शनिवार, 22 दिसंबर, 2007 को 17:13 GMT तक के समाचार
शिवकांत
रेडियो संपादक, बीबीसी हिंदी, लंदन
बेकल उत्साही के गीतात्मक प्रश्न के उत्तर के लिए आइए आपको लंदन के इस मुशायरे से तीन साल बाद की इलाहाबाद की एक शाम में ले चलें. 1972 की बात है. अपनी भारत यात्रा के दौरान ओंकार जी को महाकवि सुमित्रानंदन पंत जी का काव्यपाठ सुनने का दुर्लभ अवसर मिला था. वहाँ पंत जी ने अपनी प्रसिद्ध कविता बरसो ज्योतिर्मय जीवन सुनाई थी...
बच्चन की मधुशाला
बरसो संसृति के सावन. कोमल भावनाओं के कोमल कवि सुमित्रानंदन पंत को इस वर्ष उनकी तीसवीं पुण्यतिथि पर याद किया गया. लेकिन इस वर्ष की सबसे बड़ी साहित्यिक वर्षगाँठ थी डॉ हरिवंश राय बच्चन की जन्मशती. बच्चन जी ने कविता को छायावाद के रूमानी आसमान से उतार कर जनमानस से जोड़ा. कविसम्मेलनों में गायन की परंपरा भी बच्चन जी की ही देन है. वे अपने गीतों का सस्वर पाठ किया करते थे. बीबीसी हिंदी सेवा से बच्चन जी का विशेष लगाव था और सत्रह साल पहले अपनी लंदन यात्रा के दौरान उन्होंने हिंदी सेवा को अपनी अमर रचना मधुशाला का रसास्वादन कराया...
दिनकर का बुलंद स्वर
कविसम्मेलनों में गायन की परंपरा का श्रेय अगर बच्चन जी को जाता है तो ओजस्वी गायन का श्रेय राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर को देना होगा. नया वर्ष दिनकर जी की जन्मशती का वर्ष है. रामवृक्ष वेणीपुरी ने दिनकर के बारे में लिखा था – एक अंगारा जिस पर इंद्रधनुष खेल रहे हैं. यह रूपक दिनकर जी के लिए कितना सटीक था, इसका अंदाज़ा आज से लगभग 33 साल पहले लंदन के एक कवि संमेलन में उनके स्वर में उनकी प्रसिद्ध कविता नीलकुसुम सुनकर सहज ही हो जाता है...
अज्ञेय
दिनकर के ठीक उलट अंदाज़ था अज्ञेय जी का जिन्हें प्रगतिशील और नई कविता का आधारस्तंभ माना जाता है. वे जितना नाप-तोल कर शब्दों का प्रयोग करते थे उतना ही नाप-तोल कर संयम के साथ बोलते थे. इस वर्ष पहले उन्हें उनकी बीसवीं पुण्यतिथि पर याद किया गया. लगभग सोलह वर्ष अज्ञेय जी की एक लंदन यात्रा के दौरान बीबीसी ने उनके सम्मान में एक कवि गोष्ठी का आयोजन किया था. आइए सुनें उसी से दो कविताएँ, परती का गीत और जो पुल बनाएँगे...
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
अज्ञेय जी की इन दो कविताओं के बाद आइए आपको लंदन की उस 38 साल पुरानी यादगार शाम में ले चलें जिस में फ़ैज़ साहब ने अपनी मशहूर नज़्म शाम पेश की थी. इसकी ख़ासियत यह है कि इसकी शब्दावली और रूपक बिल्कुल किसी हिंदी की किसी कविता का सा है.
फ़ैज़ की इस शाम की अनूठी कल्पना के बाद पता नहीं क्यों मुझे जयशंकर प्रसाद का अमर गीत बीती विभावरी याद आ रहा है जो मेरा प्रिय गीत रहा है और ममता जी की आवाज़ मेरी प्रिय आवाज़. तो लीजिए क्रिसमस की इस शाम, आप इस अमर रचना का आनंद लीजिए और मुझे शिवकांत को अनुमति दीजिए. आप सब को नव वर्ष की मंगलकामनाएँ.
यह कविता दावत आपको कैसी लगी, हमें ज़रूर लिखिएगा. आप हमें ईमेल से संपर्क कर सकते हैं - hindi.letter@bbc.co.uk