वो वैज्ञानिक जिन्होंने हज़ारों को इंसाफ़ दिलाया

लालजी सिंह
इमेज कैप्शन, पूर्व राष्ट्रपति कलाम के साथ डॉक्टर लालजी सिंह
    • Author, शुभम् किशोर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • प्रकाशित

21 मई 1991. रात के क़रीब 10 बज कर 21 मिनट पर तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक ज़ोरदार धमाका हुआ. जब तक लोग कुछ समझ पाते भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मौत हो चुकी थी. उनके शरीर के चिथड़े उड़ चुके थे.

लाशों की हालत ऐसी थी कि सिर्फ़ डीएनए तकनीक की मदद से ही इनकी शिनाख़्त हो सकती थी. राजीव गांधी के हत्यारों की पहचान भी इसी तकनीक से मुमकिन हो पाई थी और इसका श्रेय जिस एक व्यक्ति को जाता है उनका नाम था लालजी सिंह.

मशहूर वैज्ञानिक और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति पद्मश्री डॉक्टर लालजी सिंह का रविवार देर रात निधन हो गया. वे 70 साल के थे. उन्हें भारत में डीएनए फ़िंगरप्रिंटिंग के पिता (फ़ादर ऑफ डीएनए फ़िंगरप्रिंटिंग इन इंडिया) के नाम से भी जाना जाता है.

ब्रिटेन में करीब 13 साल रिसर्च करने के बाद साल 1988 में लालजी सिंह भारत लौटे.

वे हैदराबाद के सेंटर फ़ॉर सेल्यूलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी से जुड़े जहां उन्होंने डीएनए फ़िंगरप्रिंटिंग की एक नई तकनीक का ईजाद किया.

इसका इस्तेमाल आज आपराधिक मामलों में सबूत की तरह किया जाता है. हज़ारों लोगों को इस तकनीक की मदद से इंसाफ़ मिला है.

काशी विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी राजेश सिंह बताते है, "ये एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी. वे हमेशा कहते थे कि यह एक ऐसी तकनीक है जिससे कोई अपराधी हज़ार साल बाद भी नहीं बच सकता."

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किन मामलों में इस्तेमाल हुई डीएनए तकनीक?

90 के दशक में पुलिस ने इस तकनीक का इस्तेमाल शुरू किया. साल 2000 के बाद से निर्भया, प्रियदर्शी मट्टू, शाइनी आहूजा और हैदराबाद बम धमाके जैसे मामलों की जांच में इस तकनीक का बहुत बड़ा योगदान रहा है.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील विवेक सूद के मुताबिक़,"मुझे एक मामला याद है जिसमें एक पिता पर अपनी ही नाबालिग बेटी के बलात्कार का आरोप था. कोर्ट में ट्रायल के दौरान वो लड़की अपने बयान से मुकर गई. लेकिन फिर भी मामले के जज ने उसके पिता को सज़ा सुनाई क्योंकि उस लड़की के निजी अंगों में उसके पिता का डीएनए पाया गया था."

ट्रेनिंग और इंफ़्रास्ट्रक्चर की कमी के कारण अभी भी देश में इस तकनीक का इस्तेमाल अच्छे से नहीं हो पा रहा है. जानकारों का मानना है कि डीएनए फ़िंगरप्रिंटिंग न्याय व्यवस्था में ज़्यादा पारदर्शिता ला सकती है.

डीएनए मामलों के जानकार टिम स्केलबर्ग के मुताबिक़ "अगर किसी व्यक्ति का डीएनए वारदात की जगह पर पाया जाता है तो वो इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि वो वहां पर मौजूद था. ख़ासतौर पर रेप के मामलों में किसी व्यक्ति का डीएनए लड़की के शरीर पर मिलना एक बहुत बड़ा सबूत है."

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डीएनए तकनीक के कम इस्तेमाल से ख़ुश नहीं थे लालजी

खुद लालजी भी इस तकनीक का उपयोग अच्छे से नहीं किए जाने की शिकायत करते थे. राजेश सिंह बताते है कि जब भी लालजी अख़बार में हत्या और बलात्कार जैसी घटनाओं के बारे में पढ़ते, तो निराश हो जाते.

राजेश के अनुसार, "वो हमेशा कहते थे कि देश में इतनी अच्छी तकनीक है लेकिन इसका इस्तेमाल सही तरीके से नहीं हो रहा. ऐसे मामलों में अपराधियों को बचना नहीं चाहिए."

लालजी सिंह ने नौ साल काशी विश्वविद्यालय में पढ़ाई की.

उन्होंने वहां से जीव विज्ञान में बीएसी और एमएससी की डिग्री ली. इसके बाद उन्होंने वहीं से अपनी पीएचडी भी की.

राजेश के मुताबिक़ लालजी एक गरीब परिवार से आते थे और उन्होंने अपनी पूरी पढ़ाई स्कॉलरशिप की मदद से की.

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एक रुपये की पगार पर काम किया

अगस्त 2011 में उन्हें वहां का कुलपति नियुक्त किया गया. राजेश के मुताबिक, "लालजी कभी नहीं चाहते थे कि किसी बच्चे की पढ़ाई आर्थिक तंगी से रुक जाए, इसलिए उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान सिर्फ़ एक रुपया प्रति महीना की पगार पर काम किया."

अपने कार्यकाल के दौरान लालजी ने काशी विश्वविद्यालय में फ़ोरेंसिक का कोर्स शुरू करवाया. राजेश का कहना है कि "देश में ये अपनी तरह का इकलौता कोर्स है". लालजी के कार्यकाल में कई नए लैब औऱ बच्चों के हॉस्टल में खेल-कूद की व्यवस्था भी की गई.

राजेश बताते हैं कि "बीएचयू में गरीब बच्चों की पढ़ाई मुफ़्त करवाने में भी लालजी की अहम भूमिका थी. बीचएयू के अस्पताल में गरीबों के इलाज के लिए भी उन्होंने काफ़ी काम किया. उन्होंने अस्पताल में गरीबों के परिजनों के लिए मुफ़्त आश्रय की व्यवस्था भी की."

रविवार की रात लालजी सिंह ने इसी अस्पताल में अपनी आख़िरी सांसे लीं. राजेश कहते हैं, "वो हमेशा कहते थे कि अगर आप वक़्त का ख़्याल रखेंगे, तो वक़्त आपका ख़्याल रखेगा."

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