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शनिवार, 22 दिसंबर, 2007 को 17:25 GMT तक के समाचार

शिवकांत
रेडियो संपादक, बीबीसी हिंदी, लंदन

हिंदी कविता की रंग-बिरंगी दावत-1

क्रिसमस की इस शाम
लिए कुछ कविताओं के जाम
आप सबको क्रिसमस या बड़े दिन की शुभकामनाएँ.

क्रिसमस का दिन हिंदी के साहित्य प्रेमियों के लिए बड़ा दिन होने का एक और विशेष कारण भी है, वो यह कि आज ही के दिन हिंदी के एक बड़े और दुलारे कवि डॉ धर्मवीर भारती का जन्म हुआ था.

इसलिए क्रिसमस की हर शाम इलाहाबाद में उनके घर पर कवि-गोष्ठी जमती थी और जिसमें भारती जी अपनी नई-नई कविताएँ सुनाया करते थे. लगभग सत्रह साल पहले ऐसी ही एक शाम राजनारायण बिसारिया जी को भारती जी की कविताओं का रसास्वाद करने का अवसर मिला था, लेकिन इलाहाबाद में नहीं बल्कि मुंबई में क्यों उन दिनों भारती जी मुंबई में रह रहे थे. सबसे पहले पेश है उसी शाम सुनाई गई एक कविता जो डॉ धर्मवीर भारती के प्रसिद्ध कविता संग्रह - ठंडा लोहा की अंतिम कविता है...

ये फूल, मोमबत्तियाँ और टूटे सपने
ये फूल, मोमबत्तियाँ और टूटे सपने
यह पागल क्षण, यह कामकाज, दफ़्तर और फ़ाइल
उचटा सा जी, भद्दा सा वेतन,
ये सब सच है.

इनमें से रत्तीभर ना किसी से कोई ग़म
अंधी गलियों में पथभ्रष्टों के ग़लत क़दम
यह चंदा की छाया में भर-भर आने वाली आँखें नम
बच्चों की सी दूधिया हँसी,
या मन की लहरों पर इतराते हुए कफ़न
ये सब सच हैं.

जीवन है कुछ इतना विराट, इतना व्यापक
उसमें है सबके लिए जगह, सबका महत्त
ओ मेज़ों की कोरों पर माथा रख-रखकर रोने वालों
यह दर्द तुम्हारा नहीं सिर्फ़,
यह सबका है, सबने पाया है प्यार
सभी ने खोया है, सबका जीवन है भार
और सब ढोते हैं,
बेचैन ना हो ये दर्द अभी कुछ गहरे और उतरता है
फिर एक ज्योति मिल जाती है
जिसके मंजुल प्रकाश में सबके अर्थ नए खुलने लगते
ये सभी तार बन जाते हैं
कोई अंजान गलियाँ इन पर तैर-तैर
सबमें संगीत जगा देती हैं अपने-अपने
गुथ जाते हैं ये सभी एक मीठी लय में
यह कामकाज संघर्ष विरस कड़वी बातें
ये फूल मोमबत्तियाँ और टूटे सपने...

यह कविता ख़ुद डॉक्टर धर्मवीर भारती के स्वर में

यह दर्द विराट ज़िंदगी में होगा परिणत
है तुम्हें निराशा फिर तुम पाओगे ताक़त
उन अंगुलियों के आगे कर दो माथा नत
जिनके छू लेने भर से फूल सितारे बन जाते हैं ये मन के छाले
ओ मेज़ों की कोरों पर माता रख-रखकर रोने वालो
हर एक दर्द को नए अर्थ तक जाने दो...
ये फूल, मोमबत्तियाँ और टूटे सपने...

त्रिलोचन

मुझको शायर न कहो मीर कि साहिब मैंने
दर्द-ओ-ग़म कितने किए जमा तो दीवान किया.

इस वर्ष यानी 2007 ने हिंदी साहित्य को कई दर्द दिए लेकिन त्रिलोचन जी का चले जाना एक ऐसा असहनीय दर्द था जो दीवान या काव्यसंग्रहों की रचना की बजाय अभाव को जन्म देगा. ओंकारनाथ श्रीवास्तव जी उन्हें हिंदी का अलबेला कवि कहते थे जो त्रिलोचन के विलक्षण व्यक्तित्व की संभवतः सबसे संक्षिप्त और सटीक व्याख्या थी.

त्रिलोचन जी से एक लंबी बातचीत का अवसर आज से लगभग अट्ठारह साल पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के परिसर में मिला था. उसी बातचीत के दौरान उन्होंने अपनी कुछ कविताएँ और सॉनेट सुनाए थे जो त्रिलोचन जी की विशेषता रहे हैं. शेक्सपीयर के इस प्रिय छंद को उन्होंने कुछ इस तरह अपना बनाया था कि बस सुनते ही बनता था...

