शुक्रवार, 07 दिसंबर, 2007 को 16:09 GMT तक के समाचार
रामकिशोर पारचा
फ़िल्म समीक्षक, नान्तेस, फ़्रांस से लौट कर
फ्रांस के नान्तेस शहर में आयोजित होने वाला एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फ़िल्म समारोह हमारे गोवा के भ्रम फैलाने वाले फ़िल्म समारोहों से काफ़ी अलग है.
नान्तेस को लेकर फ्रांस के मशहूर लेखक जुले वेर्ने ने पेरिस और नान्तेस को फ्रांस का दूसरा सबसे बड़ा केन्द्र बनने का जो सपना देखा था वह सच हो गया है और फ्रांस का नान्तेस शहर अब उसकी अर्थ व्यवस्था का ही नही बल्कि उसकी सांस्कृतिक गति विधियों का भी एक बड़ा केन्द्र है.
कांस के बाद दुनिया के सबसे अधिक सम्मानित फिल्मकार और कलाकार यहीं जुटते हैं.
यह चौंकाने वाली बात हो सकती है कि जहाँ इस बार इस फ़िल्म समारोह में पाकिस्तान की फिल्मों का फोकस के दौरान भारत से केवल दो फिल्में ही वहाँ पहुँच सकी जबकि पिछले साल वहाँ सत्यजीत रे की फिल्मों का विशेष पुनरावलोकन किया गया था और उनकी करीब पंद्रह फिल्मों के अलावा भारत की पचीस फिल्में शामिल थीं.
भारतीय फ़िल्में
इस बार भी जो दो फिल्में समारोह में शामिल की गई उनमे एक मुरली नायर की उन्नी और दादा साहेब फाल्के से सम्मानित फिल्मकार अदूर गोपाल कृष्णन की प्रतियोगिता वर्ग में फोर वूमेन शामिल हो पाईं.
जबकि अदूर के अलावा सत्यजीत रे, गौतम घोष और मृणाल सेन जैसे फिल्मकार ऐसे नाम हैं जो यूरोप में फ्रांस के अलावा इटली और स्पेन में भी काफ़ी लोकप्रिय हैं.
यह बहस का मुद्दा हो सकता है कि हमारे यहाँ होने वाले फ़िल्म समारोहों की प्रासंगिकता अब कितनी है और उनके होने से हमारे सिनेमा को अंतर्राष्ट्रीय होने में कितनी मदद मिलती है.
पर हर साल फ्रांस के नान्तेस शहर में होने वाला कांस के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा फ़िल्म मेला इस बात का गवाह जरूर है कि जहाँ न केवल दुनिया के बल्कि भारत के साथ अब पाकिस्तान के भी नए सिनेमा के चेहरे को देखने का मौका मिलता है .
गोवा में पाकिस्तान की जिस फ़िल्म खुदा के लिए की चर्चा होती रही वही नान्तेस में भी प्रतियोगिता वर्ग में चर्चा में रही लेकिन इसके अलावा भी वहाँ 45 देशों की जो फिल्में शामिल हुईं वे भी सिनेमा के नए प्रयोगों और विस्तार को दिखाने वाली हैं.
इस पर भी बहस होनी चाहिए की हम गोवा जैसे बड़े फ़िल्म समारोह का भी कोई स्थायी चेहरा अभी तक क्यों तय नही कर पाएं हैं जबकि नान्तेस जैसे समारोह अब अपने तीसरे दशक के दौर मैं है और जब पहली बार नान्तेस में रह रहे और खासतौर से एशियायी सिनेमा के दीवाने दो भाइयों एलेन और फिलिप जलादु ने इस समारोह कि शुरुआत की तो 1979 में अश्वेत अमेरिकी फिल्मकारों की ही करीब आधा दर्जन फिल्में ही वहाँ दिखाई गई थी और एशिया की फिल्मों को तो वहां नामों निशान भी नही था.
भारतीय फिल्मों के लिए भी नवें समारोह के बाद पिछ्ले साल के समारोह में ही सत्यजीत रे पर कोई पुनरावलोकन हो सका.
