
नेपाल के बीरगंज में सोनरनिया गाँव के सुरेश पासवान के घर में क़रीब 30 बच्चे-बच्चियाँ पढ़ाई ख़त्म करने के बाद संकल्प ले रहे हैं कि वे नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाएंगे और धर्मांतरण के साथ गोहत्या रुकवाएंगे.
ज़्यादातर बच्चे-बच्चियाँ दलित परिवारों से हैं.
एकल विद्यालय में बच्चे-बच्चियों को पढ़ाते सोहनलाल प्रसाद साह
एकल विद्यालय में बच्चे-बच्चियों को पढ़ाते सोहनलाल प्रसाद साह
इसे एकल विद्यालय कहा जाता है, जो 1992 में शुरू हए थे. ऐसे एकल विद्यालय केवल बीरगंज में ही नहीं हैं, नेपाल के कई इलाक़ों में चल रहे हैं.
नेपाल में हिंदुत्व की राजनीति को आगे बढ़ाने में जो संगठन सबसे सक्रिय है, उसका नाम 'हिंदू स्वयंसेवक संघ' (एचएसएस) है.
नेपाल के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों में भी एचएसएस नाम का संगठन सक्रिय है.
आरएसएस और एचएसएस, अपनी वेबसाइटों पर आपसी संबंधों का ज़िक्र नहीं करते हैं लेकिन उनका जुड़ाव हर स्तर पर दिखता है. एचएसएस के जनकपुर संभाग के कार्यवाह रंजीत साह कहते हैं कि पूरे नेपाल में 1048 एकल विद्यालय और 35 पशुपति शिक्षा मंदिर चल रहे हैं.
सोहनलाल प्रसाद साह नेपाल के बारा ज़िले के एकल विद्यालय के प्रमुख हैं. जब हम बीरगंज से क़रीब 20 किलोमीटर दूर सोनरनिया गांव पहुँचे तो सुरेश पासवान के घर में चल रहे एकल विद्यालय में वह शिक्षक की भूमिका में थे.
सोहनलाल प्रसाद साह बताते हैं कि ये विद्यालय और वे ख़ुद, दोनों आरएसएस से जुड़े हैं.
सोहनलाल प्रसाद साह बताते हैं, "एकल विद्यालय आरएसएस का है. यह किसी इमारत में नहीं चलता है. एकल विद्यालय किसी के घर में या किसी पेड़ के नीचे चलता है.
हम स्कूल में अपनी संस्कृति के प्रति बच्चों को सचेत करते हैं. संस्कार वाली शिक्षा देते हैं. इसमें गोमाता का सम्मान करना, धर्मांतरण के बारे में जागरूक करना और नेपाल को फिर से हिन्दू राष्ट्र बनाने जैसे मुद्दे शामिल हैं.”
सोहनलाल प्रसाद साह ने बताया कि उनकी आरएसएस की 21 दिनों की ‘ओटीसी ट्रेनिंग’ गोरखपुर में हुई थी

पशुपति
शिक्षा मंदिर

नेपाल में हिंदुत्व के इस अभियान में दो लोग नेतृत्व के स्तर पर सक्रिय हैं- रवित कुमार और वेद प्रकाश. बातचीत में दोनों नेपाल में आरएसएस की भूमिका पर कुछ भी बोलने से परहेज़ करते हैं. रवित कुमार मेरठ के हैं और वेद प्रकाश ख़ुद को नेपाल के विराटनगर का बताते हैं.


