नज़रिया: 'सरकारी बैंको का निजीकरण समस्या को और बड़ा कर देना है'

बैंकों के एनपीए को ले कर लोगों का विरोध प्रदर्शन
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हाल में आए पीएनबी घोटाले के बाद कुछ हलकों से इस तरह की बातें उठ रही है कि सरकारी बैंकों में कामकाज करने के तरीके में खामियां हैं.

कुछ को लगता है कि बैंकों का सरकारी बैंकों का निजीकरण यानी बैंकों को निजी हाथों में दे दिया जाना इस समस्या से निपटने का सही तरीका है.

यहां पर इस बात की और तवज्जो देना काफी महत्वपूर्ण है कि सरकारी बैंकों की शाखाएं दूरदराज़ की ऐसी जगहों पर भी होती हैं जहां निजी बैंक पहुंचना पसंद नहीं करते.

साथ ही सरकारी बैंक गांव-देहात कर सरकारी मदद या सरकार की योजनाओं का लाभ पहुंचाते हैं. ऐसे में इन बैकों पर निर्भर रहने वाले गरीबों के लिए क्या सरकारी बैंकों के निजीकरण के क्या मायने होंगे? क्या इससे उन्हें मिलने वाली सरकारी सुविधओं पर भी असर पड़ सकता है.

इस सवाल का जवाब पाने के लिए बीबीसी संवाददाता मानसी दाश ने बात की बैंक ऑफ़ बड़ौदा के रिटायर्ड कार्यकारी निदेशक आर के बक्शी से और उनसे पूछा कि क्या सरकारी बैंकों का निजीकरण वाकई इस समस्या से निजात पाने का सही रास्ता है.

भारतीय बैंक

पढ़िए आरके बक्शी का नज़रिया

अगर हम भारत में बैंकिंग का इतिहास देखें तो 1969 में जब बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया तो उसने भारतीय बैंकिंग को एक नई दिशा दी. उस वक्त पूरे भारत में कुल 8,200 और ग्रामीण और सेमी अर्बन इलाकों में बैंकों की शाखाएं बहुत कम थीं. ज़ाहिर है कि भारत के अधिकतर लोग बैंकिंग सेवाओं से महरूम रहे.

आज देश में बैंकों की 80-90 हज़ार शाखाएं हैं. बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकों की शाखाओं का विस्तार हुआ और कृषि ऋण बैंकों की परिभाषा में शामिल हो गया. बैंकों ने पांच रुपये की पूंजी रखने वालों का भी खाता खोलना शुरू किया, कम ब्याज दर पर छोटे उद्योगों को ऋण देना शुरु किया. और इस तरह बैंकों ने उन सभी तक पहुंचने की कोशिश की जिन्होंने जमाकर्ता या उधारकर्ता के रूप में कभी बैंकों की सेवाएं नहीं ली थीं.

आर्थिक तौर पर निचले पायदान के लोगों को बैंकों ने एक जमाकर्ता के रूप में सम्मान देना शुरु किया जो बैंकों की बड़ी उपलब्धि थी. इसे आप फाइनेन्शिल इन्क्लूशन का पहला चरण कह सकते हैं.

इससे पहले भी कुछ बैंक थे लेकिन वो प्राइवेट क्षेत्र में थे और उनका उद्देश्य केवल लाभ कमाना था.

निजी बैंक

बैंकों का एकमात्र लक्ष्य लाभ नहीं होना चाहिए?

जब कोई दुर्घटना हो जाती है उस वक्त बैंकों के निजीकरण की आवाज़ उठाना बहुत आसान है. लेकिन सिर्फ घोटालों की बात नहीं है जब ऐसी बात सामने आती है. इससे पहले जो बड़ी घटना हुई थी जब बैंकों के निजीकरण की बात की गई वो थी बैंकों के बढ़ते हुए नॉन परफॉर्मिंग ऐसेट्स यानी एनपीए के सामने आने की.

कहा ये गया कि है कि बैंकों के कॉर्पोरेट लोन में 15-20 फीसदी का एनपीए हो गया है जो कुल मिला कर 10-12 फीसदी हो गया है और इससे बैंकों की लाभप्रदता पर कम हो गई है.

ये कहा गया कि इससे बैंकों की पूंजी कम हो जाएगी और इससे बैंकों के अंतरराष्ट्रीय मानक बेसेल पर वो खरा नहीं उतर पाएंगी. इसका सीधा असर बैंकों के लोन देने की क्षमता पर पड़ेगा और इस पर बाद में रोक भी लग सकती है.

