ब्लॉग: सबको चाहिए मनभावन समाचार, क्या करें पत्रकार?

भारतीय मीडिया
    • Author, राजेश प्रियदर्शी
    • पदनाम, डिजिटल एडिटर, बीबीसी हिंदी
  • प्रकाशित

"बीबीसी को मैं इसलिए पैसे नहीं देता कि वो मेरे ही विचारों को चुनौती दे." ये शिकायत है एक ब्रितानी टीवी दर्शक साइमन विलियम्स की.

ब्रिटेन में हर घर से सालाना टीवी लाइसेंस फ़ीस ली जाती है, और बिना किसी विज्ञापन के बीबीसी रेडियो और टीवी चैनल चलाए जाते हैं.

बीबीसी जिस दिशा-निर्देश के तहत काम करती है उसमें एक ज़रूरी बात ये भी है कि वह हर तरह के विचारों को जगह देगी, जो साइमन विलियम्स की पसंद के नहीं होंगे.

कोई ऐसा आरोप नहीं है जो लोगों ने बीबीसी पर न लगाया हो--'बीबीसी वामपंथी है', 'बीबीसी दक्षिणपंथी है', 'बीबीसी यहूदी विरोधी है', 'बीबीसी मुसलमान विरोधी है'... ब्रेग्ज़िट के दौरान कुछ लोगों ने बीबीसी पर 'रिमेन' कैम्पेन का समर्थक होने का बिल्ला लगाया, तो कई लोगों ने उसका विरोधी कहकर आलोचना की.

वीडियो कैप्शन, 'मैं बेगुनाह हूं, यह समझाने में 17 साल लगे'

...बाक़ी सब प्रचार है

ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई समर्थक और विरोधी दोनों हो, ऐसा शायद एक ही हाल में हो सकता है जब वह दोनों में से कुछ न हो. बीबीसी को भारत में भारत-विरोधी और पाकिस्तान में पाकिस्तान-विरोधी कहने वालों की तादाद लगभग एक बराबर होगी.

बीबीसी के मशहूर पत्रकार मार्क टली ने कभी लिखा था कि "जब आपकी आलोचना दोनों तरफ़ से होने लगे तो आपको समझना चाहिए कि आप अपना काम ठीक से कर रहे हैं."

किसी ज़माने में बीबीसी में काम कर चुके जाने-माने लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने लिखा था, "पत्रकारिता उसे सामने लाना है जिसे कोई छिपाना चाहता हो, बाक़ी सब प्रचार है." लेकिन आज पत्रकारों से पूछा जा रहा है कि 'जो सरकारें कह रही हैं तुम भी वही क्यों नहीं कह रहे हो?'

वीडियो कैप्शन, जहां से पश्चिम बंगाल में तनाव शुरू हुआ

'दुश्मन की आवाज़'

बहरहाल, ये मामला केवल ब्रिटेन या बीबीसी का नहीं है, तकरीबन पूरी दुनिया में, ख़ास तौर पर उन देशों में जहाँ ध्रुवीकरण की राजनीति ज़ोर पर है, विपरीत विचारों को 'दुश्मन की आवाज़' समझकर चुप कराने की कोशिश हो रही है.

लोगों की रुचि ख़बरों, तथ्यों और विचारों से ज़्यादा इसमें है कि बात मनभावन हो, अगर बात मनभावन नहीं है तो कहने वाले की नीयत में खोट है. 'तब तुम कहाँ थे?' इस सवाल का सामना आज हर पत्रकार कर रहा है.

पिछले दिनों बीबीसी हिंदी ने ये समझने-समझाने की कोशिश की कि भारत में अल्पसंख्यक होना कितना तकलीफ़देह हो सकता है, इसके लिए हमने कुछ छात्रों से लिखने का अनुरोध किया, मसलन, अलीगढ़ के हिंदू छात्र के अनुभव या बीएचयू के मुसलमान छात्र का तजुर्बा.

वीडियो कैप्शन, सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग पर दिल्ली की नाज़िया ने खुलकर बात रखी.

झूठ या बदनीयती के आरोप

दो ही दिनों के भीतर हम पर हिंदू-विरोधी होने के आरोप भी लगे और मुसलमान-विरोधी होने के भी. अलीगढ़ वाली रिपोर्ट पर लोग लोग पूछ रहे थे कि बीएचयू पर क्यों नहीं, और बीएचयू वाली रिपोर्ट पढ़कर लोग शिकायत कर रहे थे कि अलीगढ़ पर क्यों नहीं, दोनों ही रिपोर्टों के भीतर दूसरी स्टोरी का लिंक मौजूद था, लेकिन कोई पढ़े तब तो, नीयत पर शक करने की हड़बड़ी ऐसी है कि लोग हेडलाइन पढ़कर फ़ैसला सुना देते हैं.