जब हम 29 अप्रैल की शाम बीरगंज के पशुपति शिक्षा मंदिर के परिसर में पहुँचे तो वहाँ एचएसएस के स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण कार्यक्रम चल रहा था.
इस विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्रशिक्षक तैयार किए जा रहे थे. माहौल आरएसएस की शाखा वाला ही था, यूनिफॉर्म (गणवेश) भी बिल्कुल वही. शाखा में शामिल होने से पहले भगवा ध्वज को प्रणाम करने का तरीक़ा भी वही. शाखा ख़त्म होने से पहले की प्रार्थना भी वही- ‘नमस्ते सदा वत्सले...’
पशुपति शिक्षा मंदिर में हमें देखकर आरएसएस के रवित कुमार और वेद प्रकाश ने हैरानी जताते हुए कहा- 'आप लोग यहाँ भी पहुँच गए?' दरअसल, पहले इनसे हमारी मुलाक़ात काठमांडू में हो चुकी थी.
शाखा में आए कुछ लोगों ने बताया कि इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में स्वयंसेवकों को ट्रेनिंग देने वालों में आरएसएस के ही लोग हैं. शाखा समापन से पहले की प्रार्थना के दौरान, रवित कुमार और वेद प्रकाश भी अपने दाहिने हाथ को सीने से लगाए सावधान की मुद्रा में खड़े दिखे.
शाखा ख़त्म होने से पहले की प्रार्थना में आरएसएस के प्रचारक वेद प्रकाश (ऊपर) और रवित कुमार (नीचे), दोनों पीले वस्त्र में
शाखा ख़त्म होने से पहले की प्रार्थना में आरएसएस के प्रचारक वेद प्रकाश (ऊपर) और रवित कुमार (नीचे), दोनों पीले वस्त्र में
आरएसएस और एचएसएस कब एक ही हैं, और कब अलग, यह भेद करना मुश्किल है. काठमांडू में एचएसएस के मुख्यालय का नाम केशव धाम है और दिल्ली में आरएसएस के मुख्यालय का नाम केशव कुंज.
नेपाल में एचएसएस के राष्ट्रीय संघचालक और पूर्व पुलिस अधिकारी कल्याण कुमार तिम्सिना से हमने केशव धाम में मिलने के लिए आग्रह किया लेकिन वह वहाँ मिलने के लिए तैयार नहीं हुए.
इसके बाद उनसे हमारी मुलाक़ात काठमांडू में 'हिन्दू राष्ट्र स्वाभिमान जागरण अभियान' के कार्यालय में हुई. जब कल्याण कुमार आए तो बहुत सजग होकर एक पन्ने पर लिखे नोट लेकर बैठे.
जब भी कल्याण कुमार से आरएसएस और नेपाल से जुड़े सवाल पूछे गए तो 'हिन्दू राष्ट्र स्वाभिमान जागरण अभियान' के महासचिव देवेश झा ने मोबाइल स्क्रीन को उनके आगे कर दिया, वे उसी मोबाइल स्क्रीन देखकर जवाब देते रहे, पूरी बातचीत में यही जताने की कोशिश की कि उनका आरएसएस से कोई संबंध नहीं है लेकिन उन्होंने इस बात को खुलकर स्वीकार किया कि हिन्दुत्व ही उनका लक्ष्य है.
हमें कई ऐसी चीज़ें दिखीं, जिनसे आरएसएस से उनके गहरे रिश्ते उजागर होते थे. जैसे बीरगंज के पशुपति शिक्षा मंदिर को ही लें. प्रधानाध्यापक के चैंबर का नाम हेडगेवार कक्ष है तो स्कूल की दूसरी मंजिल पर गोलवलकर की तस्वीर रखी थी.
पशुपति शिक्षा मंदिर में आरएसएस के संस्थापक हेडगेवार और दूसरे सरसंघचालक गोलवलकर की तस्वीर थी और प्रधानाध्यापक के चैंबर का नाम हेडगेवार कक्ष था
पशुपति शिक्षा मंदिर में आरएसएस के संस्थापक हेडगेवार और दूसरे सरसंघचालक गोलवलकर की तस्वीर थी और प्रधानाध्यापक के चैंबर का नाम हेडगेवार कक्ष था
केशव बलिराम हेडगेवार आरएसएस के संस्थापक थे और माधव सदाशिव गोलवलकर आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक. इस स्कूल में हमें नेपाल के किसी महान व्यक्ति की तस्वीर नहीं दिखी.


फ़रवरी 2023 में मेरी मुलाक़ात एचएसएस के जनकपुर संभाग के कार्यवाह रंजीत साह से उनके ऑफ़िस में हुई थी. उनकी कुर्सी के ठीक पीछे आरएसएस के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार और माधव सदाशिवराव गोलवलकर की तस्वीरें लगी थीं.
हमने तस्वीरों की ओर इशारा करते हुए रंजीत साह से पूछा था कि क्या आपके आदर्श यही हैं? रंजीत साह का जवाब था- 'मैं एक स्वयंसेवक हूँ. भला इनके सिवा हमारा आदर्श और कौन होगा?'
बीरगंज के उमेश यादव बताते हैं कि वे बाल स्वयंसेवक थे और अब एचएसएस के लिए समर्पित हैं.
उमेश यादव बताते हैं कि स्वयंसेवकों के तीसरे वर्ष का प्रशिक्षण कार्यक्रम संघ के मुख्यालय नागपुर में होता है. भले ही वे स्वयंसेवक आरएसएस के हों या फिर एचएसएस के.
उमेश यादव को लगता है कि स्वयंसेवक होने के कारण वह अपने जीवन में बहुत अनुशासित हुए हैं और देशभक्ति को लेकर सजग हुए हैं.


