
क्या आप महाकुंभ 2025 में गई/गए थे? अगर हाँ, तो आपने भी कुछ न कुछ कचरा ज़रूर फेंका होगा. क्या आपको पता है कि उस कचरे का क्या हुआ? सरकार के मुताबिक, प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ में 45 दिनों में 66 करोड़ से ज़्यादा लोग शामिल हुए.
क्या आपको पता है, इस दौरान लगभग 30 हज़ार मीट्रिक टन कचरा पैदा हुआ! सुनने में ज्यादा लग रहा है?
इसे यों समझिए. चिड़ियाघर या जंगलों में देखे गए एक एशियाई हाथी को याद कीजिए. एक हाथी का वज़न 4500 से 5000 किलोग्राम के लगभग होता है. अब ऐसे साढ़े छह हज़ार एशियाई हाथियों की कल्पना कीजिए. इन सबके वज़न का अंदाज़ा लगाइए. लगभग उतना ही कचरा पैदा हुआ.
इतना सारा कचरा पैदा हुआ कि महाकुंभ में सफ़ाई की बड़ी पहल की गई. यही नहीं, इस पहल ने सफ़ाई का एक नया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड स्थापित कर दिया.
कचरे का होता क्या है, कैसे पता करें

भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के प्रयागराज संगम तट पर लगने वाला कुंभ मेला दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन है. सबसे बड़े आयोजन का सबसे ज़्यादा कचरा कहाँ गया? क्या कचरे का सही तरह से निपटारा हुआ? या सारे रिकॉर्ड सिर्फ़ दावे तक सीमित रह गए?
बीबीसी की टीम ने इसका पता लगाने के लिए एक प्रयोग किया. हम यह देखना चाहते थे कि महाकुंभ का कचरा कैसे निपटाया जा रहा है. हमने 29 जनवरी को दो जीपीएस ट्रैकर अलग-अलग प्रकार के कचरे में रखा और कुंभ मेला क्षेत्र में छोड़ दिया. इसके बाद इस कचरे की यात्रा देखी.
जीपीएस ट्रैकर के ज़रिए हम सिर्फ़ यह जानना चाह रहे थे कि कचरा कहाँ से कहाँ तक पहुँचा. जीपीएस ट्रैकर यह बताता है कि इस वक़्त वह किस जगह मौजूद है.


पहला जीपीएस ट्रैकर हमने एक ‘डायपर’ के साथ रखा. कुंभ में अनेक श्रद्धालु छोटे बच्चे-बच्चियों के साथ आए. इसकी वजह से यह एक आम कचरा है. एक अनुमान के मुताबिक, एक डायपर को ‘डीकंपोज़’ होने में पाँच सौ साल तक का समय लग सकता है.
दूसरा जीपीएस ट्रैकर हमने चिप्स के पैकेट और खाने-पीने के बाद बचे प्लास्टिक के कचरे में डाला. एक अनुमान के मुताबिक, ऐसा कचरा 20 से 500 साल तक पर्यावरण में बचा रह सकता है.
इसके बाद बीबीसी की टीम यह जानने के लिए निकली कि कुंभ के दौरान फेंका गया कचरा वास्तव में कहाँ से कहाँ तक जाता है? क्या इसे वैज्ञानिक तरीक़े से निपटाया जाता है? या यह सफ़ाई के रिकॉर्ड तक ही सीमित है?
कुंभ का कचरा, जीपीएस ट्रैकर और
114 दिन का सफ़र



