ढाई करोड़ लोग कैसे भरेंगे सवा अरब का पेट?

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- Author, विभुराज चौधरी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
पिछले 5 सालों में देश में 1.25 करोड़ से ज्यादा कारें बिकीं. 2015 में 2 करोड़ लोगों ने विदेश यात्राएं कीं. लेकिन देश में सिर्फ 20 लाख लोग ऐसे हैं जो नौकरी नहीं करते पर 5 लाख से ज्यादा कमाते हैं.
बजट भाषण में वित्त मंत्री ने ये सब कहते हुए कई लोगों की दुखती रग पर हाथ रख दिया कि "हमारा समाज मुख्यतः टैक्स को न मानने वाला समाज है."
सरकारी आंकड़े ख़ुद इसकी गवाही देते हैं. सवा अरब से ज्यादा की आबादी वाले देश में सिर्फ 76 लाख लोग ऐसे हैं जिनकी आमदनी 5 लाख से ज्यादा है और उनमें से 56 लाख सैलरी पाने वाले हैं यानी नौकरी करते हैं.

आंकड़ों के मुताबिक देश में आयकर रिटर्न भरने वालों की कुल संख्या 3.7 करोड़ और टैक्स देने वालों की संख्या 2.7 करोड़ ही है. वित्त मंत्री की मानें तो एक तरह से 2.7 करोड़ आय करदाताओं के कंधों पर देश की सवा अरब से ज्यादा आबादी का बोझ है.
विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार को आयकर देने वालों का दायरा बढ़ाने का रास्ता तलाशना चाहिए. सरकार टैक्स के दायरे में ज्यादा से ज्यादा लोगों को लाने की बात तो करती है, लेकिन हक़ीक़त में ज़्यादा कुछ करती हुई नहीं दिखती.
वित्त मंत्री ने भी अपने बजट भाषण में मर्ज़ का जिक्र तो किया पर इसकी दवा नहीं बताई.

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गैरसरकारी संगठन ग्लोबल टैक्सपेयर ट्रस्ट के चेयरमैन मनीष खेमका कहते हैं, "लोकतंत्र में लाठी से काम नहीं चलता है. अगर मुठ्ठी भर लोगों को कोई जायज़ बात बतानी हो तो सख़्ती की बात समझ में आती है पर इनकम टैक्स के मामले में ये मुश्किल है."
उनका कहना है, "इनकम टैक्स के मामले में व्यक्ति की इच्छा से फर्क पड़ता है. जब तक उसकी मर्जी नहीं होगी, दुनिया की किसी भी सरकार के पास इतनी ताकत नहीं है कि वह सभी आम नागरिकों पर इतनी सख़्ती कर सके."
अर्थशास्त्री आलोक पुराणिक की राय में सरकार के पास एक्सपेंडिचर टैक्स या खर्चे पर लगाया जाने वाले कर का एक विकल्प है.

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वे कहते हैं, "क्योंकि किसी की आमदनी को अदालतों में साबित करना सरकार के लिए मुश्किल है. पकड़ा गया आदमी कहेगा कि मुझे ये पैसा रिश्तेदारों से मिला है. लेकिन महंगी कार ख़रीद रहे व्यक्ति पर सरकार अलग से टैक्स लगा सकती है."

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हालांकि जानकारों का कहना है हालिया बरसों में टैक्स देने वालों की संख्या कुछ बढ़ी है. मनीष खेमका का कहना है, "मोदी सरकार के आने के बाद से टैक्स बेस बढ़ा है. पहले तो एक से डेढ़ करोड़ लोग ही वास्तव में टैक्स भरते थे."
आलोक पुराणिक टैक्स बेस बढ़ाने का एक और नुस्खा बताते हैं, "कम टैक्स लगाकर ज्यादा लोगों को कर के दायरे में लाया जा सकता है. टैक्स की दरें कम होंगी तो लोग कर चोरी के बारे में कम सोचेंगे और इसे देकर व्हाइट मनी को ज्यादा तरजीह देंगे."

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अब लौटकर तस्वीर के दूसरे पहलू की तरफ चलते हैं. नोटबंदी के बाद 1.48 लाख ऐसे बैंक खातों की पहचान की गई है जिनमें 80 लाख रुपए से ज्यादा जमा किए गए.
जाहिर है कि ये आंकड़े वित्त मंत्री के इस बयान की तस्दीक करते हैं कि "अर्थव्यवस्था में जब नकदी बहुत ज्यादा होती है तो कुछ लोगों के लिए टैक्स चोरी का रास्ता खुल जाता है. जब बहुत से लोग टैक्स चोरी करने लगते हैं तो उनकी हिस्सेदारी का बोझ दूसरे ईमानदार लोगों पर पड़ जाता है."
तो क्या नोटबंदी से कोई रास्ता निकलता हुआ दिखता है?
इस सवाल पर मनीष खेमका कहते हैं, "इतनी कठोर कार्रवाई अभी तक किसी सरकार ने नहीं की थी. सरकार ने ये साफ कर दिया है कि अब ये नहीं चलेगा. इससे टैक्स बेस भी बढ़ेगा. भारत में 8 करोड़ लोग टैक्स के दायरे में लाए जा सकते हैं."
लेकिन क्या सब इतना आसान है. एक आशंका भ्रष्टाचार के बढ़ने की भी जताई जा रही है. आलोक पुराणिक सवाल उठाते हैं, "नोटबंदी से ट्रैकिंग बढ़ाई जा सकेगी पर इनकम टैक्स वालों की निगरानी कौन रखेगा."
टैक्स मामलों के वकील विराग गुप्ता भारत में कर कानूनों की कमी को एक बड़ी दिक्कत बताते हैं.
उनका कहना है, "किसी ने खाते में पैसा जमा किया है तो सिर्फ इस नाम पर उससे टैक्स तो वसूल नहीं किए जा सकते हैं. आपको उसे नोटिस देना पड़ेगा. उनके ऊपर मुकदमा चलाना पड़ेगा. उनसे रिकवरी करनी होगी. वह अपील में जाएगा. क्या इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के पास इतना बड़ा सिस्टम है कि उन्हें घेरे में लाया जा सके."
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