गोरखपुर: मठ की राजनीति पर क्या असर डालेंगे उपचुनाव के नतीजे

गोरखपुर
    • Author, कुमार हर्ष
    • पदनाम, गोरखपुर से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
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गोरखपुर संसदीय सीट के लिए हुए उप-चुनाव के नतीजे भले ही आदित्यनाथ योगी और उनकी गोरक्षपीठ के लिए असहज करने वाले हों लेकिन ये नतीजे उतने भी ख़राब नहीं हैं जैसे इस इलाक़े के 'सबसे बड़े आस्था के केंद्र' ने 1971 में देखे थे.

उस साल हुए लोकसभा चुनाव में तत्कालीन महंत अवैद्यनाथ कांग्रेस उम्मीदवार नरसिंह नारायण पांडेय से 37,578 वोटों से हारकर वह सीट गंवा बैठे थे जो उन्होंने अपने गुरु और तत्कालीन सांसद महंत दिग्विजयनाथ की असामयिक मृत्यु के बाद 1970 में हुए उप-चुनाव में जीत कर हासिल की थी.

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इमेज कैप्शन, महंत दिग्विजयनाथ

गोरखपुर ही नहीं बल्कि नेपाल सहित दूर-दराज के अनेक क्षेत्रों में अपना प्रभाव रखने वाली इस पीठ के लिए निस्संदेह यह एक अप्रिय स्थिति थी.

इसके बाद अगले 18 सालों तक गोरक्षपीठ ने राजनीति से दूरी बनाये रखी.

मठ की राजनीति बदलेंगे?

मगर 1989 में जब श्रीरामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद बड़ा आकार ले रहा था तब उस आंदोलन के एक बड़े नेता रहे महंत अवैद्यनाथ फिर से चुनावी समर में उतरे और जीते भी.

योगी आदित्यनाथ

1998 में अपने उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ के सांसद निर्वाचित होने तक वे लगातार गोरखपुर के सांसद बने रहे.

भारत की शायद ही किसी और संसदीय सीट से किसी पीठ का इतना गहरा रिश्ता रहा होगा.

साल 1951 से लेकर अब तक के 57 सालों में से 32 वर्ष तक गोरखपुर संसदीय सीट पर इसी पीठ का महंत सांसद बना रहा है.

इस अवधि में हुए 18 चुनावों में से 10 में जीत इस पीठ को ही हासिल हुई.

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इसलिए अब जबकि यह सीट 29 साल बाद किसी दूसरे शख़्स के नाम हो गई है, यह सवाल उठना लाज़िम है कि अब मठ की राजनीति कैसी होगी? उसके लक्ष्य और प्रभार क्या होंगे?

यह सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि आदित्यनाथ योगी अपने समाधिस्थ गुरु महंत अवैद्यनाथ से कई मामलों में अलग हैं.

उनकी राजनीति को नज़दीक से जानने वाले इस बात का अनुमान आसानी से लगा सकते हैं कि नतीजे आने के बाद योगी के मन में क्या चल रहा होगा.

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अपने गुरु की तरह निर्लिप्त भाव से राजनीति से मुँह फेर लेने की बजाय वे इस हारी हुई जंग को जीतने के लिए बेचैनी से भरे होंगे.

क्या बदल पाएंगे हार को जीत में?

पर क्या ये इतना आसान होगा? इसका जवाब 'हाँ' में देना आसान नहीं है. इसके बहुत से कारण हैं.

पहला तो ये कि सूबे के मुख्यमंत्री और विधान पार्षद बनने के बाद सीधे तौर पर इस सीट से उनका कोई जुड़ाव नहीं है.

अंदरखाने की ख़बर रखने वाले ये दावा करते हैं कि योगी उप-चुनाव में मठ से जुड़े किसी व्यक्ति की उम्मीदवारी इसीलिए चाहते भी थे ताकि यह 'जुड़ाव' कायम रहे पर ऐसा हो नहीं सका.

योगी आदित्यनाथ

दूसरी बात ये कि 29 साल बाद बाज़ी पलटने वाले दल 'उच्च प्रतीकात्मक महत्व' रखने वाली इस सीट को बचाये रखने के लिए कोई कोर क़सर नही छोड़ेंगें.

जाति के जादुई रसायन के सफल परीक्षण के बाद अगली कोशिश इसे दीर्घजीवी बनाने की होगी जो मठ के माथे पर चिंताएं उकेरेंगी.

