गुरुवार, 06 दिसंबर, 2007 को 13:35 GMT तक के समाचार
ओम गुप्ता
दिल्ली से
जानी मानी साहित्यकार अनीता देसाई कहती हैं कि बुकर विजेता उनकी बेटी किरण, संस्कार, सोच और मूल्यों में उनके समान हैं पर दोनों का साहित्य बिल्कुल अलग है.
अनीता देसाई को पिछले हफ्ते साहित्य अकादमी ने अपना फ़ैलो बनाया है. इस अवसर पर उनसे एक लंबी बातचीत हुई.
पेश है हर सवाल को तल्लीनता से सुनकर फिर चेहरे पर मुस्कान के साथ जवाब देने वाली अनीता देसाई के साथ बातचीत के कुछ अंश..
अनीता जी, जीवन के आठवें दशक में साहित्य अकादमी का फैलो बनना आपके लिए क्या मायने रखता है?
देखिये, साहित्य अकादमी से मेरा लंबा रिश्ता रहा है. अकादमी ने 1992 में मुझे अंग्रेज़ी साहित्य के लिए सलाहकार बनाया था. 1978 में अकादमी ने 'फ़ायर ऑन द माउंटेन' पर पुरस्कृत किया था. अब मैं फ़ेलो बन कर फिर लौटी हूँ.
अकादमी से इस रिश्ते को और आगे ले जाना चाहेंगी, मसलन सैक्रेटरी या चेयरमैन वगैरह?
(ठहाका लगाकर हंसते हुए) नहीं बिल्कुल नहीं, मैं अकादमी की नौकरशाही का हिस्सा नहीं बनना चाहूँगी.
अकादमी की भूमिका को लेकर अक्सर बात होती है, क्या इसका काम लेखन को प्रोत्साहन देना है या फिर अच्छे लेखन को पुरस्कृत करना?
मेरे विचार से भारतीय भाषाओं के लेखन को अनुवाद के ज़रिए सभी भाषाओं के पाठकों तक पहुंचाना अनुवाद का बड़ा काम है.
आपके पुरस्कृत उपन्यास का हिन्दी और उ़र्दू में अनुवाद किया गया है, क्या आपने वो अनुवाद देखे हैं?
नहीं, अनुवाद एक चुनौती है और मैं उसमें उलझना नहीं चाहती थी.
यही तो दिक्कत है, कहते हैं अच्छा अनुवाद मूल के साथ न्याय नहीं करता और न्यायपूर्ण अनुवाद पठनीय नहीं होता. इसलिए अक्सर लोग अनुवाद पढ़ते ही नहीं. तब इस मेहनत का क्या मतलब है?
इस चुनौती को अनेक अनुवादों ने सफलता से निभाया है. इसलिए इस कोशिश को सिरे से नकारा नहीं जा सकता. दूसरी भाषाओं के पाठकों के पास कोई और चारा भी तो नहीं है.
आप अपनी बेटी किरण के उपन्यासों से किस प्रकार का जुड़ाव महसूस करती हैं ?
हम दोनों की विरासत, संस्कार, सोच, मूल्य साझे हैं. पर हम अलग-अलग परिवेश में बडी हुईं हैं . इसलिए हमारा लेखन बिल्कुल अलग है. मेरी मां जर्मन थी, मैं ज़्यादा वक़्त विदेशों में रही. अब भी अमेरिका और मैक्सिको में रहती हूं ! इसलिए मेरा लेखन एकाकीपन, अलगाव, उदासी और अजनबी लोगों को लेकर रहा है.
लेकिन किरण इस देश से जुडी रही हैं. उसमें यहां की मिट्टी की खुशबू है. पर इंसानों को देखने का नज़रिया एक है.
भारत में अंग्रेज़ी लेखन सदा से ही विदेशी माना जाता रहा है. क्या लेखक के तौर पर ये आपको सीमित करता है?
जब अंग्रेज़ी भारत में आई तब तक यहां की भाषाएं और साहित्य फल फूल चुका था. भाषा से मेरा पहला परिचय अंग्रेज़ी से हुआ. लोग मेरे जैसे लोगों का मज़ाक उडाते थे. पर मैंने पाया कि इसने मुझे दुनिया के महान साहित्य के दर्शन कराए.
हमने इसे तोड़ मरोड़ कर अपने को अभिव्यक्त करना सीखा. आज ये अन्य भाषाओं के साथ खडी है. अकादमी इसमें लिखे लेखन कार्य को ही पुरस्कृत करती है. इ स भाषा ने अपनी ज़रूरत और पहचान बनाई है.
कुछ आलोचक कहते हैं अंग्रेज़ी में बेहतर साहित्य इंगलैंड से बाहर लिखा जा रहा है. आप क्या कहती हैं?
इंगलैंड के साहित्य का मुकाबला अपने ही पिछले साहित्य से है. इसकी पुरानी कॉलोनियों में अच्छा साहित्य लिखा जा रहा है, इसमें कोई शक नहीं.
क्या आपका सबसे अच्छा उपन्यास आना बाकी है ?
हर उपन्यास मेरा अपना है. पर हर उपन्यास लिखने के बाद मुझे लगता है कि ये वो नहीं जो मैं लिखना चाहती थी. इसलिए नया उपन्यास लिखना शुरू कर देती हूं. उम्मीद है ये सबसे अच्छा होगा.