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पहाड़ों में कितनी जल्दी टूट गया सपना

आज से तीन साल पहले जब उत्तरांचल का जन्म हुआ था तो पहाड़ में रहने वालों के मन में बड़ा उत्साह था.लगता था कि बरसों से जो सपना संजोए हैं अब पूरे होंगे.

यह गहरे दुख और चिंता का विषय है कि सपना कितनी जल्दी दु:स्वप्न में बदल गया.

आज जन्मदिन मनाने का उत्साह किसी में नहीं है बल्कि सबकी ज़ुबान पर सवाल है कि इसका ज़िम्मेदार कौन है.

केंद्र की सरकार ने जिस तरह पहले मुख्यमंत्री को जिस तरह ऊपर से थोपा उसने एक बुरी शुरुआत की.

मैदानी और अयोग्य नित्यानंद स्वामी का नाम याद है तो सिर्फ़ इसलिए कि नए सूबे की लीडरी उन्हें जाने किस काम के ईनाम के तौर पर मिली.

जब चुनाव हुए तो काँग्रेस जीती क्योंकि लोग भारतीय जनता पार्टी के रवैये से नाराज़ थे.

बड़े राष्ट्रीय नेताओं की नज़र में छोटे पहाड़ी राज्य की अहमियत उत्तर प्रदेश जैसी नहीं थी.

उन्होंने ही हरिद्वार के कुंभस्थल को राज्य में जोड़ा और इस राज्य का पहाड़ी स्वरुप फीका किया.

राज्य बनाने के पहले ही उधमसिंह नगर के लोगों में यह भ्रम फ़ैल गया कि नए राज्य में उन्हें न्याय नहीं मिलेगा.

स्वच्छ और जनहितकारी प्रशासन देने में भाजपा सरकार विफल रही.

काँग्रेस का भी हाल वही

काँग्रेस ने उनकी ग़लतियों से कोई सबक नहीं सीखा.

जिस युवा नेता ने चुनाव में जीत दिलवाई उसे दरकिनार कर दिया गया और उम्रदराज़ तथा उदासीन नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री बना दिया गया.

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके और हमेशा पृथक उत्तराचंल राज्य का विरोध करते रहे नारायण दत्त तिवारी के लिए यह डिमोशन जैसा था.

उनकी अपनी ही पार्टी में एक गुट को दूसरे गुट के ख़िलाफ़ खड़ा किया गया और इससे क्षेत्रवाद और जातिवाद को बढ़ावा मिला.

राज्य निर्माण आंदोलन के दौरान गढ़वाली और कुमाउँनी का सवाल मिट चुका था, ठाकुर, ब्राह्मण और दलित का भी, रोज़ी रोटी और पर्यटन से जुड़े प्रश्न राजनीति में मुद्दा बन रहे थे.

आज तो तिवारी ख़ुद रोना रोते रहते हैं कि वे नौकरशाहों के आगे असहाय हो गए हैं समझ में नहीं आता कि कौन रोक रहा है उन्हें अनुशासित करने से.

नौकरशाही का तमाशा बेहद दर्दनाक है.

ज़्यादातर लोग उत्तरप्रदेश से पदस्थापना पर आए हुए हैं और उनकी रुचि बंगले बनाने और बच्चों को अच्छे पब्लिक स्कूल में दाख़िल करवाने से अधिक नहीं है.

अपने विभागों को वे अपनी जागीर समझ रहे हैं और नए विधायकों को अपने अधिकारों की ही जानकारी नहीं है.

आम जनता को उम्मीद थी कि नया राज्य बनने से उन्हें नौकरी मिलेगी, उनकी अपनी पहचान सुरक्षित रहेगी, पर्यावरण की रक्षा होगी, शराबखोरी पर रोक लगेगी और पहाड़ की बर्बादी से बचाया जा सकेगा लेकिन इन सभी मामलों में उनको निराशा हाथ लगेगी.

नई आबकारी नीति शराब ठेकेदारों को ही रास आ सकती है.

मरीचिका

पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर एक मरीचिका फ़ैलाई जा रही है.

सबसे विकट और नया संकट नए विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन का है.

यदि इस मामले में सतर्कता नहीं बरती गई तो बहुत जल्दी उत्तरांचल पहाड़ी राज्य नहीं बचेगा.

जनता इसे लेकर चिंतित है लेकिन सत्ता में बैठे हुए लोगों के कान में जूं भी नहीं रेंग रही है.

समस्याएँ ज्यों की त्यों है.

छत्तीसगढ़ और झारखंड की तुलना में उत्तराँचल बहुत पीछे रह गया है.

शोर बहुत हो रहा है आईटी क्रांति और बीटी को बढ़ावा देने का लेकिन जिनको इससे फ़ायदा मिलना है उनको इसकी भनक तक नहीं है.

देहरादून को स्थाई राजधानी बनाने का षडयंत्र सफल होता दिख रहा है और लगता है कि अब राज्य का नाम कभी नहीं बदलेगा.

जिन लोगों ने आंदोलनकारियों पर अत्याचार किए थे वे लोग बेख़ौफ़ खुले घूम रहे हैं.

सोचने समझने वालों को लगता है कि एक और आँदोलन की सुगबुगाहट शुरु हो चुकी है.

लोगों को लगने लगा है कि सपने को सच में बदलने के लिए, दु:स्वप्न से छुटकारा पाने के लिए हाथ पर हाथ धरे रहने से कुछ नहीं होगा, न ही नेताओं के आगे हाथ पसारने से.

नई पीढ़ी के लोग राजनीतिक दलों से निराश हैं.

विडंबना यह है कि भूमंडलीकरण और उपभोक्तावाद के इस दौर में रचनात्मक आंदोलन की संभावना भी ज़्यादा नहीं दिखती, फ़िलहाल.