तीसरा, अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों में यूपी बहुत अहम है. लिहाज़ा योगी की ज़िम्मेदारी है कि वे इसे अमली जामा पहनाने के लिए हर सम्भव जतन करें.

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इस अपेक्षाकृत विशाल चुनौती के बीच वे अपनी सीट और इलाक़ाई राजनीति में पीठाधीश्वर के बतौर अपनी भूमिका को कैसे सहेजेंगे और ये देखना दिलचस्प होगा.

कीचड़ नहीं तो कमल नहीं

यह सचमुच एक अजब संयोग है कि पिछले 25 सालों में जबकि सूबे और एक बार को छोड़कर केंद्र में ग़ैर भाजपाई सरकारें सत्ता में होती थीं तब योगी विपक्ष में होते हुए भी इस इलाक़े के निर्विवाद क्षत्रप बने रहे.

लेकिन अब जबकि केंद्र और राज्य दोनों जगह उन्ही की पार्टी सत्ता में है, उनकी यह स्थिति 'परिस्थितिजन्य चुनौतियों' के घेरे में है जहां बाहर के ही नहीं बल्कि पार्टी के भीतर के उनके विरोधी भी उन्हें दांव देने के लिए सक्रिय हैं.

योगी आदित्यनाथ

दरअसल योगी की ताक़त और हैसियत को सबसे ज़्यादा लाभ सपा और बसपा सरकारों में हुआ. इस दौरान ख़राब कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार को योगी निशाना बनाते रहे. बात-बात पर वो सड़कों पर उतर आते थे. यही वजह थी कि योगी गोरखपुर के लोगों के लिए ज़रूरी हो गए थे.

अब अपनी ही सरकार में उन्हें ऐसा 'कीचड़' मिला नहीं जहां स्वाभाविक रूप से 'कमल खिल सके'.

इससे उलट कानून का राज स्थापित करने की उनकी मुहिम में ख़ुद उनकी पार्टी के छोटे से लेकर बहुत बड़े चेहरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई ने कार्यकर्ताओं को निराश और उदासीन बनाने में अहम भूमिका निभाई.

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और आगे भी योगी के लिए नए सिरे से ये संतुलन साधना बहुत कठिन होगा.

लक्ष्य के लिए पार करनी होगी खाई

परिणाम के बाद एक बार फिर से ये सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या मठ के बगैर इस इलाक़े में भाजपा का अपना कोई वजूद नहीं?

यदि था तो वह चुनाव क्यों हार गई? और यह भी कि भाजपा का अपना सांगठनिक ढांचा अपने समर्थक वोटरों को बूथों तक क्यों नहीं ले जा पाया.

योगी और उनके समर्थक चाहेंगे कि इसका जवाब 'हाँ' में ही पढ़ा जाए ताकि अगले चुनाव में इस सीट का मठ से जुड़ाव फिर से हो सके.

बहुत सम्भव है कि पार्टी अगली बार उन्हीं पर दांव लगाए क्योंकि जाति रसायन की काट का हथियार सिर्फ़ वही हो सकते हैं.

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मगर इस बीच उन्हें और भी बहुत सारी खाईयां पाटनी होंगी.

कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग बेलगाम नौकरशाही के चलते पिटा हुआ महसूस कर रहा था और यह उपेक्षा इस चुनाव में उदासीनता की शक़्ल में साफ़ नज़र आई.

उन्हें अचानक उग आई उन अदृश्य दीवारों को भी ख़ुद ही गिराना होगा जो उनके परम्परागत समर्थकों को उनसे दूर करती रहीं.

बार-बार और लगातार दौरों के बीच लाल बत्तियां, ढेरों गाड़ियों और प्रशासनिक फ़ौज भाड़े की भीड़ होती रही मगर उनके अपने समर्थक दूर होते गए.

इनमें मानबेला के वे किसान भी थे जो उन्हें मसीहा मानते हुए हमेशा वोट करते आये थे लेकिन बीते दिनों लाठी के बल पर उनकी ज़मीनें खाली कराए जाते वक़्त उन्हें मसीहा की मदद हासिल नहीं हुई.

अपनी आध्यात्मिक शक्ति वाली पीठ को राजनीतिक शक्ति देने के लिए उन्हें इस गुमशुदा मसीहा की तलाश भी करनी होगी.

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