राहुल गांधी की न्याय स्कीम कामयाब होगी या नहीं?

राहुल गांधी
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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बीती 25 मार्च को ऐलान किया है कि अगर कांग्रेस आगामी लोकसभा चुनाव जीतकर अपनी सरकार बनाती है तो सरकार भारत के पांच करोड़ सबसे ग़रीब परिवारों को सालाना 72,000 रुपये देगी.

उन्होंने कहा, "इस तक पहुंचने के लिए कांग्रेस पार्टी सरकार में आने पर देश की 20 फ़ीसदी निर्धन परिवारों को 72 हज़ार रुपये सालाना की मदद करेगी. यानी छह हज़ार रुपये प्रति माह की मदद की जाएगी."

सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी ने कहा है कि ये एक चुनावी योजना है जिसे गंभीरता से लिए जाने की ज़रूरत नहीं है.

लेकिन कुछ अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि ये एक ऐसा प्रस्ताव है कि जिससे भारत में ग़रीबी ख़त्म की जा सकती है. वहीं, कुछ अर्थशास्त्रियों ने इस योजना के क्रियान्वन को लेकर सवाल खड़े किए हैं.

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न्याय स्कीम क्यों अच्छी है?

दुनिया के अलग अलग हिस्सों में आर्थिक असमानता पर शोध करने वाली संस्था वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब के सह-निदेशक और वरिष्ठ अर्थशास्त्री लूकस चांसेल ने इस योजना को सराहते हुए इसे एक परिवर्तनकारी कदम बताया है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, लूकस चांसेल ने कहा है, "भारत में बीते तीन दशकों से असमानता तेजी से बढ़ रही है. ये एक स्वागत योग्य कदम है कि एक पार्टी ऐसी योजना लेकर आई है जिससे पंक्ति में आख़िरी छोर पर खड़े लोगों के जीवनस्तर को ऊपर उठाया जा सके. न्यूनतम आय गारंटी स्कीम कोई जादू नहीं है लेकिन ये पूरी कहानी को बदल सकता है."

इसके बाद जब उनसे पूछा गया कि इससे भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा तो उन्होंने कहा, "72 हज़ार रुपये प्रतिवर्ष आय गारंटी के लिहाज़ से हम उसी आंकड़े पर पहुंचे हैं जो आंकड़ा कांग्रेस पार्टी ने दिया है. बल्कि ये थोड़ा कम है. इसकी कीमत भारत की जीडीपी का 1.3 फीसदी होगा. लेकिन अगर एक लाख़ रुपये न्यूनतम आय गारंटी की घोषणा की जाती तो वह भारतीय जीडीपी का 2.6 फीसदी होता."

चांसेल ने राहुल गांधी के इस धनराशि को हासिल करने की प्रक्रिया पर भी अपनी प्रतिक्रिया दी.

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बढ़ती अमीरी ग़रीबी की खाई

उन्होंने कहा, "अंतरराष्ट्रीय लिहाज़ से भारत में कराधान कम है. और मौजूदा इनकम टैक्स कंप्लाएंस बढ़ाकर और देश के सबसे अमीर लोगों पर टैक्स लगाकर इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है. भारत की 0.1 फीसदी की आबादी (ढाई करोड़ से ज़्यादा की संपत्ति रखने वाले) पर 2 फीसदी वार्षिक पूंजी कर लगाया जाए तो इससे जीडीपी का 1.1 फीसदी हिस्सा हासिल किया जा सकता है. और इस कराधान से भारत की 99.9 फीसदी आबादी पर कोई फर्क भी नहीं पड़ेगा."

भारत में सबसे अमीर वर्ग की बढ़ती आर्थिक क्षमता पर नज़र डालें तो भारत के 1 फीसदी लोगों की आय साल 1980 से 2019 के बीच छह फीसदी से बढ़कर 21 फीसदी हुई है.

इस पहलू पर बात करते हुए चांसेल कहते हैं, "ये असमान वृद्धि बताती है कि सबसे ग़रीब लोगों को उतनी आय नहीं होती है जितनी उनके अंदर क्षमता है. ऐसे में ग़रीबी उतनी तेजी से कम नहीं होती है जितनी तेज़ी से ऐसा हो सकता है."

इकॉनोमिक टाइम्स में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़, एक वरिष्ठ फ्रांसीसी अर्थशास्त्री गाय सॉरमन कहते हैं, "अर्थशास्त्रियों के बीच न्यूनतम आय गारंटी योजना के तहत नकदी दिया जाना ग़रीबी दूर करने का सबसे प्रभावी तरीका है."

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी से जुड़ीं अर्थशास्त्री राधिका पांडेय इस स्कीम को सैद्धांतिक रूप से सही पाती हैं.