पाकिस्तान की फ़िल्में
पाकिस्तान के सिनेमा को दुनिया भर में ले जाने वाले उनके प्रतिनिधि मंडल के मुखिया, अभिनेता और वहां के मशहूर मूर्तिकार जमाल शाह कहते हैं, 'हम रोमांचित हैं कि भारत के साथ अब पाक सिनेमा को भी लोग सराह रहे हैं. लेकिन अभी तक हमारे यहाँ सिनेमा को लेकर कोई बड़ा बाजार नही बन पाया है.'
पर नान्तेस का यह समारोह अब इस बाजार का भी बड़ा केन्द्र है जिसमें दिखाई गई अदूर कि फ़िल्म फोर वूमेन पोलेंड में और पाकिस्तान की फ़िल्म खुदा के लिए भारत में रिलीज की जा रही हैं.
जहाँ फिल्मकार और दुनिया भर में फ़िल्म मेलों के लिए फिल्में तलाशने वाले लोग इक्कठे होते हैं और गंभीर फिल्मकारों के लिए तो नान्तेस फ़िल्म समारोह सबसे महत्वपूर्ण जगह है.
समारोह में अपनी फ़िल्म जूनून के लिए सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म निर्देशक का पुरस्कार जीतने वाले और पिछले साल भारत होकर गए ट्यूनीशिया के जीबी फादेह कहते हैं, ' दरअसल व्यवसायिक सिनेमा के अधिकतर लोग अपने दर्शकों को भूलकर फिल्में बनाते हैं और यही कारण है महत्वपूर्ण समारोह भी अब फ़िल्म समारोह की जगह कम मौज मस्ती की जगह ज्यादा लगते हैं. '
दरअसल 1979 की बाद से लगातार हो रहे इस समारोह की खासियत ही यह है की यह बिना नागा चल रहा है.
वरना अब देश विदेश में होने वाले कई महत्वपूर्ण समारोह अब दम तोड़ चुके हैं और यह समारोह हमें अपने देश के ही नही बल्कि अंग्रेजी, यूरोप और पश्चिम देशों में छाए रहने वाले व्यवसायिक होलीवुड सिनेमा के मुकाबले भी वहां पहुँचने वालों को ऐसे दुनिया और रहस्यों से भी परिचित करवाता है जिन्हें सिनेमा के जरिये अभी तक पर्दे पर नही उतरा गया है.
यह एक ऐसा सिनेमा है जो हमारे उस सिनेमा से अलग है जिसे साठ और सत्तर के दशक में विकसित किया गया था लेकिन वह अब दुनिया भर में एक नई सूरत अख्तियार कर चुका है.
जहाँ तक इस समारोह में पुरस्कृत की जाने वाली फिल्मों की बात है तो समारोह में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म चुनी गई चीन के निर्देशक शाओ लियांग की फ़िल्म क्राइम ऐंड पनिशमेंट.
सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म
एक ऐसी फ़िल्म है जो चीन और कोरिया की सीमा पर रहने वाले लोगों की रोजमर्रा की जिन्दगी के विरोध्भासों और झंझावातों को दिखाने वाली है जिसमें पुलिस थाने में काम करने वाला एक युवक ख़ुद को अनफिट पाता है और बदलाव के बीच अपनी पहचान के लिए जूझ रहा है.
कोरिया की फ़िल्म बियोंड द इयर्स के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीतने वाली अभिनेत्री ज़ंग हाय की फ़िल्म की कहानी भी कुछ ऐसी ही है जिसमें एक भाई की बहिन की चाहतों के लिए कुलबुलाने वाले संसार की व्यथा है.
पर इस फ़िल्म समारोह को हम केवल नए सिनेमा का चेहरा दिखाने वाला समारोह ही नही कह सकते बल्कि ऐसे समारोह अब दुनिया भर में बदल रही सिनेमाई परिभाषा में नई प्रयोगात्मकता और कव्यताम्कता भी जोड़ रहे हैं.