ये समस्याएं तो है लेकिन इसका निदान निजीकरण बिल्कुल नहीं है.

बैंक में पैसे जमा करने आई महिला

भारत जैसा देश में जो आर्थिक दृष्टि से, शैक्षणिक दृष्टि से, सामाजिक दृष्टि से और इंफ्रास्ट्रक्चर की उपलब्धता की दृष्टि से काफी पीछे है, उसमें ये सोचना कि लाभ ही बैंकों का एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए ये अपने आप में एक बड़ा सवाल है जिसके हमें उत्तर तलाशना है.

इसके बावजूद 1991 में भारत में प्राइवेट बैंक आए जिनका एकमात्र उद्देश्य था लाभ कमाना. इन बैंकों में खातों के लिए बड़े मिनिमम बैलेंस की आवश्यकता थी और अब भी है जो आम आदमी के लिए संभव नहीं है.

फाइनेन्शियल इन्क्लूशन का दूसरा चरण

फाइनेन्शियल इन्क्लूशन का दूसरा चरण मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देन है जब उन्होंने जनधन योजना की बात की. इसके तहत जो 25 करोड़ खाते खोले गए उनमें एक बड़ी भूमिका सरकारी बैंकों की रही.

बैंक के एक अधिकारी ग्रामीण की मदद करते हुए

ऐसा नहीं है कि प्राइवेट बैंकों में एनपीए नहीं है. लेकिन ये देखने वाली बात है कि सरकारी बैंकों में एनपीए के कारण उनकी ओनरशिप नहीं बल्कि उनका बिज़नेस मॉडल है. भारत में मौजूद 2-3 बैंकों को छोड़ पर अधिकतर बैंक रीटेल लोन ही देते हैं. अगर सरकारी बैंक भी रीटेल लोन पर ही ध्यान देते तो उनका भी एनपीए नहीं होता.

2008 में जो वैश्विक आर्थिक समस्या पैदा हुई थी उसको देखें तो उसके आधार में कॉर्पोरेट लोन नहीं बल्कि रीटेल लोन, होम लोन और उनके ऊपर के डेरिवेटिव थे. इसके पीछे जो बैंक थे वो सरकारी बैंक नहीं थे बल्कि सभी निजी बैंक ही थे.

इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि रीटेल लोन हमेशा ही सुरक्षित होंगे और ये शाश्वत सत्य है कि प्राइवेट ओनर बैंकों को बेहतर तरीके से चला सकते है. ऐसा नहीं हैं और ये पहले भी साबित हो गया है.

लेकिन हमारे देश की स्थिति देखें तो हमें अभी और विकास करना है, हमें कॉर्पोरेट लोन की आवश्यकता है. अमरीका जैसे देशों को इसकी ज़रूरत नहीं है क्योंकि वहां पर लोग अब जीवनयापन के उंचे स्तर तक पहुंच गए हैं और लोगों को कारों के लिए, घूमने के लिए लोन चाहिए. वहां के बैंक रीटेल लोन ही अधिक देते हैं.

साथ ही उन देशों में कॉर्पोरेट बॉन्ड का एक बड़ा और विकसित मार्केट है जो वहां की कंपनियों, फैक्ट्रियों और म्युनिसिपालिटी की ज़रूरतों को पूरा कर देता है. भारत में कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट कभी भी उस तरह से विकसित नहीं हो पाया है.

रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया

लंबी अवधि वाले लोन सरकारी बैंक ही देते हैं

साथ ही विकसित देशों में लंबी अवधि के लिए लोन देने वाली संस्थाएं हैं जो हमारे देश में नहीं है. शुरू में ईसीईसीआई, आईडीबीआई, आईडीएफ़सी और आईएफ़सीआई होते थे, कुछ अब बैंकों में बदल गए हैं.

समस्या से भी है कि हमारे देश में कंपनियों को प्राइवेट बैंक लोन नहीं देंगे क्योंकि उनको सुरक्षित लोन यानी रीटेल लोन करना है. तो हमें सरकारी क्षेत्र के बैंकों के एनपीए को इस तरह से देखना चाहिए कि वो एक राष्ट्रीय ज़रूरतों का पूरा कर रहे हैं जिसकी आगे भी ज़रूरत पड़ेगी.

अब सीधी बात है कि कॉर्पोरेट बैंक सरकारी बैंक देंगे तो एनपीए भी तो उन्हीं का होगा.

