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रविवार, 30 मार्च, 2008 को 13:51 GMT तक के समाचार

मिर्ज़ा एबी बेग
बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए, दिल्ली से

गीत गुमसुम है ग़ज़ल चुप है.....

दुनिया भर में उर्दू की शायराना परंपरा के लिए मश्हूर शंकर-शाद मुशायरे में हिंदी के प्रसिद्ध कवि गोपालदास नीरज ने जब ये शेर पढ़ा...

मेरा मक़सद है कि महफ़िल रहे रौशन यूं ही
ख़ून चाहे मेरा दीपों में जलाया जाए

तो उससे जहां मुशायरे का तेवर तय हुआ वहीं उस वक़्त उर्दू मुशायरे में एक और नया पहलू भी जुड़ गया जब उन्होंने यह शेर पढ़ा...

गीत गुमसुम है, ग़ज़ल चुप है, रुबाई है दुखी
ऐसे माहौल में नीरज को बुलाया जाए

शंकर-शाद मुशायरा विश्व भर में उर्दू का सबसे बड़ा और सबसे लोकप्रिय मुशायरा रहा है और भारत की आज़ादी के बाद से दिल्ली की सांस्कृतिक पहचान रहा है. डीसीएम का यह मुशायरा दो हिंदू शायरों सर शंकरलाल शंकर और लाला मुरलीधर शाद की याद में आयोजित किया जाता है जो उर्दू के सेकूलर चरित्र को पेश करता है.

यह 45वां मुशायरा कई ऐतबार से यादगार कहा जाएगा, इस में जहां भारत के नामवर उर्दू शायरों ने शिरकत की वहीं पाकिस्तान के बड़े नाम अहमद फ़राज़ और ज़हरा निगाह भी मौजूद थीं.

मुशायरे की परंपरा

मुशायरे का आरंभ परंपरागत तौर पर दीप जलाकर किया गया और यह शमा पाकिस्तान की सुप्रसिद्ध शायरा ज़हरा निगाह ने रौशन की. साथ में फ़िल्मी जगत की मानी जानी हस्ती शबाना आज़मी भी थीं. मुशायरे की अध्यक्षता दिल्ली के सब से बुज़ुर्ग शायर बेकल उत्साही ने की जो हमेशा ही इस मुशायरे की शान रहे हैं.

मुशायरे के शुरू में परंपरागत तौर पर शंकर और शाद की ग़ज़लों की कुछ पंक्तियां भी सुनाई गईं. दोनों के एक एक शेर नमूने के तौर पर इस तरह हैं.

दुनिया-ए-मुहब्बत में शंकर हम आस लगाए बैठे हैं
इस दर्द भरे दिल का शायद पैदा कोई दरमाँ हो जाए

और

दुनिया सिमट के आ गई मय्यत पे शाद की
बस एक वो हैं जिनको अब तक ख़बर नहीं

शाद और शंकर के बारे में उर्दू में कहा जाता है कि वो एक शेर के दो मिसरों की तरह हैं जहां दोनों मिसरे पढ़े जाते हैं वहीं शेर पूरा हो जाता है.

साझा संस्कृति

आज की दौड़ती भागती ज़िंदगी में जब सारे मूल्यों को हमारी अर्थ-व्यवस्था तय करती है और जहां हम अपने जिस्म के लिए सारी कोशिश में लगे हैं वहीं हम अपनी रूह यानी आत्मा को कैसे नकार सकते हैं. शायरी वास्तव में हमारी आत्मा की ग़ज़ा है और यह ज़रूरत पूरी होती है ऐसे मुशायरों से.

भारत की साझा संस्कृति और मूल्यों की अभिव्यक्ति इस प्रकार के मुशायरों में उभर कर सामने आती है और हम अपने अतित के धरोहर की क़ीमत पहचानते हैं. मलिकज़ादा जावेद ने जब ये पंक्तियां पढ़ीं तो लोगों ने ख़ूब दाद दी.

ज़रा सा नर्म हो लह्जा ज़रा सा अपनापन
शरीफ़ लोग मुरव्वत में डूब जाते हैं

और

उठाओ कैमरा तस्वीर खींच लो इनकी
उदास लोग कहां रोज़ मुस्कुराते हैं

मूल्यों की शायरी

उर्दू शायरी में घटते बढ़ते मूल्यों का हर घड़ी मूल्यांकन तो होता ही रहता इसकी एक ख़ूबी यह भी है यह वास्तविकता का आईना बन जाती है और इस के ज़रिए हर उस चीज़ पर चोट की जाती है जो समाज और इंसानियत के ख़िलाफ़ हो.

मुशायरों की जान वसीम बरेलवी के यह शेर कुछ इसी जानिब इशारा करते हैं.

चैन से बैठे हैं आपस में लड़ाने वाले
आंगनों से गए दीवार उठाने वाले

या

मुझको गुनाहगार कहे और सज़ा न दे
इतना भी इख़्तियार किसी को ख़ुदा ने दे

या

लिहाज़ आँख का, रिश्तों का डर नहीं रहता
जब एक शख़्स के हाथों में घर नहीं रहाता

इक ऐसा मोड़ इसी ज़िंदगी में आना है
कि जिसके बाद कोई हमसफ़र नहीं रहता

पसंदीदा शेर

शनिवार को दिल्ली में आयोजित मुशायरे में पढ़े गए कुछ पसंदीदा शेर आप भी देखते चलिए

हादसों की ज़द में हैं तो मुस्कुराना छोड़ दें
ज़लज़लों के ख़ौफ़ से क्या घर बनाना छोड़ दें

तुमने मेरे घर न आने की क़सम खाई तो है
आंसुओं से भी कहो आँखों में आना छोड़ दें

प्यार के दुश्मन कभी तू प्यार से कह के तो देख
एक तेरा दर ही क्या हम तो ज़माना छोड़ दें

दूरी हुई तो उन से क़रीब और हम हुए
ये कैसे फ़ासले थे जो बढ़ने से कम हुए (वसीम बरेलवी)

ख़्वाब का रिश्ता हक़ीक़त से न जोड़ा जाए
आईना है इसे पत्थर से न तोड़ा जाए

अब भी भर सकते हैं मैख़ाने के सब जामो-सुबू
मेरा भीगा हुआ दामन जो निचोड़ा जाए (मलिकज़ाद मनज़ूर)

मौत आई हमें ख़बर न हुई
ऐसी ग़फ़्लत तो उम्र भर न हुई

ज़िंदगी बाप की मानिंद सज़ा देती है
मौत मां की तरह मुझको बचाने आई (नीरज)

जुनूँ के नग़्मे वफ़ाओं के गीत गाते हुए
हमारी उम्र कटी ज़ख़्मे-दिल छुपाते हुए

कोई है जो हमें दो-चार पल को अपना ले
ज़बान सूख गई ये सदा लगाते हुए

मुझको तआक़ुब में ले आई एक अंजान जगह
ख़ुश्बू तो ख़ुश्बू थी मेरे हाथ नहीं आई (शहरयार)

ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना हामी भर लेना
बहुत हैं फ़ायदे इसमें मगर अच्छा नहीं लगता

मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है
किसी का भी हो सर, क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता (जावेद अख़्तर)