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इनकम ट्रांसफ़र एक बेहतर विकल्प

ब्लूमबर्ग क्विंट के साथ बातचीत में वह कहती हैं, "सैद्धांतिक रूप से ये स्कीम बहुत ही बढ़िया है. जब भी हमारे सामने ग़रीबों को सीधे आय पहुंचाने की स्कीमें आती हैं तो ये योजनाएं कर्जमाफ़ी जैसी दूसरी समाज कल्याण योजनाओं के मुक़ाबले बाहरी कारकों से कम प्रभावित होती हैं. ऐसे में ये सिद्धांत और रूपरेखा के आधार पर ग़रीबों की मदद करने के लिए सबसे आदर्श योजना है"

कर्ज़माफ़ी जैसी योजनाएं तमाम पहलुओं से प्रभावित होती है जिनमें उनके क्रियान्वन के लक्ष्यों की पूर्ति और उनके दीर्घकालिक असर शामिल हैं.

वहीं, बैंक खातों में सीधे धनराशि ट्रांसफर होने की स्थिति में ऐसे कारक सामने नहीं आते हैं.

हालांकि, अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग ऐसा भी है जो कि इस स्कीम पर सवाल खड़े कर रहा है. कई अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि अगर समस्या इतनी ज़्यादा है तो पैसा कहां से आएगा और क्या इस स्कीम के क्रियान्वयन में दूसरी समाज कल्याण योजनाओं के बजट में तो कटौती नहीं की जाएगी.

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न्याय स्कीम में क्या हैं कमियाँ?

कई अर्थशास्त्री इस तरह की योजनाओं की प्रकृति पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि किसी देश को आगे बढ़ने के लिए ज़्यादा काम करने की ज़रूरत होती है. लेकिन इसकी जगह अगर लोगों को घर बैठे फ्री में आय होने लगे तो वो काम क्यों करेंगे.

रेटिंग्स देने वाली संस्था केयर रेटिंग्स के प्रमुख अर्थशास्त्री मदन सबनवीस इसी बात को उठाते हुए कहते हैं, "लोगों को कैश देने की जगह रोजगार दिया जाना चाहिए. लेकिन इससे पहले भी कई सरकारों ने रोजगार सृजित करने के लिए प्रयास किए हैं लेकिन उनसे वो अपेक्षित लक्ष्य हासिल नहीं हुए हैं. अगर आप मनरेगा की ओर देखें तो वह भी एक हद तक ही प्रभावी है. हमने देखा है कि इससे ग़रीबी में ज़्यादा कमी नहीं आई है. ऐसे में जब सरकार नौकरियां नहीं दे सकती है तो यही सही है."

वहीं, कुछ अर्थशास्त्री इस स्कीम के अमलीकरण और 12000 रुपये के आंकड़े को लेकर अपनी चिंताएं ज़ाहिर करते हैं.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र पढ़ाने वाली प्रोफेसर जयती घोष अंग्रेजी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में छपे अपने लेख में बताती हैं कि समस्या ये नहीं है कि ये स्कीम अच्छी है या बुरी है. समस्या ये है कि जो आंकड़ा चुना गया है वो बहुत ऊपर का है.

जयती लिखती हैं, इस स्कीम की आलोचना इसके आर्थिक भार को लेकर नहीं है. बल्कि इसके अमलीकरण और आर्थिक संसाधनों के बेहतर उपयोग के दूसरे बेहतर तरीकों को लेकर है."

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सवाल बहुत हैं

"इस योजना के मुताबिक़, न्यूनतम आमदनी गारंटी को 12 हज़ार रुपये प्रतिमाह तय किया गया है. ये बहुत ज़्यादा है. कई राज्यों में मजदूरी दर इससे कम है. इसके अलावा केंद्र सरकार आंगनवाड़ी और आशा वर्कर्स को भी इस राशि का एक तिहाई हिस्सा देती है. ऐसे में अगर देश के सबसे ज़्यादा गरीब बीस फीसदी परिवारों को 12 हज़ार रुपये प्रति माह मिलता है तो देश में लगभग 5 करोड़ लोग इससे लाभांवित होंगे."

"लेकिन, अगर इस स्कीम को अमल में लाने के लिए दूसरी लाभकारी योजनाओं जैसे मातृत्व लाभ और स्कॉलरशिप को बंद किया जाता है तो इससे बड़ी दिक्कतें पैदा होंगी. क्योंकि उन योजनाओं के लक्ष्य अलग हैं. "इसके अलावा इस स्कीम को अमल में लाने के लिए ये तय करना बहुत मुश्किल होगा कि ग़रीब कौन है और कौन नहीं. क्योंकि जो व्यक्ति 2011 (जब आख़िरी बार जनगणना हुई) में ग़रीब था तो वो अभी भी उतना ही ग़रीब हो ये निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है. ऐसे में उन लोगों को तय करना मुश्किल होगा जो इस योजना से लाभांवित होंगे. इसके बाद अगली समस्या ये होगी कि इस पैसे को किस तरह से पंक्ति में खड़े आख़िरी व्यक्ति तक पहुंचाया जाएगा.

कांग्रेस पार्टी की इस स्कीम को लेकर अर्थशास्त्रियों में अलग-अलग राय है लेकिन ज़्यादातर अर्थशास्त्री इसके उद्देश्य को सही मानते हुए दिखते हैं. लेकिन वे इसके अमलीकरण और इससे पूरे होने वाले उद्देश्यों की संभाव्यता पर सवाल उठाते हैं.

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