साथ ही ये भी देखें कि जो लंबी अवधि के लोन होते हैं वो आने वाले 10-15 साल के अर्थव्यवस्था के विकास के आकलन के आधार पर दिए जाते हैं. कभी-कभी बाज़र में मंदी आ जाती है जैसा कि हाल में स्टील के क्षेत्र में हुआ, स्टील के दाम गिरे, लौह अयस्क के दाम बढ़ गए, लौह अयस्क और कोयले के खनन पर बंदिशें लग गईं. तो इस कारण से कंपनी को नुकसान हुआ तो इसमें बैंको का तो कोई दोष नहीं था, साथ ही ऐसा भी नहीं कि आकलन ग़लत किया गया हो.

बैंकों के एनपीए को ले कर लोगों का विरोध प्रदर्शन

प्रोजेक्ट्स अटकने के कई कारण हो सकते हैं

इंफ्रास्ट्रकचर प्रोजेक्ट्स की बात करें तो अगर बैंक सभी प्रकार के स्वीकृतियां लेने के बाद ही लोन देगा तो प्रोजेक्ट के शुरु होने में काफी वक्त लगता है. पावर के लिए लोन दिए गए तो कोयले के खनन पर दिक्कतें आ गईं. सड़कों के लिए ऋण दिए गए तो कहीं पर ज़मीन का एक टुकड़ा समस्या बन गया. कहीं पर एक टुकड़े में पर्यावरण क्लियरेंस को ले कर दिक्कत हुई. ऐसे कई कारणों से भी परियोजनाएं अटक जाती हैं और बैंकों का पैसे डूब जाता है.

अब चार पांच साल भी अगर पैसा नहीं मिला तो ब्याज मिला कर ऋण की रकम काफी बड़ी हो जाती है. पर इनके लिए जब बैंकों ने जब इसके लिए ऋण दिया था उस वक्त इन सब का इतना आकलन नहीं होता.

तो ऐसे में लाभ कमा कर बैंक का ऋण चुकाने की ऋण लेने वाले की क्षमता प्रभावित होती है. और चूंकि प्रोजेक्ट पूरा नहीं हुआ तो वो अब कभी ऋण चुक नहीं पाएगा. इस कारण से भी बैंकों का एनपीए अचानक ही बढ़ गया. ना तो इसमें बैंकों के स्वामित्व का दोष था ना ही इस बात का कि उन्होंने अप्रेज़ल ख़राब किया.

पंजाब नैशनल बैंक

पीएनबी का जो घोटाला हुआ उसका कारण कुछ कर्चचारी का लालच आना और सिस्टम में कमी थी. ऐसी दुर्घनाएं निजी बैंकों में भी खूब हुई हैं.

सोसाइटी जनरल बैंक में एक कर्मचारी ने बैंक को सात मिलियन डॉलर का घोटाला किया जो पीएनबी के घोटाले से कहीं बड़ा था. बैंक ना तो ये घोटाला पकड़ पाई ना ही नुकसान से बच पाई.

ऐसे बैंकों को बचाने क्यों आती है सरकार?

कभी-कभी बड़े कर्ज़े की भरपाई ना होने के कारण बैंक फेल हो जाते हैं. लेकिन ऐसे में सरकार को उसको बचाने के लिए सामने आना पड़ता है.

सरकारी बैंकों के मामले में सरकार अगर बैंक के लिए पैसे देती है तो इसकी काफी आलोचन होती है, लेकिन बैंक चाहे प्राइवेट हों या सरकारी उसमें छोटे-बड़े हर तरह के वर्ग के लोगों के जीवन भर की जमापूंजी होती है. और बैंक का फेल हो जाना सामाजिक तौर पर ये ग्रहणीय नहीं है.

पेंशनधारी

अब बैंक चाहे सरकारी हो या प्राइवेट, सरकार को सामने आना ही पड़ता. अगर सभी प्राइवेट बैंक भी फेल हो गए तो भी सरकार को मदद के लिए आगे आन ही पड़ेगा. इसे कहते हैं 'लाभों का निजीकरण और हानि का सरकारीकरण'.

सरकारी बैंकों को सुधारने की ज़रूरत है. सरकारी बैंकों में कई तरह की समस्याएं हैं उन्हें हटाए जाने की ज़रूरत है ताकि बैंक बेहतर काम कर सकें.

सरकारी बैंकों का निजीकरण कर देना कुछ कंपनियों या कुछ बाहरी कारणों से हुए नुकसान से थक कर समस्या को और भी बड़ा कर देना है. ऐसा करने पर इसकी जद में आम लोग भी आ जाएंगे.

ये बैंकों के सामने आने वाली समस्याओं को ख़त्म करने का कारगर तरीका कतई नहीं हो सकता.

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