रंजीत साह बताते हैं कि नेपाल में एचएसएस के कुल 12 संगठन काम करते हैं. ये संगठन नेपाल के सामाजिक-राजनीतिक जीवन के सभी क्षेत्रों में सक्रिय हैं.


वॉल्टर एंडरसन अमेरिका के जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी में साउथ एशिया स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर रहे हैं. उन्होंने पत्रकार और लेखक श्रीधर डी दामले के साथ मिलकर 'द आरएसएस, अ व्यू टू द इनसाइड' किताब लिखी है.
वॉल्टर और दामले ने इस किताब में विदेशों में आरएसएस नाम से एक अध्याय में लिखा है, "हिन्दू स्वयंसेवक संघ यानी एचएसएस टर्म का इस्तेमाल आरएसएस की विदेशी ब्रांच के लिए किया जाता है. एचएसएस ग्लोबल स्तर पर राष्ट्रीय शब्द इस्तेमाल नहीं करता है क्योंकि यह शब्द उसे ख़ास भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित करता है".
वॉल्टर और दामले ने लिखा है, "एचएसएस की क़रीब तीन दर्जन देशों में मौजूदगी है. विदेशों में मोदी की जो रैलियाँ होती हैं, उनकी सफलता में एचएसएस का अहम योगदान होता है. अमेरिका के न्यूयॉर्क में मैडिसन स्क्वेयर में 28 सितंबर 2014 की दोपहर नरेंद्र मोदी की रैली में भी आरएसएस की विदेशी ब्रांच एचएसएस के स्वयंसेवक बड़ी संख्या में मौजूद थे."
उन्होंने लिखा है, "हर देश का एचएसएस, प्रशासनिक के साथ वैधानिक मामले में एक-दूसरे से और आरएसएस से स्वतंत्र है. लेकिन अक्सर आरएसएस के पूर्णकालिक प्रचारक ही उनके काम देखते हैं. विदेशों में मोदी की रैलियाँ आयोजित कराने में बीजेपी से जुड़ी ‘ओवरसीज़ फ्रेंड्स ऑफ द बीजेपी’(ओएफ़बीजेपी) एचएसएस के साथ मिलकर काम करती है.’’
वॉल्टर और दामले ने इस किताब में ओएफ़बीजेपी के समन्वयक रहे विजय चौथाईवाले का हवाला देते हुए लिखा है कि रैलियों में उनका सबसे अहम काम था, 'प्रतिभाशाली, ऊर्जावान, भारत समर्थक और निःस्वार्थ लोगों' को ढूँढकर उन्हें स्थानीय एचएसएस में शामिल करना.
आरएसएस और एचएसएस में क्या सबंध है ? ये सवाल नेपाल में आरएसएस के प्रचारक रवित कुमार से पूछा तो उन्होंने कहा कि वह इस पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं रखते हैं. रवित कुमार ने कहा कि आप भारत में संपर्क कीजिए. भारत में आरएसएस के सह प्रचार प्रमुख प्रदीप जोशी से पूछा तो उन्होंने कहा कि वह इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते हैं.
नेपाल में आरएसएस

