बिहार में एक मामले में फँसे पत्रकार ने राजस्थान पहुँचकर क्या कहा?

दुर्ग सिंह राजपुरोहित, बाड़मेर
    • Author, नारायण बारेठ
    • पदनाम, राजस्थान से, बीबीसी हिंदी के लिए
  • प्रकाशित

राजस्थान में पत्रकार के तौर पर काम करने वाले दुर्ग सिंह राजपुरोहित हैरान और परेशान है. हफ्ते भर जेल में रहने के बाद को अभी-अभी जेल से छूटे हैं.

राजपुरोहित राजस्थान के सीमावर्ती ज़िले में रहते हैं. वो हाल में बिहार की जेल में सप्ताह भर बिताने के बाद ज़मानत पर छूटे हैं और अपने घर पहुंचे हैं.

वो कहते हैं, जो गुनाह उन्होंने कभी किया ही नहीं वो गुनाह उनके नाम लिख दिया गया.

राज्य में सत्तारूढ़ बीजेपी और विपक्षी कांग्रेस ने इस पूरे मामले की जाँच की मांग की है.

बिहार के पटना में राजपुरोहित के विरुद्ध एक स्थानीय व्यक्ति राकेश पासवान ने एससी-एसटी कानून (अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण क़ानून) के तहत मुकदमा दर्ज करवाया है.

राजपुरोहित ने बीबीसी को बताया, "मैं कभी वहां गया ही नहीं. इसमें कुछ बड़े लोगों का हाथ है. इसमें कथित रूप से सत्तारूढ़ पार्टी के कुछ नेता शामिल हैं. मेरी छपी ख़बरों से नेता नराज़ थे."

बाड़मेर से बीजेपी के सांसद रहे मानवेन्द्र सिंह कहते हैं, "यह बहुत गंभीर घटना है. इसकी ठीक से जांच होनी चाहिए."

दुर्ग सिंह राजपुरोहित, बाड़मेर
इमेज कैप्शन, दुर्ग सिंह राजपुरोहित 25 अगस्त को पटना से दिल्ली पहुंचे थे

शिकायत दर्ज करने वाले ने पहचानने से किया इनकार

बाड़मेर पुलिस ने राजपुरोहित को 18 अगस्त को तलब किया और पटना से पहुंचे एक वारंट की तामील करते हुए गिरफ्तार कर लिया था.

राजपुरोहित और उनके परिवार के लिए यह बड़े सदमे की तरह था. उन्हें यकीन नहीं हुआ कि ऐसा भी कभी हो सकता है.

पुलिस ने राजपुरोहित की गिरफ्तारी के बाद पटना का रुख़ किया और उन्हें स्थानीय अदालत में पेश किया गया जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. बाद में 25 अगस्त को उन्हें जमानत मिल गई.

बाड़मेर के पुलिस अधीक्षक मनीष अग्रवाल ने बीबीसी से कहा, "पुलिस को वांरट मिला था तो उसका निष्पादन करवाना ज़रूरी था, वही करवाया है. पुलिस ने इस बारे में जो भी कानूनसम्मत है, वो कार्रवाई की है."

राजपुरोहित कहते हैं कि उन्हें बीते कुछ वक्त से से धमकियां मिल रही थीं. उनका आरोप है कि "कुछ प्रभावशाली लोग मेरी पत्रकारिता से नाराज़ हैं."

वो कहते हैं, "मैं सोच भी नहीं सकता कि कोई ऐसा भी कर सकता है. जिस व्यक्ति राकेश पासवान की शिकायत पर यह मुकदमा दर्ज किया गया है, मैं न उनसे कभी मिला ना तो कभी पटना गया."

इससे पहले फरियादी यानी राकेश पासवान ने स्थानीय मीडिया से कहा कि वो राजपुरोहित को नहीं जानते हैं.

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राजपुरोहित समाज का प्रदर्शन
इमेज कैप्शन, मामले की जांच की माग करते हुए राजपुरोहित समाज का विरोध प्रदर्शन

राजपुरोहित कहते है जब पुलिस ने उन्हें किसी वारंट की जानकारी दी और तलब किया तो वो यह फरियाद लेकर आये थे कि उन्हें कुछ मोहलत दी जाए, ताकि वो इसकी सच्चाई का पता कर सके और कानूनी सलाह ले सकें.

वो कहते हैं, "मगर पुलिस ने इसे अनसुना कर दिया और गिरफ्तार कर लिया."

राजपुरोहित का आरोप है कि "इस पूरे मामले में कुछ बड़े लोग शामिल हैं और उन्हें सबक सिखाने के लिए उन्हें गिरफ्तार करवाया गया था."

बाड़मेर से कांग्रेस विधायक मेवाराम जैन कहते हैं "वो राजपुरोहित की गिरफ्तारी की निंदा करते है और इस घटना की उच्चस्तरीय जांच की मांग करते हैं. ऐसी घटनाओं से आम आदमी का हौसला टूटता है. हम चाहते हैं कि इस पूरे मामले की जांच होनी चाहिए."

बाड़मेर में शिव क्षेत्र से बीजेपी विधायक मानवेन्द्र सिंह कहते हैं, "यह कानून और अधिकारों के दुरूपयोग का बड़ा मामला है. क्या अधिकारियों को ऐसे मामले में अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए था."

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दुर्ग सिंह राजपुरोहित, बाड़मेर

मामला क्या था?

इस मामले में बिहार के नालंदा ज़िले के राकेश पासवान ने गत 31 मई को पटना में स्थानीय अदालत में राजपुरोहित के विरुद्ध परिवाद दायर करवाया और आरोप लगाया कि राजपुरोहित ने उसके साथ पटना आकर मारपीट की.

फ़रियादी के अनुसार राजपुरोहित बाड़मेर में पत्थर तुड़वाने के अपने काम के लिए पासवान को ले गए और काम करवाया, लेकिन जब वो काम छोड़ आया तो उसे वापस ले जाने के पटना आकर मारपीट की और जातिसूचक गालियां दीं.

राजपुरोहित कहते हैं, "ये पूरी कहानी ही बनावटी है. क्योंकि उन्होंने जिन तिथियों का जिक्र किया गया है उस दिन मैं बाड़मेर में था ही नहीं. सीसीटीवी और अन्य माध्यमों से इसकी प्रमाणिकता साबित हो जाती है."

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राज्य के पत्रकार संगठनों ने भी घटना की निंदा की है.

दलित अधिकार कार्यकर्ता सतीश कुमार कहते हैं, "ऐसी घटनाएं वंचित वर्गो की रक्षा के लिए बने कानून और उसे नुकसान पहुँचाने की साजिश है."

यूँ तो राजस्थान के सरहदी जिले बाड़मेर और बिहार के पटना में न तो कोई साम्यता है, न ही नज़दीकियां, मगर एक कागज़ के पन्ने ने इस फ़ासले को पलभर में पाट दिया.

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