-बसपा का कांग्रेस पर मतदाताओं के बीच भ्रम फैलाने का आरोप और इसी बीच बीएसएफ़ के पूर्व जवान तेजबहादुर यादव का प्रधानमंत्री मोदी के ख़िलाफ़ वाराणसी से चुनाव लड़ने का ऐलान.

सपा द्वारा तेजबहादुर को टिकट दिया जाना, उनका नामांकन रद्द होना और लखनऊ से सपा के टिकट पर शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी पूनम सिन्हा को राजनाथ सिंह के ख़िलाफ़ मैदान में उतारा जाना. चौंकाने वाले तमाम घटनाक्रमों की ये लिस्ट बहुत लंबी है. लेकिन इन सब घटनाक्रमों में शायद सबसे अहम है समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल का गठबंधन.

अखिलेश यादव, मायावती

बीजेपी बनाम महागठबंधन

वरिष्ठ पत्रकार और उत्तर प्रदेश की राजनीतिक पर बारीकियों से नज़र रखने वाले महेंद्र प्रताप का मानना है कि सत्ताधारी बीजेपी को सपा-बसपा-आरएलडी से कड़ी चुनौती मिल रही है.

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "अब तक का हाल देखकर मुझे लगता है कि यूपी में बीजेपी की सीटें लगभग आधी हो जाएंगी. पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीति बहुत हद तक जातीय समीकरणों पर चलती है और यहां गठबंधन काफ़ी मज़बूत होकर उभरा है."

अगर बात छोटी पार्टियों की करें तो महेंद्र प्रताप कहते हैं कि इनकी भूमिका भी महत्वपूर्ण रहेगी. इसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपना दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) और निषाद पार्टी जैसे दल अगर जीतने की स्थिति में नहीं हैं तो वोटों का बंटवारा करने की स्थिति में तो ज़रूर हैं.

'जातियों पर टिके चुनाव'

मुद्दों के सवाल पर महेंद्र प्रताप कहते हैं, "जैसे-जैसे चुनाव बीतते गए वैसे-वैसे उत्तर प्रदेश में मुद्दे गौण होते गए. पहले और दूसरे चरण के चुनाव के दौरान गन्ना किसानों की समस्याओं जैसे मसलों पर बात करने की कोशिश ज़रूर की गई लेकिन बाद में स्थानीय मुद्दे ग़ायब होते गए और आख़िर में चुनाव जातियों पर ही आकर टिक गया."

उत्तर प्रदेश में इस बार सबसे ज़्यादा फ़ायदे में कौन रहेगा? इसके जवाब में महेंद्र प्रताप कहते हैं, "पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली थी. अगर इस बार वो दो सीटें भी जीतती है तो उसके लिए ये बहुत बड़ी जीत होगी. प्रियंका गांधी के आने और राहुल गांधी की सक्रियता के बाद कांग्रेस की भी कुछ सीटें बढ़ने की उम्मीद है. सपा की सीटें बढ़ने की भी उम्मीद जताई जा रही है."

महेंद्र प्रताप के मुताबिक़ एक और बात जो इस लोकसभा चुनाव को पिछले लोकसभा चुनावों से अलग बनाती हैं, वो ये है कि इस बार पार्टियों में मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने की पहले जैसी होड़ नहीं दिखी, जबकि उत्तर प्रदेश में तक़रीबन 19 फ़ीसदी मुसलमान वोटर हैं.

नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार

बिहार

भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने बिहार के सिवान और गोपालगंज में दिए अपने एक चुनावी भाषण में कहा, "हम जीतें या हारें, हम देश की सुरक्षा से समझौता नहीं करेंगे." इससे पहले तक वो शाह हर जगह कहा करते थे, "अबकी बार 300 पार."

क्या अमित शाह का ये रवैया बिहार में बीजेपी की डगमगाती हालत को दर्शाता है? बिहार की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति पर नज़र रखने वाले प्रोफ़ेसर डीएम दिवाकर इस सवाल का जवाब 'हां' में देते हैं.