ध्रुवीकरण की राजनीति के दौर में व्हाट्सऐप ग्रुप और फ़ेसबुक फ्रेंड सर्किल में हमख़्याल लोग जमा होते हैं, सब एक जैसी बातें करते हैं, वो बातें गूंजने लगती हैं, सिर्फ़ वही सुनाई देती हैं, उससे अलग बात खीज पैदा करती है क्योंकि जब आसपास सब लोग किसी बात पर एकमत हैं तो वह बात ठीक ही होगी, ऐसे में विपरीत विचार में ज़रूर झूठ या बदनीयती होगी.

वीडियो कैप्शन, नदीम अख्तर कहते हैं कि उन्मादी भीड़ द्वारा की गई हत्या में सोशल मीडिया अहम भूमिका निभाता है

विभाजनकारी राजनीति

इस पर कोई विश्वसनीय सर्वे उपलब्ध नहीं है लेकिन टीवी देखकर या अख़बार पढ़कर अपनी राय बनाने वालों से कहीं ज़्यादा बड़ी तादाद अब उन लोगों की है जो सोशल मीडिया पर मौजूद कंटेट से अपनी राय क़ायम कर रहे हैं, जो भरोसे के काबिल नहीं, लेकिन भरपूर मनभावन होते हैं.

कुछ सालों से मीडिया चौतरफ़ा दबाव में है. अमरीका, यूरोप से लेकर भारत तक, विभाजनकारी राजनीति ने मध्यमार्ग को ख़त्म-सा कर दिया है जबकि पत्रकारों से उम्मीद की जाती है कि वे मध्यमार्गी यानी निष्पक्ष रहें, मगर इन दिनों निष्पक्ष होना, संदिग्ध होना हो गया है.

दूसरी ओर, सिरे से फर्ज़ी और झूठी बातों को लोग सच मानते दिखते हैं क्योंकि वह मनभावन है, पत्रकारों के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती है. एक लड़ाई-सी छिड़ी है जिसमें समर्थक और विरोधी होने के अलावा आप कुछ और भी हो सकते हैं, लोग ये मानने को तैयार नहीं हैं.

वीडियो कैप्शन, अनुजा कपूर का कहना है, सोशल मीडिया पर अफवाहों का शिकार पढ़े-लिखे ज्यादा होते हैं.

मनभावन समाचार

अब तक पत्रकार सरकार से सवाल पूछते थे, अब सरकार और जनता पत्रकारों से सवाल पूछ रही है, पाँसा पलट गया है, इससे कई लोग बहुत ख़ुश हैं.

उन्हें इस बात की ख़ुशी है कि पत्रकारों की सत्ता ध्वस्त हो गई है, अब वे जो चाहें पढ़ सकते हैं, जो चाहें देख सकते हैं, जो चाहें मान सकते हैं, यह सोशल मीडिया का नया लोकतंत्र है, ये कई तरह से अच्छा भी है लेकिन दूसरे लोग भी तो हैं जो अपना मनभावन समाचार-विचार देख रहे हैं, जो आपके मनभावन से ठीक उलटा है.

वैसे जब बहुसंख्यक मनभावन डिफ़ाइन हो चुका है तो ज्यादातर पत्रकारों को उसी में फ़ायदा दिख रहा है लेकिन पत्रकार क्या खाकर मनभावन समाचार तैयार करने में व्हाट्सऐप का मुक़ाबला कर पाएँगे, वैसे कोशिश जारी है.

वीडियो कैप्शन, नफ़रत और झूठ के ख़िलाफ़ बीबीसी हिंदी और ‘द क्विंट’ की ख़ास पहल- स्वच्छ डिजिटल इंडिया

अज्ञान और भावुकता

मनभावन समाचारों के परस्पर विरोधी रसिक गाली-गलौज से सोशल मीडिया को युद्धभूमि बना चुके हैं, अज्ञान और भावुकता से संचालित यह टकराव पूरे देश में हर जगह दिखने लगा है, इसमें मॉडरेटर की भूमिका अगर कोई निभा सकता है तो वो पत्रकार ही हैं, लेकिन जनता इन दिनों हर मामले का फ़ैसला तत्काल और ख़ुद करने के मूड में है.

जो आप जानते हैं और मानते हैं, उससे अलग या नई जानकारी आपको नहीं चाहिए. ऐसा सोचना अपना ही अहित करना है, 'एनरिचमेंट' या आपके ज्ञान और आपकी समझ का विस्तार ऐसी ही बातों से होता है जो आपकी मौजूदा सोच-समझ के दायरे को बड़ा करती हों, उसमें कुछ नया जोड़ती हों.

व्हाट्सऐप के आने से करीब 2300 साल पहले अरस्तू कह गए थे, "शिक्षित दिमाग़ की पहचान है कि वह जिस बात को न माने, उस पर भी विचार कर सकता हो."

जय जयकार या हाहाकार के बदले थोड़ा विचार कर लीजिए, अगर आप ख़ुद को शिक्षित समझते हैं. वरना तो मनभावन समाचार हैं ही जिनमें हिंसा, नफ़रत और कुतर्क का भरपूर आनंद मिलता है.

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