जल्लीकट्टू और स्पेन की बुलफ़ाइटिंग एक जैसी है?

जल्लीकट्टू
प्रकाशित

बहुत-बहुत-बहुत पहले कुछ चरवाहे जानवरों के झुंड के साथ कहीं जा रहे थे कि तभी उनमें से एक तगड़ा सांड निकल भागा.

दूसरे लोग सोच ही रहे थे कि क्या किया जाए कि तभी उनमें से एक चरवाहा जानवर के पीछे तेज़ी से भागा और उसका कूबड़ पकड़कर लटक गया, सांड की स्पीड धीरे-धीरे कम हो गई और वो क़ाबू में आ गया.

तमिलनाडू में पोंगल के त्योहार के मौक़े पर सांड के साथ होनेवाले खेल जल्लीकट्टू के समर्थक ये कहानी बार-बार सुनाते हैं.

जल्लीकट्टू जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के फ़ैसले को पलटते हुए अपनी रोक जारी रखी है.

जल्लीकट्टू
इमेज कैप्शन, जल्लीकट्टू में सांड के कूबड़ को पकड़कर लटकना होता है.

लेकिन तमिलनाडु में कुछ जगहों पर सबसे ऊंची अदालत के फ़ैसले का विरोध हो रहा है. राजनीतिक और आम लोग इसे अपने सांस्कृतिक आयोजन पर हमला बता रहे हैं.

कह रहे हैं कि इसे रोकने का नुक़सान होगा भारतीय नस्ल के सांडों के विकास का रूक जाना.

वहीं जानवरों के अधिकारों के लिए काम करनेवालों का कहना है कि लड़ाई के पहले सांडों को नशीले पदार्थ दिए जाते हैं ताकि वो अधिक हिंसक हो जाएं. या उनकी आंख या दुम के नीचे मिर्च डाल दी जाती है ताकि उन्हें ज़्यादा ग़ुस्सा आए और खेल का मज़ा बढ़े.

वो इसे क्रूर स्पोर्ट कहते हैं जिसमें जानवरों को शारीरिक चोट पहुंचती है.

बुलफाइटिंग
इमेज कैप्शन, स्पेन में होनेवाली बुलफ़ाइटिंग में हथियारों का इस्तेमाल होता है.

हालांकि समर्थकों का कहना है कि जल्लीकट्टू यूरोपीय देश स्पेन में होनेवाली बुलफाइटिंग से अलग है और इसमें स्पैनिश स्पोर्ट्स की तरह हथियारों का इस्तेमाल नहीं होता.

और न ही खेल का मतलब है अंत में जानवर का ख़ात्मा.

जल्लीकट्टू के समर्थकों का कहना है कि इस खेल के दौरान खिलाड़ियों को सांड के कुबड़ को पकड़कर कुछ देर के लिए लटकना होता है.

उनका तर्क ही ये है कि जल्ली/सल्ली का अर्थ ही होता है 'सिक्का' और कट्टू का 'बांधा हुआ.' और सांडों के सींग में कपड़ा बंधा होता है जिसे खिलाड़ी को पुरस्कार राशि पाने के लिए निकालना होता है.

जल्लीकट्टू

वो कहते हैं कि इसमें लोग अपनी फुर्ती और कौशल का प्रदर्शन करते हैं और यीरू थाज़ुवुथल का मतलब है सांड को पकड़ना.

उनका कहना है कि स्पेन में होनेवाली बुलफाइटिंग में मैटाडोर यानी जो सांड से लड़ता है, उसके पास ख़ास क़िस्म के लिबास के साथ-साथ तलवार भी होती है. और अंत में उस तलवार को जानवर के शरीर में उतार दिया जाता है.

जल्लीकट्टू समर्थक कहते है कि खेल के ख़त्म होने के बाद सांड वापस मालिक के पास चले जाते हैं या फिर उन गांवों के मंदिरों में जहां इन्हें ख़ासतौर पर इसी काम के लिए पाला पोसा जाता है.

जल्लीकट्टू

हालांकि जल्लीकट्टू और बुलफ़ाइटिंग दोनों एक तरह के घिरे स्थान में करवाया जाता है.

पहले जल्लीकट्टू कई जगहों पर गांव की गलियों में होता था जिसके किनारे खिलाड़ी मौजूद हुआ करते थे.

स्पेने में कैटेलोनिया नाम के सूबे ने इसपर रोक लगा दी थी हालांकि वहां कोर्ट ने प्रशासन का फ़ैसला पलट दिया.

कहा जाता है कि फ़िलहाल जो बुलफ़ाइट स्पेन में होती है उसकी शुरआत 18वी सदी में हुई. हालांकि ये रोमन साम्राज्य के वक़्त से अलग-अलग शक्लों में जारी रही है.

बुलफाइटिंग

स्पेन के अलावा इसका विरोध कोलंबिया, पेरू और मेक्सिको में भी हो रहा है.

फ्रांस के कुछ शहरों में भी बुलफाइटिंग का प्रचलन है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉयड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)