पृथ्वी नारायण शाह को आधुनिक नेपाल का निर्माता कहा जाता है. उनकी विचारधारा को आरएसएस के क़रीब बताया जाता है.
पृथ्वी नारायण शाह की प्रतिमा
पृथ्वी नारायण शाह की प्रतिमा
नेपाल के जाने-माने लेखक सीके लाल कहते हैं, "पृथ्वी नारायण शाह का कहना था कि सैनिकों के ज़रिए युद्ध तो जीता जा सकता है लेकिन जीत के बाद नियंत्रण बनाए रखने के लिए विचारधारा अनिवार्य होती है. पृथ्वी नारायण शाह नेपाल को असली ‘हिन्दुस्थान’ बताते थे क्योंकि जिसे हिन्दुस्थान कहा जाता है, वहाँ मुग़ल थे और फिर अंग्रेज़ आ गए जबकि नेपाल स्वतंत्र रहा."
सीके लाल कहते हैं, "नेपाल के राजा-रजवाड़े अपनी धार्मिक वैधानिकता के लिए काशी जाते थे. यहाँ तक कि पृथ्वी नारायण शाह ने भी अपना गोत्र परिवर्तन काशी में ही किया था. पृथ्वी नारायण शाह को जनजातीय समुदाय का माना जाता है लेकिन उन्हें काशी में मराठी ब्राह्मणों ने क्षत्रिय का गोत्र दिया था.”
मराठी ब्राह्मणों और नेपाल के ऐतिहासिक संबंधों के बारे में सीके लाल कहते हैं, “साल 1857 के गदर में नाना साहेब पेशवा कानपुर की लड़ाई हारने के बाद हिन्दू राष्ट्र मानते हुए ही नेपाल पहुँचे थे. 1925 में मराठी ब्राह्मणों ने ही आरएसएस बनाया."
नेपाल में चंद्र शमशेर राणा का शासन काल (1901-1929) और आरएसएस के बनने (1925) की प्रक्रिया का समय एक ही रहा है. चंद्र शमशेर राणा के शासन से मराठी ब्राह्मणों के संबंध और गहरे हुए थे.
चंद्र शमशेर राणा की बेटियों की शादी भारत में हुई और यह निरंतरता बनी रही. ग्वालियर की राजमाता कही जाने वाली विजयाराजे सिंधिया भी इसी परिवार से थीं और वह आरएसएस से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी थीं.

सीके लाल कहते हैं, "राजा महेंद्र का ननिहाल भी भारत में ही था. ये संबंध हिन्दूवादियों से ज़्यादा थे. जिस समय आरएसएस से कोई नहीं जुड़ना चाहता था, उस समय नेपाल की सत्ता से आरएसएस की क़रीबी थी. नेपाल में शुरू से ही ब्राह्मणवाद मज़बूत रहा है. 1956 में डॉ. भीमराव आंबेडकर को पशुपति मंदिर में नहीं जाने दिया गया था."
साल 1964 में नेपाल के राजा महेंद्र आरएसएस के निमंत्रण पर एक रैली को संबोधित करने नागपुर आने वाले थे, राजा महेंद्र की रैली से भारत की तत्कालीन कांग्रेस सरकार काफ़ी असहज थी. तब आरएसएस की कमान गोलवलकर के पास थी और उन्होंने ही राजा महेंद्र के आने की घोषणा की थी.
यह बात स्पष्ट नहीं थी कि राजा महेंद्र ने आरएसएस का न्यौता स्वीकार करने से पहले भारत सरकार से संपर्क किया था या नहीं. आख़िरकार, यह दौरा टल गया था.
साल 1960 के दशक में नेपाल में भारत के राजदूत रहे श्रीमन नारायण ने अपनी किताब 'इंडिया एंड नेपाल: एन एक्सर्साइज़ इन ओपन डेमोक्रेसी' में लिखा है, "किंग महेंद्र ने आरएसएस का न्यौता तब स्वीकार किया था, जब दिल्ली की कांग्रेस सरकार से उनका संबंध बहुत अच्छा नहीं था. दूसरी तरफ़, आरएसएस नेपाल के राजा को हिन्दू सम्राट के रूप में देखता था."
साल 2008 में नेपाल में राजशाही ख़त्म होने के बाद पुष्प कमल दाहाल ‘प्रचंड’ प्रधानमंत्री बने थे. इसके बाद उन्होंने साल 2009 में काठमांडू के पशुपतिनाथ मंदिर में भारतीय पुजारी की जगह नेपाली पुजारी की नियुक्ति कर दी थी.
पशुपति मंदिर के मुख्य पुजारी महाबालेश्वर भट्ट और दो अन्य लोगों ने प्रचंड की अगुआई वाली माओवादी सरकार के दबाव में इस्तीफ़ा दे दिया था. इस इस्तीफ़े के बाद इतिहास में पहली बार पशुपति मंदिर में नेपाली पुजारी की नियुक्ति की गई थी.
इसके विरोध में एचएसएस के स्वयंसेवकों ने पशुपति मंदिर के बाहर विरोध-प्रदर्शन भी किया था.
काठमांडू के पशुपतिनाथ मंदिर में ऐतिहासिक रूप से कर्नाटक के भट्ट पुजारी बनते रहे हैं. एचएसएस के तत्कालीन चेयरमैन उमेश खनाल ने तब भारत के अंग्रेज़ी अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स से कहा था, "हम धार्मिक मामलों में किसी भी तरह के राजनीतिक हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं करेंगे. अगर ज़रूरत पड़ी तो हम भगवान पशुपतिनाथ को बचाने के लिए हथियार भी उठा सकते हैं."
हिन्दू स्वयंसेवक संघ के मौजूदा राष्ट्रीय संघचालक कल्याण कुमार तिम्सिना ने बीबीसी से कहा कि सदियों से चली आ रही परंपरा को तोड़ने का किसी को अधिकार नहीं है. वे कहते हैं, "अब चीज़ें ठीक हो गई हैं. अब प्रचंड भी महाकाल (उज्जैन) में पूजा-अर्चना के लिए जा रहे हैं."

