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सोमवार, 19 नवंबर, 2007 को 10:07 GMT तक के समाचार

पुष्पा भारती
प्रसिद्ध लेखिका

बच्चन ने कराया जीवन का सौंदर्यबोध

अपनी रचनावली प्रकाशित होते समय बच्चन जी ने अपने पाठकों के नाम एक पत्र लिखा था, "मुझे बड़ी प्रसन्नता है कि मेरी संपूर्ण रचनावली आपके सम्मुख उपस्थित होने जा रही है. एक प्रकार से मैं ही आपके समक्ष प्रस्तुत होने जा रहा हूँ."

क्योंकि इसे मैंने अपना वाङमय शरीर कहा है. शायद बहुत दिन पहले किया हुआ अभियान ही पूरा हुआ है-

"आज मैं संपूर्ण अपने को उठाकर
अवतरित ध्वनि-शब्द में करने चला हूँ." (आरती और अंगारे)

सफल तो तब समझूँगा जब इसमें आप मुझे पा सकें. और पूर्ण सफल तब, जब मुझमें आप अपने को भी पा सकें.

उपलब्धि

वाणी के माध्यम से इस परस्पर मिलन का मूल्य आपको और मुझे भी क्या चुकाना पड़ता है, वह अनकहा ही रहे तो अच्छा.

पर उसके परिमाणस्वरूप जो उपलब्धि आपको होती है-अपने सुख-दुख-श्रम-संघर्ष में एक सहभागी पाने की, और मुझे अपनी अनुभूतियों की सृजन-सार्थकता की-वह दुनिया के किसी भी मूल्य पर सस्ती ही कही जाएगी.

इस उपलब्धि का आभास, कुछ आपको होता रहा है, और कुछ मुझे भी, अन्यथा लगभग आधी सदी तक हमारा यह संबंध कभी न खिंच सकता.

बच्चन जी ने ‘आधी सदी’ की बात लिखी है मेरा तो उनसे साक्षात और उनके वाङमय शरीर दोनों से ही संबंध आधी सदी से भी ज़्यादा का रहा है.

और आधी सदी के बाद भी स्थिति यह है कि उनके नाम स्मरण मात्र से ही सिर प्रणाम की मुद्रा में झुक जाता है और मन में ठंडक सी महसूस होती है.

आधी सदी से भी ज़्यादा की बात इसलिए कह रही हूँ क्योंकि 1945 की जाड़ों की वह रात थी जब गवर्नमेंट जुबली कॉलेज लखनऊ के कवि सम्मेलन में मैने पहली बार बच्चन जी को साक्षात देखा और उनके मुँह से ‘मधुशाला’ सुनी थी.

फिर तो पूरे स्कूली जीवन में ‘इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो’ ‘तुम गा दो मेरा गान अमर हो जाए’, ‘वह पगध्वनि मेरी पहचानी’, ‘छू गया है कौन मन के तार’, ‘जो बीत गई सो बात गई’ जैसी अनेक कविताएँ तथा ‘मधुशाला’ सुना-सुना कर अनेकानेक पुरस्कार और प्रशंसाएँ बटोरी थीं.

अवसर

फिर विश्वविद्यालय में पढ़ने को आई तो पता चला वहाँ के अंग्रेज़ी विभाग में स्वयं बच्चन जी पढ़ाते हैं.

उनसे पढ़ने का अवसर तो नहीं मिला किंतु एक काव्य प्रतियोगिता में उनके सामने स्वरचित कविता पाठ किया और अध्यक्ष पद से उनके द्वारा दिए गए भाषण में सुना, "आप लोग जीवन में जो कुछ जियें, गहराई से जियें. दुख हो, सुख हो, उदासी हो या बेलौस मस्ती हो, बिछुड़न हो या प्रेमाकुलता हो-जो कुछ भी हो-आपका अपना हो. उसे शिद्दत से जीने के बाद, अपने ढंग से, अपने शब्दों में व्यक्त करें-किसी से उधार ली कोमलकांत कल्पना और भारी भरकम भाषा आपका दूर तक साथ नहीं दे पाएगी."

बात सभी को संबोधित थी पर मैं समझ गई थी कि मेरे लिए ही वह बात विशेष तौर से कही गई थी.

मेरी कविता को प्रथम पुरस्कार मिला था पर उसकी भाषा शैली और कथ्य में से प्रसाद, पंत, महादेवी साफ़ नज़र आ रहे थे.

उसी दिन उसी समय मेरे भीतर एक एकलव्य जागृत हो उठा था और मैंने उनके आदेश को गुरुमंत्र मानकर जीवनभर जो कुछ लिखा उसमें उधार का कुछ नहीं रहा.

बाद में जब कॉलेज में स्वयं अध्यापन किया तो प्राचीन कवियों से लेकर अधुनातन कवियों को पढ़ाने का अवसर मिला.

केवल पढ़ाने के लिए ही नहीं यों भी जीवन में कविता की घनघोर पाठिका रही हूँ मैं.

