ब्लॉग: भीड़ को उकसाता ये सरकारी विज्ञापन ख़तरनाक है

दरवाज़ा बंद वीडियो
इमेज कैप्शन, दरवाज़ा बंद वीडियो से एक स्क्रीनशॉट
    • Author, राजेश जोशी
    • पदनाम, रेडियो एडिटर, बीबीसी
  • प्रकाशित

पाजामा-क़मीज़ पहने, हाथ में डिब्बा लिए जंगल की तरफ़ 'दिशा-मैदान' के लिए जा रहे देहाती से दिखने वाले उस आदमी के पीछे कुछ महिलाएं और लड़कियां दौड़ रही हैं.

उनसे बचने के लिए वो घबराकर भागता है, लेकिन फिर ये महिलाएं उसे चारों तरफ़ से घेर लेती हैं और बंद शौचालय के अंदर जाने पर मजबूर करती हैं. पीछे से गाने की आवाज़ आती है - दरवाज़ा बंद तो बीमारी बंद.

खुले में शौच करने की आदत के ख़िलाफ़ भारत सरकार की ओर से जारी ये वीडियो फ़िल्म सफ़ाई का संदेश देती है.

दरवाज़ा बंद वीडियो
इमेज कैप्शन, दरवाज़ा बंद वीडियो से एक स्क्रीनशॉट

एक ऐसे ही निजी कंपनी के स्वच्छता अभियान वाले विज्ञापन में झाड़ी के पीछे शौच करने वाले गाँव के मर्दों को चारों ओर से औरते घेरकर शर्मसार करती हैं और उनमें से एक उनपर पत्थर भी फेंकती है.

हरियाणा के मेवात ज़िले के डिप्टी कलेक्टर मणिराम शर्मा तीन-चार बुज़ुर्गों को पुलिस जीप के सामने अपराधियों की तरह ज़मीन पर बैठाकर फ़ोटो खींचते हैं और सोशल मीडिया पर लिखते हैं - "आज इनकी अकड़ ढीली करनी थी और तसल्ली से कर भी दी."

मणिराम शर्मा का पोस्ट

भीड़ की हिंसा

राजस्थान के प्रतापगढ़ ज़िले में नगरपालिका कर्मचारी सुबह-सुबह राउंड पर निकलते हैं और खेतों में शौच करने वाली महिलाओं के फ़ोटो खींचते हैं. इसका विरोध करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता ज़फ़र हुसैन की पीट-पीट कर हत्या कर दी जाती है.

खुले में शौच करती महिलाएं

उत्तर प्रदेश के फ़िरोज़ाबाद ज़िले में सरकारी कर्मचारी गाँव वालों को खुले में शौच करने वालों से डंडे के ज़ोर पर निपटने के लिए ट्रेनिंग देते हैं.

और फिर वॉलैंटियर्स की ये भीड़ रोज़ाना सुबह हाथों में टॉर्च और डंडे लिए सीटियाँ बजाते हुए जंगल-झाड़ियों के पीछे शौच करने वालों को ढूँढने के लिए निकल पड़ती है.

खुले में शौच

देश में आए दिन जगह-जगह पर गोरक्षा के नाम पर मुसलमानों की लिंचिंग का ज़ाहिर तौर पर स्वच्छ भारत के लिए चलाए जा रहे अभियान के दौरान हुई इन घटनाओं से कोई संबंध नहीं है. लेकिन इससे ये साफ़ होता है कि आने वाले दिनों में सामाजिक जीवन में भीड़ का दख़ल बढ़ेगा.

लोगों को सामाजिक भागीदारी के नाम पर इसके लिए तैयार भी किया जा रहा है.

आप खुले में शौच करने के आदी हैं तो भीड़ आपसे निपट लेगी — मारेगी नहीं भी तो शर्मसार ज़रूर करेगी. और इस भीड़ को मालूम है कि विरोध करने वालों की अकड़ ज़िले का डिप्टी कलेक्टर ढीली करने को तैयार है.

