नज़रिया: आरक्षण हटाने की बात करनेवालों को आखिर क्या डर है?

आरक्षण
    • Author, चंद्रभान प्रसाद
    • पदनाम, दलित चिंतक
  • प्रकाशित

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता सीपी ठाकुर ने आरक्षण खत्म करने की वकालत की है. उन्होंने कहा, "एक दलित को राष्ट्रपति बना दिया गया है, इसलिए अब वक्त आ गया है जब आरक्षण को खत्म कर दिया जाना चाहिए."

भेदभाव से बचाने के लिए दलितों/आदिवासियों को आरक्षण दिया गया था, लेकिन एक विशेष सामाजिक वर्ग इस आरक्षण से हमेशा असहज रहा है. आधुनिक काल में आरक्षण विरोधी मुखर हुए हैं.

आखिर आरक्षण का ये डर क्यों है?

आरक्षण का सिद्धांत, भेदभाव से बचाव के एक सिस्टम से ज़्यादा कुछ भी नहीं है.

कोविंद
इमेज कैप्शन, भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद

इसे समझने से पहले नीचे दिए बिंदुओं पर एक नज़र डालिए--

  • 22 जून 2015, प्रतापगढ़ देहात: दिहाड़ी मज़दूरी करने वाले दलित के दो बेटों ने ओपन श्रेणी में आईआईटी की प्रवेश परीक्षा पास की थी. एक हफ्ते तक दोनों भाई चर्चा में रहे. इससे परेशान गैर-दलित गांव वालों की भीड़ ने शाम के वक्त उनके घर पर पत्थरबाज़ी की. दलित भाइयों में से एक ने मीडिया से बातचीत में कहा था कि उनके शिक्षक आईआईटी के बजाए आईटीआई में करियर बनाने की सलाह देते थे.
  • 10 अप्रैल 2017, उत्तर प्रदेश का गोंडा: एक दलित ने सिविल सेवा परीक्षा के लिए क्वालिफ़ाई किया. वो कुछ दिनों में दिल्ली जाने की तैयारी कर रहा था, लेकिन कुछ गैर-दलित युवाओं ने उसे दिल्ली जाने से रोकने की योजना बनाई. उन्होंने उस दलित युवक को पीटा और उसके मुंह में रेत डाल दी.
  • 6 अप्रैल 2017, हरियाणा में चरखी दादरी का सांजरवास गांव: यहां उच्च जाति के कुछ युवाओं को एक दलित दूल्हे का घोड़ी पर चढ़ना नागवारा गुज़रा. जिसके बाद उन्होंने दलित युवक को घोड़ी से उतारकर उसके साथ बदसलूकी की.
  • 4 अक्टूबर 2017, गुजरात में गांधीनगर का लिंबोदड़ा गांव: मूंछें रखने के लिए एक दलित युवक पर चाकू से हमला किया गया.
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  • बहराइच ज़िले में नई जींस पहनने पर एक दलित युवक के पैरों पर गोली मार दी गई.

साल 1854 में जब लॉर्ड मैकॉले की अंग्रेज़ी शिक्षा प्रणाली को अस्तित्व में लाया गया, तो तीन सालों के अंदर सरकार को एक सर्कुलर जारी करना पड़ा. इस सर्कुलर के मुताबिक - "किसी को भी जाति, धर्म और लिंग के आधार पर दाखिला देने से मना नहीं किया जा सकता."

इस सर्कुलर को जारी करने की ज़रूरत इसलिए पड़ी क्योंकि दलितों को स्कूल से भगा दिया जाता था.

सरकार के कड़े सर्कुलर के बावजूद, जब भी दलितों ने स्कूल जाने की कोशिश की, देशभर में उन पर हमले हुए. कई इलाकों में उनकी फ़सलें जला दी गईं और उनके माता-पिता से मारपीट की गई.

इसके बाद डब्ल्यूडब्ल्यू हंटर कमीशन ने इस समस्या का एक हल निकाला. उनका समाधान ये था कि दलितों के लिए अलग स्कूल बनाए जाएं.

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दलितों के ख़िलाफ़ कई प्रतिबंध लगे

आरक्षण पर चर्चा करने वाले किसी भी व्यक्ति को ये ध्यान रखना चाहिए कि जाति की वजह से दलितों के ख़िलाफ़ कई प्रतिबंध लगाए गए.

जिन दलितों को नए कपड़े तक पहनने की इजाज़त नहीं थी उन्हें आरक्षण के बिना समाज कलेक्टर, स्कूल टीचर या पुलिस कर्मचारी के रूप में कैसे अपना लेता.

लेकिन आज़ादी के बाद से काफ़ी कुछ बदला है. एक सामाजिक क्रांति देखी गई है. दलित जातिगत व्यवस्था के दबाव से निकलने लगे हैं.

विरोध प्रदर्शन

भारत तेज़ी से बदल रहा है. जातिगत व्यवस्था से ही एक उदारवादी वर्ग उभरा है जहां दलितों को बराबरी का दर्जा दिया गया. लेकिन अभी भी भारत का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो दलितों को अछूत मानता है. सीपी ठाकुर इसी तबके को संबोधित कर रहे हैं.

दलितों से नफ़रत करने वाले सीपी ठाकुर जैसे लोग आरक्षण से डरते हैं. ये लोग अतीत के प्रति उदासीन भी हैं, अतीत और जाति से बहुत प्यार भी करते हैं.

आरक्षण भारत की राष्ट्रीय ज़रूरत है. चूंकि दलितों को अलग-थलग रखना राष्ट्र विरोधी है, आरक्षण जाति को बाधित करता है. जाति से प्यार करने वाले आरक्षण के डर से जूझते रहते हैं.

(लेखक एक दलित विचारक हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)

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