रविवार, 25 जनवरी, 2009 को 12:15 GMT तक के समाचार
ख़दीजा आरिफ़
बीबीसी उर्दू, जयपुर
ग़ज़ा में हाल में हुए इसारइली अभियान के बीच जयपुर में जारी साहित्यिक आयोजन के दौरान एक इसराइली संगीतकार और गायक शाएबेन ज़ुर ने अपने सुरों के माध्यम ये संदेश दिया कि हमारे दिलों में नफ़रत के कांटें नहीं बल्कि प्यार के फूल खिलने चाहिए.
शाएबेन ज़ुर जयपुर साहित्यिक आयोजन में ग़ज़ा और मुंबई जैसी घटनाओं के बाद शांति का संदेश फैलाने के मक़सद से एक कन्सर्ट में हिस्सा ले रहे थे.
भारत की संस्कृति और संगीत को समझने और सीखने के लिए शाएबेन पिछले 10 साल से भारत में हैं. बच्पन से संगीत की शिक्षा लेने वाले शाएबेन हिब्रू के साथ-साथ हिंदी और उर्दू भाषा में भी गाते हैं.
उनके हिब्रू गाने का संदेश था, "जिस तरह संगीत भाषा की बंदिशों से दूर लोगों के दिलों में प्यार भरती है उसी तरह से हमें भी सभी लोगों के दिलों में प्यार भरना चाहिए."
शाएबेन का कहना था कि वे कहीं भी रहें, लेकिन उन्हें अपने देश से प्यार है, वहाँ की संस्कृति और सभ्यता से लगाव है. उनके अनुसार इसराइली संस्कृति एक साझा संस्कृति है.
भारतीय संगीत में दिलचस्पी
उनका कहना था," मुझे भारतीय संगीत में काफ़ी दिलचस्पी है और संगीत के माध्यम से मैंने यहाँ के लोगों और संस्कृति के बारे में बहुत नज़दीक से जाना है."
ग़ज़ा की स्थिति पर जब उनसे सवाल किया गया था तो उनका कहना था, "ग़ज़ा में जो कुछ हुआ है वो छोटी सी ज़मीन के टुकड़े लिए हो रहा है, मुझे पूरे क्षेत्र से लगाव है, लेकिन जो हो रहा है वो ग़लत है. ग़जा में जो लोग मर रहे हैं वो भी मेरे अपने हैं, लेकिन मेरा कहना है कि मैं संगीतकार और गायक हूँ. सिर्फ़ शांति का संदेश देता हूँ, स्थिति नहीं बदल सकता."
उनके अनुसार दोनों पक्ष टकराव पर ध्यान देते हैं हल पर नहीं. उनका कहना है, "मेरे लिए हल आसान है, इस्लाम और यहूदी बहुत अलग नहीं हैं और हमें एक दूसरे के साथ मिल कर रहना चाहिए."
हल निकल सकता है
शाएबेन का कहना है कि अगर फ़लस्तीनी और इसराइली एक दूसरे की संस्कृति, विचार और धर्मों का ख्याल रखें तो मामले का हल निकल सकता है.
शाएबेन ने कहा कि हम ऐसी स्थिति में रह रहें है जब चरमपंथी कार्रवाईयों ने हमारी ज़िंदगी को ख़तरे में डाल रखा है. इसलिए हम आपस में मिलकर शांति की पहल कर सकते हैं, डर की ज़िंदगी को समाप्त कर सकते हैं और अंधरे में उजाला भरा जा सकता है.
वो कहते हैं कि किसी भी समस्या का हल इस बात पर निर्भर करता है कि हम किसी दूसरे के धर्म, संसकृति और विचार को किस तरह से लेते हैं.
शाएबेन की कल्पना है कि चाहे फ़लस्तीनी इलाक़े की समस्या हो, भारत-पाक का मामला हो या फिर हिंदू-मुस्लिम मतभेद.. सब का हल आपसी बातचीत और एक दूसरे के विरोधाभास को स्वीकार करके निकाला जा सकता है.