आरएसएस पर
बीपी कोईराला की सख़्ती

नेपाल में एक राजनीतिक तबके में आरएसएस को लेकर असहजता भी रही है. यह असहजता तब और बढ़ी जब बीपी कोईराला साल 1959 में नेपाल के पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री बने.
साल 1960 में नेपालगंज में ‘सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने’ और नेपाल के ‘नया मुल्क’ (बाँके, बरदिया, कइलाली और कंचनपुर) को फिर से भारत में शामिल करने की कथित मुहिम को लेकर काफ़ी हंगामा हुआ था.
1960 में ही इसी घटना के बारे में नेपाल की संसद में प्रधानमंत्री बीपी कोईराला से सवाल पूछा गया. बीपी कोईराला ने संसद में कहा, "नेपालगंज में सांप्रदायिक और मधेसी बनाम पहाड़ी की भावना फैलाने के मामले में पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ़्तार किया है, उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की जाएगी. वे ऐसे प्रचार में लगे हुए थे कि 1857 के गदर के बाद नेपालगंज नेपाल को मिला है और ये इलाक़ा भारत में जाना चाहिए."

नेपाली इतिहासकार ग्रीष्मबहादुर देवकोटा ने लिखा है, "इसके बाद पश्चिमांचल के डीआईजी ने अपनी बात रखी और कहा कि दो हफ़्तों से शाम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में स्थानीय युवाओं, विद्यार्थियों और अन्य व्यक्तियों को डंडे और तलवार देकर भारतीय राष्ट्र ध्वज और भगवा झंडे के साथ ट्रेनिंग दी जा रही थी.”
इस मामले में ‘नारायण शिक्षा प्रसार योजना’ के संचालक श्रीदान बहादुर सिंह, नारायण इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल श्यामलाल पांडे, नारायण इंटर कॉलेज के शिक्षक खेमराज शाह (नेपाली नागरिक) और ‘हिन्दुस्थान समाचार’ एजेंसी के प्रतिनिधि गया प्रसाद मिश्र (भारतीय) समेत छह लोगों को गिरफ़्तार किया गया था.
नेपाली राजनयिक विजयकांत कर्ण काठमांडू में 'सेंटर फ़ॉर सोशल इन्क्लूज़न एंड फ़ेडरलिज़म' (सीईआईएसएफ़) नाम से एक थिंकटैंक चलाते हैं.
वे कहते हैं, “बीपी कोईराला नेहरू और लोहिया की विचारधारा वाले नेता थे. उनकी राजनीति में धर्मनिरपेक्षता कभी धुँधली नहीं हुई. वे हिन्दुत्व की राजनीति और आरएसएस को लेकर बहुत सख़्त थे. राजा महेंद्र ने 18 महीने के कार्यकाल के बाद, 1960 में कोईराला को प्रधानमंत्री पद से हटाकर जेल में डाल दिया, इसका एक कारण ये भी था कि वे हिंदुत्व की राजनीति के ख़िलाफ़ थे. बीपी कोईराला के जेल जाने के बाद ही नेपाल हिन्दू राष्ट्र बना था.”
नेहरू की
नाराज़गी