बीबीसी की जीपीएस ट्रैकिंग सबसे पहले रामसजीवन और उनके सफाईकर्मी गैंग तक पहुँची. सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, कुंभ में सफ़ाई के लिए 15 हज़ार से अधिक सफ़ाईकर्मियों को अलग-अलग समूहों में बाँटा गया था.
रामसजीवन बताते हैं, “मैं पिछले 18 सालों से इस मेले का कचरा उठा रहा हूँ. हमारे गैंग में 12 लोग हैं. हम सुबह चार बजे से दोपहर दो बजे तक काम करते हैं. हम फूल, माला, नारियल से लेकर बच्चों के डायपर तक सब कुछ उठाते हैं. इसे लाइनर बैग में डालकर एक जगह इकट्ठा करते हैं. जहाँ से कचरा गाड़ी इसे ले जाती है.”
इसके बाद जीपीएस हमें अमन और रोहित की टीम तक लेकर गया. ये वे लोग हैं जो रामसजीवन जैसे सफ़ाईकर्मियों द्वारा इकट्ठे किए गए कचरे को छोटी गाड़ियों में भरकर डंपिंग यार्ड तक पहुँचाते हैं.
रोहित कहते हैं, "मेरी ड्यूटी सुबह तीन बजे से 11 बजे तक होती है. हम अलग-अलग स्थानों से कचरा इकट्ठा कर ट्रांसफर स्टेशन तक पहुँचाते हैं."
तो आख़िर एक श्रद्धालु ने कितना कचरा पैदा किया
इसी बीच हमने इस सवाल का जवाब भी ढूँढने की कोशिश की कि आख़िर एक श्रद्धालु ने एक दिन में कुंभ में कितना कचरा पैदा किया?
इसमें हमारी मदद की प्रयागराज के ही रहने वाले रजत मिश्रा ने. रजत ने दिन भर मेला घूमकर अपने द्वारा पैदा किए गए कचरे को हमारे लिए इकट्ठा किया.
रजत कहते हैं, “कुंभ में ज़्यादातर लोग बाहर से ही आते हैं और इसलिए उनके पास फेंकने वाला कचरा ज़्यादा होता है. इनमें एक बार इस्तेमाल होने और फिर फेंक देने वाली चीजें हैं. जैसे, पानी की बोतल, अंडरगार्मेंट, डायपर, पूजा के सामान- ये सब फेंके ही जाते हैं. घाट पर स्नान करने के बाद इतना समय नहीं होता कि आप अपने साथ चीज़ें लेकर वापस आएँ. इसलिए वहीं मेला क्षेत्र में ही कचरा फेंक दिया जाता है.’’
रजत मिश्रा ने यह जानने में हमारी मदद की कि कुंभ में एक दिन में एक श्रद्धालु लगभग कितना कचरा पैदा करता है.
रजत मिश्रा कुंभ क्षेत्र में माला खरीदते हुए.
कुंभ में आने वाले ज्यादातर श्रद्धालु मेला क्षेत्र में लगी दुकानों से कपड़ा से लेकर खाने-पीने तक का सामान खरीदते हैं.
मेला क्षेत्र में लगी अस्थाई दुकानों में से एक दुकान से रजत ने पानी की बोतल ख़रीदी.
कुंभ के एक दिन के सफ़र में रजत जैसे करोड़ों श्रद्धालु खाने-पीने के सामान से जुड़ा कुछ न कुछ कचरा ज़रूर पैदा करते हैं.
रजत बताते हैं कि मेला क्षेत्र में भारी भीड़ और जाने की जल्दी होने के कारण ज्यादातर श्रद्धालु नहाने के बाद भीगे हुए कपड़े वहीं मेला क्षेत्र में ही फेंक देते हैं.
कुंभ के दौरान नहाने के अलावा पूजा-पाठ का भी ख़ास महत्व होता है. ऐसे में फूल, माला, दीप और अगरबत्ती से निकला कचरा भी भारी मात्रा में पैदा होता है.
रात में रजत ने हमें कचरे से भरी थैली सौंपी. उसमें करीब आठ सौ ग्राम कचरा था. इस कचरे में प्लास्टिक की बोतलें, भोजन में इस्तेमाल होने वाली पत्तलें और स्नान के बाद फेंके गए कपड़े और अन्य कचरे शामिल थे.
सफ़ाई की क्या तैयारी की गई
इसके पहले कि हम कचरे के सफ़र में जीपीएस के अगले पड़ाव पर जाते हमने महाकुंभ मेला में सफ़ाई और स्वास्थ्य अधिकारी आकांक्षा राणा से बात की.
आकांक्षा राणा ने बताया, “महाकुंभ में 65 करोड़ श्रद्धालु आए थे. उसी हिसाब से हमने इसकी तैयारी की थी कि इस आयोजन से निकलने वाले कचरे का निपटारा कैसे किया जाएगा… इसमें लगभग दस हज़ार सफ़ाई कर्मचारी ‘सॉलिड वेस्ट’ और लगभग पाँच हज़ार सफ़ाई कर्मचारी टॉयलेट की सफ़ाई और रख रखाव के लिए शामिल किए गए थे. हमारी टीमें दिन-रात इसमें लगी रहीं. अब तक 18 हज़ार मीट्रिक टन कचरा हमने बसवार पहुँचाया है.”
हमारी उनसे यह बात 26 फ़रवरी को हुई थी. हमने अपने जीपीएस से लैस ‘डायपर’ के कचरे के बारे में जानना चाहा कि कुंभ के बाद इसका अंततः क्या होगा?
इसके जवाब में आकांक्षा राणा ने कहा, “हमारा काम कचरे को बसवार तक पहुँचाना है. उसके आगे नगर निगम ज़िम्मेदार है. ‘डायपर’ भी बसवार पहुँचेगा और उसके आगे वहीं प्रोसेस होगा.”
कचरे का अंततः क्या होगा, मेला में सफ़ाई और स्वास्थ्य अधिकारी के पास इसका जवाब नहीं था.


