गुरुवार, 15 जनवरी, 2009 को 10:16 GMT तक के समाचार
भारतीय फ़िल्म जगत के सबसे बड़े पुरस्कार दादा साहेब फ़ाल्के से सम्मानित तपन सिन्हा का गुरुवार को कोलकाता में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया.
कोलकाता के कलकत्ता मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीएमआरआई) के प्रवक्ता के मुताबिक 84 साल के तपन सिन्हा निमोनिया से पीड़ित थे.
उन्हें पिछले साल छह दिसंबर को सीएमआरआई में भर्ती कराया गया था.
उनकी अभिनेत्री पत्नी अरुंधति देवी का 1990 में निधन हो गया था. उनके परिवार में एक बेटा है.
पहली फ़िल्म
तपन सिन्हा की पहली फ़िल्म 'अंकुश' 1954 में रिलीज़ हुई थी. 'काबुलीवाला', 'क्षुधित पाषाण', 'सफेद हाथी', 'एक डॉक्टर की मौत', 'निर्जन साकते', 'हाटे बाज़ारे', 'आदमी और औरत' उनकी प्रमुख फ़िल्में थीं.
अपने फ़िल्मी करियर में उन्होंने 41 फ़िल्में बनाईं. इनमें से 19 फ़िल्मों को विभिन्न श्रेणियों में राष्ट्रीय पुरस्कार मिला.
उनकी फ़िल्में लंदन, वेनिस, मास्को और बर्लिन में आयोजित होने अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में भी दिखाई और पुरस्कृत की गईं.
उनकी अधिकतर फ़िल्मों का विषय बंगाल का मध्य वर्ग और उसका संघर्ष हुआ करता था.
कलकत्ता विश्वविद्यालय से भौतिक विज्ञान में एमएससी की डिग्री लेने वाले तपन सिन्हा ने 1946 में न्यू थिएटर स्टूडियो में सहायक साउंड रिकॉर्डिस्ट के रूप में अपना करियर शुरू किया था.
दो साल बाद उन्होंन न्यू थिएटर स्टूडियो छोड़कर कलकत्ता मूवीटोन स्टूडियो में काम करना शुरू कर दिया. उन्होंने 1950 में लंदन के पाइनवुड स्टूडियो में भी काम किया.
लंदन से लौटने के बाद उन्होंने 1954 में 'अंकुश' बनाई. इस फ़िल्म का मुख्य पात्र एक ज़मींदार का हाथी था. लेकिन यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर सफल नहीं हुई.
कवि और लेखक रबींद्रनाथ टैगोर की एक कहानी ‘काबुलीवाला’ पर तपन सिन्हा ने 1957 में इसी नाम से एक फ़िल्म बनाई. यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर काफ़ी सफल हुई.
'काबुलीवाला' के लिए तपन सिन्हा को राष्ट्रपति के स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया था.