दिलचस्प है कि बीपी कोईराला ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में शामिल हुए थे और जेल भी गए थे जबकि बतौर संगठन आरएसएस ने ख़ुद को भारत छोड़ो आंदोलन से अलग रखा था.
राजा महेंद्र ने जब बीपी कोईराला को प्रधानमंत्री पद से हटाकर जेल में डाल दिया था तो भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नाराज़गी जताते हुए इसे 'शाही तख़्तापलट' कहा था.
नेपाल में भारत के राजदूत रहे रंजीत राय कहते हैं कि नेहरू की नाराज़गी को देखते हुए राजा महेंद्र ने भारत में नेहरू विरोधी ताक़तों का समर्थन हासिल करने की कोशिश की थी.
रंजीत राय ने अपनी किताब 'काठमांडू डिलेमा: रीसेटिंग इंडिया नेपाल टाइज़' में लिखा है, "राजा महेंद्र ने हिन्दू भावना भुनाने की कोशिश की थी.”
नेपाल में भारत के राजदूत रहे रंजीत राय
नेपाल में भारत के राजदूत रहे रंजीत राय
‘’बीपी कोईराला के बाद नेपाल में दलविहीन पंचायती व्यवस्था आई. इस व्यवस्था के तहत तुलसी गिरी प्रधानमंत्री बने, तुलसी गिरी राजनीतिक तौर पर कोईराला के विपरीत थे और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य भी थे. यह वह दौर था जब हिंदुत्व की राजनीति को पनपने का मौका मिला.’’
रंजीत राय कहते हैं, ‘’किंग महेंद्र के उत्तराधिकारी वीरेंद्र को विश्व हिन्दू महासंघ ने विश्व हिन्दू सम्राट घोषित किया. विश्व हिन्दू महासंघ का संबंध विश्व हिन्दू परिषद से है. वीएचपी के तब के नेता अशोक सिंघल भी उस दौरान शाही दरबार में आते-जाते रहते थे.’’
धर्म और राजनीति
के अंतर्विरोध
साल 1816 में सुगौली की संधि के ज़रिए एंग्लो-नेपाल युद्ध ख़त्म हुआ था और ब्रिटिश कंपनी ने नेपाल-भारत के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा खींची थी.
साल 1857 में भारत में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ विद्रोह हुआ. इसे आज़ादी की पहली लड़ाई भी कहा जाता है. इससे निपटने के लिए कंपनी सरकार ने नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री जंग बहादुर राणा से मदद माँगी थी. इसके बाद राणा अपने सैनिकों के साथ ख़ुद ब्रितानियों की तरफ़ से लड़ने पहुँचे थे. राणा ने ख़ुद इसका नेतृत्व किया था.
दूसरी तरफ़, अवध के आख़िरी नवाब वाजिद अली शाह की पत्नी बेगम हज़रत महल 1857 में ब्रितानियों के ख़िलाफ़ संघर्ष कर रही थीं. जंगबहादुर राणा के आने से अंग्रेज़ों को बढ़त मिली और बेगम हज़रत महल को नेपाल में शरण लेनी पड़ी. बेगम हज़रत महल ने 1879 में नेपाल में ही आख़िरी साँस ली थी.
जंगबहादुर राणा की मदद से ख़ुश होकर ब्रिटिश हुकूमत ने भारत के चार शहर नेपाल को सौंप दिए थे. ये शहर थे- बाँके, बरदिया, कइलाली और कंचनपुर. इन चार शहरों को नेपाल में ‘नया मुल्क’ भी कहा जाता है.
नेपाल में
हिन्दुत्व का ज़ोर

