नज़रिया: 100 फ़ीसद बहुमत हो तो भी संविधान नहीं बदल सकता संघ

मोहन भागवत
    • Author, प्रशांत भूषण
    • पदनाम, वरिष्ठ वकील और नेता, स्वराज अभियान, बीबीसी हिंदी के लिए
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि भारतीय संविधान में बदलाव कर उसे भारतीय समाज के नैतिक मूल्यों के अनुरूप किया जाना चाहिए.

हैदराबाद में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि संविधान के बहुत सारे हिस्से विदेशी सोच पर आधारित हैं और इसे बदले जाने की ज़रूरत है. उन्होंने कहा कि आज़ादी के 70 साल बाद इस पर ग़ौर किया जाना चाहिए.

क्या आंबेडकर के लिखे संविधान को बदलने की ज़रूरत है?

आंबेडकर

संविधान तो बीच बीच में बदला जाता है, कई बार इसमें संशोधन हुए हैं, लेकिन सवाल ये है कि आरएसएस किस तरह के बदलावों की बात कर रहा है. वो सेक्यूलर संविधान को ख़त्म करके हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं.

इसकी तो इजाज़त ही नहीं है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने कई फ़ैसलों में कहा है कि धर्मनिरपेक्षता भारत के संविधान का मूल आधार है और इसमें बदलाव नहीं किया जा सकता.

चाहे उनके पास दो तिहाई बहुमत ही क्यों ना हो, संविधान को इस तरह से नहीं बदला जा सकता कि उसके मूल आधार ही ख़त्म हो जाएं.

धर्मनिरपेक्षता को संविधान का मूल स्तंभ माना गया है.

कौन तय करेगा कि 'भारतीय मूल्य' क्या हैं?

आरएसएस

हर एक व्यक्ति के लिए भारतीय मूल्य की अलग-अलग परिभाषा होती है.

भारतीय मूल्य की आरएसएस की परिभाषा ये है कि गाय के नाम पर लोगों को पीटो, सोशल मीडिया पर लोगों को ट्रोल करो, हिंदू मुस्लिम के नाम पर लोगों की लड़ाई करवाओ.

आज यही तो समस्या है कि ये सरकार आरएसएस के कहने पर और आरएसएस के दम पर ही चल रही है. इसके चलते हम ये देख रहे हैं कि इतिहास की पुस्तकों में बदलाव किए जा रहे हैं.

ऐसी चीज़ें लिखी जा रही हैं जो कोई भी इतिहासकार या इतिहास समझने वाला व्यक्ति कह सकता है कि झूठी बातें हैं. ऐसा सिर्फ धर्म के आधार पर लोगों को बांटने के लिए किया जा रहा है.

मेरा मानना है कि आरएसएस का कोई व्यक्ति संवैधानिक पद पर नहीं रह सकता क्योंकि ऐसा करने के लिए उन्हें शपथ लेनी होती है कि वो संविधान की रक्षा करेंगे.

ऐसा व्यक्ति जो कहता है कि वो धर्मनिरपेक्षता को मानते ही नहीं हैं, वो संविधान को कायम रखने की शपथ कैसे ले सकते हैं.

क्या होती हैसंविधान बदलने की प्रक्रिया?

आरएसएस

संसद के दोनों सदनों यानी लोकसभा और राज्यसभा में संविधान में संशोधन का प्रस्ताव दो-तिहाई बहुमत से पारित करना होता है.

लेकिन धर्मनिरपेक्षता, लोगों में बराबरी, अभिव्यक्ति और असहमति के हक़ जैसी बुनियादी बातों में बदलाव नहीं किया जा सकता.

कई संशोधनों में राज्यों की सहमति की भी ज़रूरत होती है.

लेकिन आरएसएस भारतीय संविधान के मूल आधार को ही बदल देना चाहता है. वो हिंदुस्तान को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं. उनको 100 प्रतिशत बहुमत मिले, तब भी वो ऐसा बदलाव नहीं कर सकते.

(बीबीसी संवाददाता मानसी दाश से बातचीत पर आधारित)

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