अलीमुद्दीन
इमेज कैप्शन, झारखंड के रांची से सटे रामगढ़ में मांस ले जा रहे अलीमुद्दीन नाम के एक युवक को भीड़ ने पीट-पीट कर उनकी हत्या कर दी. गुस्साई भीड़ ने उनकी कार में भी आग लगा दी.

आप गाय-भैंसों का व्यापार करते हैं और मुसलमानों जैसी टोपी-दाढ़ी रखते हैं तो भीड़ आपको बचकर निकलने नहीं देगी.

भीड़ को मालूम है कि इस हत्या को कभी दुर्घटना तो कभी भावावेश में उठाया गया क़दम बताने के लिए मंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद और विधायक तैयार हैं ही.

जनता को गोलबंद करके राजनीतिक लड़ाई लड़ना और जीतना जनतांत्रिक राजनीति का एक अहम हिस्सा है.

भीड़ बनी 'हथियार'

लेकिन अपनी बात को मनवाने के लिए जनता को भीड़ में बदल देना और इस भीड़ को एक ख़तरनाक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का रास्ता आख़िरकार ऐसे मक़ाम पर ले जाता है जहाँ बहुसंख्य लोग जनतंत्र को ग़ैरज़रूरी और अप्रासांगिक मानने लगते हैं. उनके लिए अदालत, संविधान और क़ानून का कोई मतलब नहीं रह जाता.

भीड़

भीड़ और तानाशाही

यही वो मक़ाम होता है जहाँ एक लोकप्रिय नेता इतना ताक़तवर बन जाता है कि उसके तानाशाह बनने में देर नहीं लगती.

उसके सामने फिर न संविधान बड़ा होता है न क़ानून क्योंकि बरसों की मेहनत से तैयार की गई उग्र भीड़ अपने नेता को हर अड़चन दूर करने वाले महामानव की तरह देखने लगती है और उस महामानव से असहमत होने वालों को देशद्रोही.

तीस और चालीस के दशक में जर्मनी और इटली में यही हुआ और यही साठ के दशक के चीन में हुआ जब सांस्कृतिक क्रांति के दौरान माओ त्से-तुंग ने राज्य की ताक़त लगभग पूरी तरह से रेड गार्ड्स को सौंप दी.

ये रेड गार्ड्स सार्वजनिक जगहों पर 'वर्ग शत्रुओं' और 'बुर्जुआ' लोगों को सज़ा देने लगे. इस दौर में चीन की जनता पर माओ का असर इतना बढ़ गया था कि जब वो कहते थे कि चिड़ियाँ चीन की फ़सलें चौपट कर रही हैं तो लोगों ने लाखों की तादाद में चिड़ियों को मार डाला.

जयंत कालिता जैसे कुछ विश्लेषकों ने साठ के दशक में माओ के चीन की तुलना आज के भारत से की भी है.

माओ त्से-तुंग

आज़ाद भारत में भीड़ को हथियार के तौर पर इस्तेमाल का शायद सबसे बड़ा उदाहरण बाबरी मस्जिद का तोड़ा जाना है.

भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में कारसेवकों की भीड़ अयोध्या में जुटाई गई और उसके बाद जो कुछ किया माथे पर भगवा पट्टा बाँधे उन्हीं कारसेवकों ने किया.

केंद्र सरकार लाचार बैठी रही, पुलिस-प्रशासन सब कुछ देखता रहा और यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट तक ठगा-सा रह गया.

बाबरी मस्जिद

खुले में शौच करने वाले देहाती आदमी को खदेड़कर शौचालय में घुसने पर मजबूर करने वाले टीवी के सरकारी विज्ञापनों को देखकर भले ही अभी आप सिर्फ़ मुस्कुरा देते हों, लेकिन सामाजिक महत्व के सवालों को भीड़ के दम पर हल करने के ख़तरों को अभी से भाँपा जाना जनतंत्र की ख़ैर के लिए ज़रूरी है.

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