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साल 2018 में जनकपुर आए थे. पीएम मोदी के जनकपुर आने से पहले और जाने के बाद इस शहर में कई तरह के परिवर्तन हुए.
पीएम मोदी के स्वागत में जनकपुर उप-महानगरपालिका के तत्कालीन मेयर लालकिशोर साह ने शहर की कई दीवारों को भगवा रंग में रंगवा दिया था. जनकपुर उप-महानगरपालिका का नाम बदलकर ‘जनकपुर धाम उप-महानगरपालिका’ कर दिया था.
नेपाल में कई लोग मानते हैं कि साल 2014 में भारत में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद नेपाल में हिन्दुत्व की राजनीति को बल मिला है.
दूसरी ओर, कई लोग यह भी मानते हैं कि नेपाल में मुसलमानों को लेकर माहौल बदल रहा है. बिहार और यूपी से सटे मधेस इलाक़े में आए दिन सांप्रदायिक तनाव देखने को मिल रहा है.
इसी साल 12 अप्रैल को हनुमान जयंती की शोभा यात्रा में सांप्रदायिक झड़प हुई थी. कई दुकानों में आग भी लगा दी गई थी. सांप्रदायिक तनाव को देखते हुए ज़िला प्रशासन ने कर्फ्यू लगा दिया था. इससे पहले 2023 में रामनवमी के जुलूस के दौरान सांप्रदायिक झड़प हुई थी.





मधेस में आने वाले बीरगंज इलाक़े में रहने वाले लोगों का कहना है कि नेपाल में ऐसी घटनाएं पहले कभी नहीं हुईं.
मधेस प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे लालबाबू राउत कहते हैं कि "भारत बड़ा मुल्क है तो अच्छाई और बुराई दोनों चीज़ें आती हैं."
लालबाबू राउत कहते हैं, "बिहार में स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मुफ़्त में साइकिल देने की योजना शुरू की गई. यह योजना हमें भी अच्छी लगी तो हमने भी मधेस में शुरू की. इसी तरह, यूपी, बिहार की सांप्रदायिक राजनीति की लपटें भी मधेस में आती हैं."
ज्योत्सना साउद विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े संगठन विश्व हिंदू महासंघ की उपाध्यक्ष हैं.
ज्योत्सना साउद भारत में नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बारे में पूछे जाने पर कहती हैं, "हमें नैतिक बल तो ज़रूर मिला है. नरेंद्र मोदी हिन्दुत्व के प्रेरणास्रोत हैं और हमें भी उनसे नैतिक साहस मिला है. हम सब चाहते हैं कि नेपाल फिर से हिन्दू राष्ट्र बने.”
लोकराज बराल भारत में नेपाल के राजदूत रहे हैं. बराल मानते हैं कि नेपाल की राजनीति में आरएसएस का प्रभाव बढ़ा है.
बराल कहते हैं, "भारत में बीजेपी भारत माता की जय का नारा लगाती है. इसी तर्ज़ पर नेपाल में भी 'नेपाल आमा को जय' का चलन बढ़ा है. ‘नेपाल आमा को जय’ का नारा यहाँ की राजनीतिक परंपरा में नहीं रहा है. ऐसी कई चीज़ें हैं जो पिछले 10 सालों में बढ़ी हैं. नेपाल में हिन्दूइज़म को हिन्दुत्व में तब्दील किया जा रहा है."
जावेदा ख़ातून नेपाल के बरदिया ज़िले की हैं और वह नेपाली कांग्रेस की सांसद हैं. जावेदा ख़ातून को लगता है कि भारत में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद "नेपाल के मधेस इलाक़े में सांप्रदायिक सौहार्द पर सीधा असर पड़ा है."
जावेदा ख़ातून कहती हैं, "यहाँ धार्मिक टकराव बढ़ा है. हम तो माता जानकी और गौतम बुद्ध की धरती से हैं, जहाँ नफ़रत के लिए कोई जगह नहीं है. लेकिन अब चीज़ें बदल रही हैं. भारत में जैसी राजनीति का ज़ोर होता है, उसका सीधा असर नेपाल पर पड़ता है.”
कल्याण कुमार तिम्सिना नेपाल के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक थे. अब वह नेपाल हिन्दू स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय संघचालक हैं.
कुछ सांसदों का आरोप है कि भारत में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद नेपाल में सांप्रदायिक सौहार्द पर नकारात्मक असर पड़ा है, कल्याण कुमार तिम्सिना इस सवाल के जवाब में सवाल करते हैं, "क्या उनका यह कहना है कि नेपाल हिन्दू राष्ट्र था तो सांप्रदायिक सौहार्द अच्छा था? इसीलिए तो हम हिन्दू राष्ट्र बनाने की माँग कर रहे हैं. नरेंद्र मोदी के पहले भी यहाँ हिन्दुत्व की राजनीति थी."
हिन्दुत्व नेपाल
को कहाँ लेकर जाएगा?