तुम मुझसे दूर जो हो कहीं हो, सोच रहा हूँ
और सोचना ही ये जीवन है इस पल का
अब जो कुछ है वो कल के प्याले से छलका गतप्रायः है
किसी लहर में मौन बहा हूँ अपना बस क्या
जीवन है दुनिया का सपना
जब तक आँखों में है तब तक ज्योत बना है
अलग हुआ तो आँसू है या तिमिर घना है
बने ठीकरा तो भी है मिट्टी को तपना
कल छू दी जो धूल आज वो फूल हो गई
चमत्कार जिन हाथों में चुपचाप बसा है ऐसा हो ही जाता है
यह सत्य कसा है सोना जिस पर जमे मैल की पर्त खो गई
पथ का वो रजगण हूँ जिस पर छाप पगों की यहाँ-वहाँ है
मूक कहानी सात डगों की...

यह रचना स्वयं त्रिलोचन जी की आवाज़ में

भस्मावृत लूकी सा मैं इस अंधकार में पड़ा हुआ हूँ
अपनी चेतनता की ज्वाला में परिसीमित
उठकर ऊपर अंधकार से भरे हुए इस आसमान में
मैं निहारता लूक टूटते
जैसे अंधकार के गढ़ पर ये प्रकाश के तीर टूटते
देख-देखकर मुझे इस ज्योत की, जीवन की
अनिवार्य विजय का दृढ़ विश्वास प्राप्त होता है
इतने-इतने बलिदानों की अकृत कार्यता सदा ना संभव
अंधकार में जिन लोगों ने जीवन का उतसर्ग किया है
कर एकत्र परम निष्ठा से अपना पूर्ण प्रकाश दिया है
अंधकार के क्षुद्र ग्रास से जो झलके, वे सब महान हैं
अपनी मनःशक्ति तत्परता की दुनिया को अमरदान हैं
अंधकार में देख रहा हूँ जीवन की बनती रेखाएँ
आईं बाधाएँ सब आईं
पर ना मिटेंगी किसी काल में ये बनने वाली रेखाएँ.

बेकल उत्साही

व्यक्तिगत बाधाओं पर तो पार पाई जा सकती है लेकिन जिस तरह की बाधाएँ जलवायु परिवर्तन खड़ी करने वाला है, उनकी वजह से तो जीवन क्या, समूची मानवता की ही रेखाएँ मिट सकती हैं. वैज्ञानिक भले ही इस भयावह संभावना की चेतावनी अब देने लगे हों लेकिन कवियों ने तो दशकों पहले सचेत करना शुरू कर दिया था. आइए आपको लगभग 38 साल पीछे ले चलें. यह ग़ालिब की सौवीं पुण्यतिथि का साल था. इसी उपलक्ष्य में लंदन में रजनी कौल और महेंद्र कौल के घर पर एक यादगार मुशायरे का आयोजन हुआ था जहाँ दिलीप कुमार, सायरा बानो, वहीदा रहमान, सुनील दत्त और नरगिस दत्त जैसे सितारों की महफ़िल में उर्दू के महान शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने अपनी रचनाएँ सुनाईं थीं. लेकिन इस महफ़िल का दिल जीत ले गए थे बेकल उत्साही, अपनी सुरीली आवाज़ में गाए उर्दू के साथ-साथ पूरबी और हिंदी के गीतों से. मुशायरे के बाद आले हसन ने बेकल उत्साही से एक लंबी बातचीत की थी. आइए सुनें उसी बातचीत में सुनाया गया उनका यह गीत जो आज के पर्यावरण पर भी उतना ही सटीक है...

नदियाँ प्यासी, खेत उपासे, उजड़े हैं खलिहान,
मैं कैसे गीत सुनाऊँ.

यह गीत ख़ुद बेकल उत्साही की आवाज़ में

रोटी खा गई भूखी धरती, सूरज पी गया पानी
चाँद ने छीन लिया पैराहन, नंगी हुई जवानी
धर्म-कर्म अंजान, मैं कैसे गीत सुनाऊँ.
आँसू चाट गए सब काजल, सूख गईं मुस्कानें
चौराहे पर रूप लुट गए, इस्मत बनी दुकानें
कुफ्र बना ईमान, मैं कैसे गीत सुनाऊँ.

निगल गईं छापा पेड़ों की, ज़ालिम लू की फौजें
कुटियाओं के हर तिनके पर, बह गईं रेत की मौजें
सन्नाटा मेहमान, मैं कैसे गीत गाऊँ.

हैरत से देखता है समंदर मेरी तरफ़
कश्ती में कोई बात है या बादबाँ में है.
लहर-लहर शमशान मैं कैसे गीत सुनाऊँ...

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