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "बीजेपी के लिए चीज़ें पिछली बार की तरह आसान तो नहीं हैं. दूसरी बात ये कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को 'विकास' और 'सुशासन' के नाम पर वोट मांगने के लिए जाना जाता है लेकिन दूसरे और तीसरे चरण के बाद वो भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राष्ट्रवाद और पीएम मोदी के नाम पर वोट मांगने लगे जबकि पहले ये कहा जाता था कि देश के बाकी हिस्सों में लोग भले मोदी के नाम पर वोट दें लेकिन बिहार में लोग नीतीश के नाम पर वोट करते हैं. ये स्थिति अब बदल चुकी है."

इसके अलावा बीजेपी के चार ऐसे उम्मीदवार हैं जिन्हें टिकट नहीं मिला है.

डीएम दिवाकर के मुताबिक़ ऐसे लोग 'वोटकटवा' की भूमिका में आ सकते हैं. डीएम दिवाकर मानते हैं कि बिहार में भी सत्ता विरोध लहर का प्रभाव है. इसका सबूत है कि बीजेपी नेताओं का अपनी रैलियों और चुनावी भाषणों में 'नोटबंदी' और 'जीएसटी' जैसी योजनाओं का ज़िक्र न करके 'राष्ट्रवाद' और 'पाकिस्तान में एयरस्ट्राइक' के नाम पर वोट मांगना.

तेजस्वी यादव, राबड़ी देवी

'तेजस्वी के पक्ष में जा सकते हैं सिंपैथी वोट'

अगर बात लालू यादव की ग़ैर मौजूदगी की करें तो दिवाकर मानते हैं कि इसका नुक़सान आरजेडी को होगा लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष ये है कि लोगों के 'सिंपैथी वोट' भी पार्टी को मिल सकते हैं.

दिवाकर कहते हैं, "तेजस्वी ने जिस तरह बिहार की राजनीति में अपनी जगह बनाई है वो शायद इसलिए ही मुमकिन हो पाया है क्योंकि उनके पिता उनके साथ नहीं हैं. अगर लालू बाहर होते तो तेजस्वी इतनी जल्दी परिपक्व नहीं हो पाते और न ही लोग इतनी जल्दी उनके पक्ष में आते."

अगर बात निषाद समुदाय के नेता और विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के संस्थापक मुकेश सहनी, पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) की करें तो प्रोफ़ेसर दिवाकर की राय में इनसे बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ेगा.

हां, इन पार्टियों ने ये संदेश ज़रूर दिया है कि बिहार में सिर्फ़ मुसलमान या यादव मतदाता ही निर्णायक भूमिका नहीं निभाते बल्कि दूसरी पिछड़ी जातियां और दलित भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं.

बिहार में कृषि संकट एक गंभीर मुद्दा है.

किसानों के बारे में कौन सोचेगा?

मुद्दों के बारे में पूछने पर प्रोफ़ेसर दिवाकर कहते हैं कि बाकी जगहों की तरह बेरोज़गारी तो एक यूनिवर्सल मुद्दा है ही इसके अलावा बिहार में दो-तीन और प्रमुख मुद्दे हैं.

प्रोफ़ेसर दिवाकर कहते हैं, "बिहार भयंकर कृषि संकट से जूझ रहा है. इसके अलावा खेती और पशुपालन से जुड़ी दूसरी समस्याएं भी हैं. मिसाल के तौर पर बिहार में मछलियां आंध्र प्रदेश से आयात की जाती हैं जबकि हमारे यहां तालाब और पानी से भरपूर क्षेत्रों की कोई कमी नहीं है. नीतीश कुमार के समय में इंफ़्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में विकास बेशक़ हुआ लेकिन रोज़गार, खेती और बाकी सुविधाओं के लिए अभी बहुत काम होना बाकी है. इसका अहसास मतदाताओं को बख़ूबी है."

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