हिंदू पहचान की राजनीति करने वाले लोगों को लगता है कि नेपाल में यह जन जागरण का दौर है,जहाँ लोग अपने हिंदू होने को लेकर मुखर हो रहे हैं जो उनके हिसाब से एक अच्छी बात है.
वहीं नेपाल में कई लोग मानते हैं कि नेपाल में हिन्दुत्व की राजनीति का ज़ोर बढ़ा तो नेपाल की संप्रभुता ख़तरे में पड़ेगी.
नेपाल के पूर्व विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली ने साल 2023 बीबीसी से बातचीत में कहा था कि नेपाल में राजशाही समर्थक और हिन्दुत्व की राजनीति करने वाले एक ही हैं.
प्रदीप ज्ञवाली ने तब कहा था, "मुझे लगता है कि नेपाल में हिन्दुत्व की राजनीति मज़बूत हुई तो यह नेपाल की संप्रभुता के लिए ख़तरनाक होगा."
नेपाल के मधेस में सरलाही से निर्दलीय सांसद अमरेश सिंह भी मानते हैं कि नेपाल में हिन्दुत्व का प्रभाव बढ़ेगा तो नेपाल के संप्रभु अस्तित्व को लेकर दुविधा बढ़ेगी.
अमरेश सिंह कहते हैं, "जब दो देशों का राष्ट्रवाद एक हो जाएगा तो संप्रभुता जैसी कोई चीज़ नहीं रह जाएगी."
अमरेश सिंह आरोप लगाते हैं, "मेरा टिकट कटवा दिया गया, मुस्लिम उम्मीदवारों के भी टिकट कटवा दिए जाते हैं. इसी का नतीजा है कि नेपाल में एक भी मुसलमान प्रत्यक्ष रूप से चुनाव लड़कर संसद नहीं पहुँच पाया. जो भी मुस्लिम सांसद हैं, वे समानुपातिक प्रणाली से संसद पहुँचे हैं.”
अमरेश सिंह निर्दलीय सांसद बनने से पहले नेपाली कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतते थे.
एचएसएस के राष्ट्रीय संघचालक कल्याण कुमार तिम्सिना अमरेश सिंह के आरोपों को ख़ारिज करते हैं. कल्याण कुमार कहते हैं, "उनका काम ही आरोप लगाना है तो कोई क्या कर सकता है?"

धार्मिक पहचान का बढ़ता आग्रह

नेपाल में अब धार्मिक पहचान की राजनीति को हवा तेज़ी से मिल रही है. मधेस प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री लालबाबू राउत के नाम से अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि वह मुसलमान हैं.
राउत कहते हैं, "मेरा नाम लालबाबू राउत, मेरी माँ का नाम राधिका, मेरे पिता का नाम दशरथ राउत और भाई का नाम राम राउत है. कुछ लोग राजनीति को कुरूप करने की कोशिश कर रहे हैं. राजनीति में मेरी धार्मिक पहचान अब अनिवार्य होती जा रही है.
नेपाल के मधेस प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे लालबाबू राउत अपनी पत्नी के साथ
नेपाल के मधेस प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे लालबाबू राउत अपनी पत्नी के साथ
पार्टी के लोग मेरे नाम से पहले मोहम्मद जोड़ देते हैं. मैंने अपने बेटे का नाम दाऊद रखा है. अब धार्मिक पहचान के प्रति लोगों का आग्रह बढ़ा है."
नेपाल में लालबाबू राउत और दशरथ राउत की वह पीढ़ी ख़त्म हो रही है, जहाँ नाम धर्म का प्रतीक नहीं होता था.
कई लोग मानते हैं कि नेपाल की राजनीति में धार्मिक ध्रुवीकरण की बहुत संभावना नहीं है क्योंकि यहाँ मुश्किल से पाँच से छह फ़ीसदी मुसलमान हैं, मुसलमानों की कुल आबादी का 97 प्रतिशत हिस्सा मधेस इलाक़े में ही है जो बिहार और यूपी के कुछ हिस्सों से लगा है.
भारत में नेपाल के राजदूत रहे लोकराज बराल कहते हैं कि नेपाल में हिन्दुत्व की राजनीति का मतलब 'धार्मिक ध्रुवीकरण' नहीं है, यह राजनीति नेपाल की संप्रभुता के लिए ही चुनौती बनेगी.
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