कुंभ क्षेत्र से निकलकर
कचरे का क्या होता है?


बहरहाल हमारे जीपीएस ट्रैकर कुंभ के इलाक़े से निकलकर आख़िर में प्रयागराज के बसवार गाँव स्थित वेस्ट डिस्पोज़ल प्लांट तक पहुँचते हैं. यह प्लांट साल 2011 में बना था. हालाँकि, वर्षों से इस पर महज़ एक डंपिंग ग्राउंड बनकर रह जाने के आरोप लगते रहे हैं. यही नहीं, आरोप है कि यहाँ कचरे का निपटान सही तरीक़े से नहीं हो पा रहा है.
बसवार वेस्ट डिस्पोज़ल प्लांट में फिलहाल चार कंपनियों को ठेका मिला हुआ है. इसमें कुंभ के कचरे के निष्पादन का ठेका इकोस्टैन नामक कंपनी को दिया गया है.
इकोस्टैन प्लांट के प्रोजेक्ट मैनेजर उदय कुमार ने बीबीसी को बताया, "हमारे पास कुंभ के दौरान प्रतिदिन लगभग 400 मीट्रिक टन कचरा आया. इसमें से 40% ऑर्गेनिक मटेरियल, 30% रिफ्यूज़ड डिराइव्ड फ़्यूल (आरडीएफ़) और 30% इनर्ट मटेरियल था."
उदय कुमार
उदय कुमार
कुंभ में कितने तरह का
कचरा पैदा होता है ?

आरडीएफ़
बसवार पहुँच रहे कचरे को तीन तरह के कचरे में अलग किया जाता है. पहला है, रिफ्यूज़ड डिराइव्ड फ़्यूल (आरडीएफ़) यानी कि वह कचरा जो डिस्पोज़ नहीं किया जा सकता. इसमें पॉलीथीन से लेकर प्लास्टिक की बोतल और कपड़े वग़ैरह शामिल हैं. इस कचरे को सीमेंट फ़ैक्ट्रियों और अन्य उद्योगों में ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है.
कंपोस्ट
दूसरा है, फूल, माला, दीप, अगरबत्ती, पूजा की अन्य सामग्रियाँ, जैसे कि चंदन, धूप या खाद्य पदार्थ. ऐसे कचरे से बनाया जाता है, कंपोस्ट यानी कि ऑर्गेनिक खाद.
सी एंड डी
तीसरा है, कंस्ट्रक्शन एंड डिमोलिशन (सी एंड डी) वेस्ट यानी कि बिल्डिंग, सड़कों और अन्य संरचनाओं के निर्माण, नवीनीकरण, मरम्मत और विध्वंस के दौरान निकलने वाला मलबा.

इसके अलावा एक तरह का कचरा और निकलता है. इसका नाम है, इनर्ट वेस्ट यानी कि काँच, प्लास्टर आदि वाला कचरा.
बसवार वेस्ट डिस्पोज़ल प्लांट के अधिकारियों का दावा है कि आरडीएफ़ को अलग-अलग फ़ैक्ट्रियों में भेजा जाता है और कंपोस्ट को आस-पास के ग्रामीणों को दे दिया जाता है.
हालाँकि, बसवार में हक़ीक़त कुछ और कहती है.
बसवार के लोगों का सवाल,
क्या एक जगह से उठाकर
दूसरी जगह रख देने को सफ़ाई कहते हैं

कुंभ मेले के कचरे का बसवार पहुँचने तक का सफ़र सही तरीक़े से होता हुआ दिखाई देता है. लेकिन बड़ा सवाल है कि बसवार पहुँचने के बाद इस कचरे का क्या होता है?

