बुधवार, 23 अप्रैल, 2008 को 13:16 GMT तक के समाचार
"अगर आपने सत्यजीत रे की फ़िल्में नहीं देखीं तो इसका मतलब है आप धरती पर सूरज या चाँद देखे बगैर ही जी रहे हैं."
जापान के मशहूर फ़िल्मकार अकीरा कुरासावा के ये शब्द शायद सत्यजीत रे की सिनेमा के बारे में सब कुछ बयां कर देते हैं.
सत्यजीत रे वो नाम है जिसने हमेशा-हमेशा के लिए भारतीय सिनेमा का रुख़ ही बदल दिया.
उनकी 16वीं पुण्यतिथि पर सिनेप्रेमी उन्हें याद कर रहे हैं. 23 अप्रैल 1992 को सत्यजीत रे का निधन हो गया था.
सत्यजीत रे ने अपनी फ़िल्में बांग्ला में बनाई लेकिन उनकी प्रासंगिकता सार्वभौमिक मानी जाती है.
उम्दा फ़िल्मकार
फ़िल्मों में चरित्रों को जिस मानवीय अंदाज़ में सत्यजीत रे दर्शाते हैं, उसने बड़े-बड़े फ़िल्मकारों को भी उनका मुरीद बना दिया है.
उनकी गिनती विश्व के उम्दा फ़िल्मकारों में की जाती है.
राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके फ़िल्म निर्देशक जाहनू बरुआ कहते हैं, “विश्व सिनेमा की तर्ज पर फ़िल्में बनाने वाले सत्यजीत रे पहले भारतीय फ़िल्मकार हैं. भारतीय सिनेमा के आधुनिक पक्ष को बाहर लाने में उनका बड़ा योगदान रहा है.”
पथेर पांचाली, अपूर संसार और अपराजितो में उन्होंने ग्रामीण भारत की तस्वीर खींची, तो चारुलाता में अकेलेपन से जूझती एक महिला का सचिव चित्रण किया.
1956 के कान फ़िल्म समारोह में पथेर पांचाली को ‘दि बेस्ट ह्यूमन डॉक्युमेंट’ के पुरस्कार से नवाज़ा गया था.
भिन्न-भिन्न विषयों को सत्यजीत रे बड़ी दक्षता से अपनी फ़िल्मों में दर्शाया है.
1955 से 1991 तक सत्यजीत रे करीब 37 फ़िल्में बनाईं जिसमें फ़ीचर फ़िल्म, लघु फ़िल्में और वृत्तचित्र शामिल रहे. उन्हें 1992 में विशेष ऑस्कर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.