धर्मराज पाल
इस सवाल के जवाब में बसवार प्लांट से बमुश्किल तीन सौ मीटर दूर बसे धर्मराज पाल बताते हैं, "जो मक्खी कूड़े पर बैठती है, वही मक्खी हमारी थाली पर पहुँच जाती है. यह कितनी गंभीर समस्या है. लेकिन न इसके लिए कोई दवा है और न ही कोई समाधान. इसकी वजह से बीमारियाँ फैल रही हैं, जो पहले इतनी गंभीर नहीं होती थीं.’’
अपने सामने भिनभिना रही मक्खियों को हाथों से हटाने का असफल प्रयास करते हुए धर्मराज आगे कहते हैं, “कूड़े से निकलने वाली दुर्गंध इतनी तेज़ होती है कि आदमी को घुटन महसूस होती है. अगर किसी को पहले से ही साँस लेने में दिक़्क़त है तो यह स्थिति और भी ख़राब हो जाती है. जब यह कूड़ा नहीं था, उसके पहले से हम यहाँ हैं. जब से यहाँ गिरने लगा है, तब से हम यहाँ परेशानियों के बीच रहने को मजबूर हैं.”

प्रियंका पाल
प्रियंका पाल तीन साल पहले इस गाँव में ब्याह कर आई थीं. वह कहती हैं, "कभी-कभी लगता है कि कहाँ आ गई हूँ. दिन भर कचरे की दुर्गंध से घुटन होती है. बच्चों की सेहत पर असर पड़ रहा है."
यहाँ के लोग बढ़ती हुई बीमारियों, बच्चों के सफ़ेद होते बाल, चमड़ी पर होने वाले फोड़े-फुंसियों और अस्पतालों के बढ़ते चक्करों का ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि कचरे का सही निष्पादन न होना, उनकी बदहाली का मुख्य कारण है.



जहाँ एक तरफ़ महाकुंभ के कचरे का सफ़र बसवार प्लांट पहुँचने के बाद सवाल खड़े करता है, वहीं इस प्लांट में मौजूद पुराने कचरे पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने जनवरी 2025 में ही संशय जताया था.
इस साल बीस जनवरी को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने प्रयागराज नगर निगम से पूछा कि सालों से पड़ा कचरा अचानक कहाँ चला गया? ट्रिब्यूनल ने सवाल उठाया कि 40 लाख लोगों की आबादी वाले इस शहर में प्रतिदिन कितना कचरा निकलता है और उसका निपटान कैसे किया जा रहा है?
इसके जवाब में नगर निगम ने दावा किया कि पुराने कचरे को सीमेंट कंपनियों को भेजा गया है. हालाँकि, वे यह बताने में असफल रहे कि किन कंपनियों को यह कचरा दिया गया.
और इस तरह कचरा पहुँचा सतना
बहरहाल, ऐसे ही आरडीएफ़ वेस्ट से भरे कचरे की गाड़ी में बीबीसी की टीम ने तीसरा ट्रैकर रखा. इसके साथ सफ़र करते हुए हम जा पहुँचे बसवार से 200 किलोमीटर दूर मध्यप्रदेश के सतना शहर के एक सीमेंट प्लांट तक.
इस सीमेंट प्लांट के अधिकारियों ने आधिकारिक तौर पर इस पर टिप्पणी करने से मना कर दिया. लेकिन उन्होंने यह बताया कि यहाँ आरडीएफ़ कचरे का इस्तेमाल ईंधन के तौर पर किया जाता है. इसमें डायपर भी शामिल रहते हैं.
प्रयागराज नगर निगम
का दावा,
ग्रामीण ख़ुश लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त क्या?

सतना से लौटकर हम ग्रामीणों की परेशानियों और बसवार में बीबीसी की टीम की आँखों देखी के साथ प्रयागराज के नगर निगम कमिश्नर चंद्र मोहन गर्ग के पास पहुँचे. उनसे कुंभ के कचरे से जुड़े कुछ सवाल किए.
सबसे पहले हमने पूछा कि कुंभ के कचरे के मैनेजमेंट के लिए क्या व्यवस्था की गई थी?
इसके जवाब में कमिश्नर चंद्र मोहन गर्ग बताते हैं, “कचरे के सही निष्पादन के लिए दो साल पहले से तैयारी शुरू कर दी थी. इसलिए जो भी कचरा पैदा हुआ, उसका 100% डिस्पोज़ल कर दिया गया है.’’
नगर कमिश्नर के मुताबिक, महाकुंभ के दौरान 30 हज़ार मीट्रिक टन कचरा पैदा हुआ है.
ग्रामीणों की परेशानियों पर वह कहते हैं, “आप जाकर अभी बात कीजिए तो गाँव के लोग आपको ख़ुश मिलेंगे. पहले वहाँ पर काफ़ी कचरा इकट्ठा था लेकिन हमने कुंभ और भविष्य को देखते हुए, वहाँ कचरे के वैज्ञानिक तरीक़े से डिस्पोज़ल के लिए सभी उपयुक्त व्यवस्थाएँ की हैं. जो बचा-खुचा है, उसे भी जल्द ही डिस्पोज़ कर दिया जायेगा.”


लैंडफ़िल पर बिना प्रोसेस कर फेंका हुआ कचरा हमने भी देखा. हम वहाँ नगर निगम के एक अधिकारी पर्यावरण अभियंता उत्तम कुमार वर्मा के साथ पहुँचे. हमने उनसे धर्मराज का सवाल दोहराया. उनका जवाब था, “ये कचरा नहीं है… ये लेगेसी वेस्ट है… दरअसल पुरानी खाद जो अब बायोसॉइल बन गई है. उसे किसानों की माँग के चलते वहाँ निचली भूमि में डाला गया है.”
हालाँकि, बीबीसी की पड़ताल में यह देखने को मिला कि गाँव से सटे हुए ही कचरे के बड़े-बड़े डंपिंग ग्राउंड बने हुए हैं. इनमें कहने को तो इनर्ट कचरा और कंपोस्ट है लेकिन देखने पर पन्नियों के ढेर, प्लास्टिक बोतलें और यहाँ तक कि डायपर भी साफ़ दिखाई पड़ते हैं.
धर्मराज पाल ने आरोप लगाया, “यहाँ कहने को तो कचरे की प्रोसेसिंग कर रहे हैं लेकिन प्रोसेसिंग क्या है, आपको सामने नज़र आएगी. आप देख लीजिए मेरे घर के ठीक बगल में कचरा डंप किया गया है जिसमें प्लास्टिक और बोतल सब दिखेगा. ये सब तो नष्ट होने वाली चीज़ नहीं हैं? फिर ये हमारे घर के पास ज़मीन में क्यों दफ़नाया जा रहा है.”
बसवार की वंदना निषाद कहती हैं, "इस कचरे से हमें सिर्फ़ बर्बादी मिली है. इससे हमारे यहाँ बीमारियाँ बढ़ गई हैं. बच्चों के बाल सफ़ेद हो रहे हैं. लोगों के शरीर पर फोड़े होने लगे हैं.’’
धर्मराज आगे आरोप लगाते हैं, “सरकार सिर्फ़ कचरे को एक जगह से उठाकर दूसरी जगह रख देने को सफ़ाई अभियान की सफलता बता रही है. जबकि कचरे का सही तरह से डिस्पोज़ल होना चाहिए जो नहीं हो रहा है.”
सरकारी दावों के मुताबिक, कुंभ मेले से पैदा हुए कचरे का 45 दिनों के भीतर पूर्णतः निपटान हो जाता है.
हालाँकि, बीबीसी द्वारा 29 जनवरी को छोड़ा गया जीपीएस से लैस कचरा, 23 मई को 114 दिनों बाद भी बसवार प्लांट में पड़ा हुआ मिला.
जनवरी 2025 में सरकार ने दावा किया कि बसवार प्लांट में ‘मियावाकी तकनीक’ का उपयोग करके नौ हज़ार वर्ग मीटर क्षेत्र में एक सघन वन तैयार किया गया है. हालाँकि, जब बीबीसी की टीम वहाँ पहुँची, तो वहाँ जंगल का कोई नामो-निशान नहीं था.
सरकार का कहना है कि हर ग्राम कचरे का निपटान वैज्ञानिक तरीक़े से किया गया. लेकिन वास्तव में कचरा केवल एक जगह से दूसरी और दूसरी से तीसरी जगह शिफ़्ट हुआ. अगर सरकार का कचरे के वैज्ञानिक प्रोसेसिंग का दावा सही होता तो ये जीपीएस ट्रैकर कब के नष्ट हो गए होते. हालाँकि, बीबीसी की जीपीएस ट्रैकिंग एक अलग ही कहानी बयान करती है. एक ऐसी कहानी जो बसवार की मिट्टी में अब भी दबी हुई है.
क्रेडिट्स:
रिपोर्टर : पुनीत बरनाला, विष्णुकांत तिवारी
कैमरा: रोहित लोहिया
इलस्ट्रेशन: पुनीत बरनाला
प्रोडक्शन और डिज़ाइन: वासिफ़ ख़ान
एग्ज़ीक्यूटिव एडिटर: सरोज सिंह
कमीशनिंग एडिटर: सरोज सिंह, विनीत खरे






