बुद्धि के स्तर पर अन्य कई कवियों की कविताओं से बेहद प्रभावित भी हुई हूँ, पर मन के भीतर तक जिस तरह बच्चन जी की कविताओं ने छुआ है वह बात कहीं और नहीं मिली.

यह नहीं कहूँगी कि बच्चन जी की कविता महानतम है. नहीं, कहीं अधिक गहरी, कहीं अधिक मार्मिक, कहीं अधिक अर्थवान कविताएँ अन्य कवियों की पढ़ी हैं मैंने, पर उनके कवियों के समक्ष सिर तो झुकता है-प्रणत विनत होता है.

असर

लेकिन मन रमता बच्चन में ही है-ऐसा क्यों?

सोचने पर यही पाया है कि उनकी कविताओं ने मन के कुहासे छाँटे हैं-रोशनी दी है. बहुत बड़ी उपलब्धि होती है किसी कवि की कि उसका पाठक उसकी कविताई में स्वयं को पा ले.

पाठक के मन में सीधे प्रवेश कर जाने की यह कला बच्चन जी ने अपने धुर बचपन में ही सीख ली थी.

जीवन के इस देय को उन्होंने अपनी एक कविता में स्वीकार किया है,

याद आते हो मुझे तुम, ओ, लड़कपन के सबेरों के भिखारी
तुम भजन गाते, अँधेरे को भगाते
रास्ते से थे गुज़रते,
और रे एक तारे या सरंगी
के मधुर स्वर थे उतरते,
कान में, फिर प्राण में, फिर व्यापते थे
देह की अनगिन शिराओं में,
याद आते हो मुझे तुम..

इस कविता में आगे बच्चन जी कहते हैं कि एक दिन मैंने उससे पूछा कि तुम अपनी सरंगी को क्या खिलाते हो?

तो उसने कहा, "ई हमार करेज खाथै, मोर बचवा", सुनकर उनका बाल मन ठठा कर हँस दिया था. आगे बच्चन लिखते हैं,

तब न थी संगीत-कविता से, कला से,
प्रीति मेरी चिन्हारी.
याद आते हो मुझे तुम...

पर अब सोचते हैं-

क्या तुम्हे मालूम था जो वरदान तुमने
गान का मुझको दिया था,
लय तुम्हारी स्वर तुम्हारे, शब्द मेरी
पंक्ति में गूँजा किए हैं...

क्या इसी लय, इन्हीं सुरों ने बच्चन के शब्दों को वह शक्ति दे दी कि वे पाठ के साथ सीधा तादात्म्य स्थापित कर देते थे.

बच्चन की भाषा की सरलता, छोटे-छोटे छंदों की लय की रवानगी ने उन्हें अपने समकालीनों से अलग ऊँचा स्थान दिला दिया था.

कुहासा

जब बच्चन की वाणी अपने उरोज पर थी उस समय हिंदी में छायावाद और रहस्यवाद का घटाटोप कुहासा छाया हुआ था.

ऊपर से बेहद बोझिल और क्लिष्ट भाषा उस कुहासे को छँटने भी नहीं देती थी.

फलतः जीवन और साहित्य में आपसी नाता जुड़ ही नहीं पा रहा था.

जिंदगी अलग राह पर चल रही थी और कविता अलग राह पर ले जा रही थी. ऐसे में बच्चन की सीधी सरल भाषा उस जिंदगी की बात करती थी जिसे हम जी रहे थे.

उस समय का समाज भी एक विचित्र दौर से गुज़र रहा था. समाज में सामाजिक मान-मर्यादाओं, निजी संबंधों और निषेधों का, पाप-पुण्य के नकली आडंबर का बोलबाला था.

जीवन की जो सहज और स्वाभाविक माँग होती है उसके साथ उन सामाजिक मूल्यों का सही मीज़ान बैठता ही नहीं था. परिणामस्वरूप लोगों के मन में तमाम तरह की कुंठाएँ पलती रहती थीं.

झूठा दिखावा और आडंबर चारों ओर व्याप्त था-मन में कुछ और ज़ुबान पर कुछ और होता था.

प्रतिबद्धता

बच्चन की कविता ने उस तरह की तमाम गाँठों को खोला और जीवन के सौंदर्य का बोध कराया. बच्चन की मधुशाला ने जीवन के प्रति राग का सहज संबंध जोड़ा-विश्वास और मस्ती से जीना सिखाया.

कमिटमेंट या प्रतिबद्धता को जीवन से जोड़कर घुटन और भटकन दूर करने की चेष्टा की. लोगों के मन में विश्वास जगाया और निश्चिंत किया यह कहकर कि "राह पकड़ एक चला चल तू, पा जाएगा मधुशाला."

फिर चाहे वह भारतमाता की दीवाना हो जिसे स्वतंत्रता की मधुशाला में पहुँचना था या फिर पराधीन भारत की ज़लालत और गरीबी में जीता हुआ जन साधारण हो जिसे दो पल शांति और प्रेम की मधुशाला में पहुँचना हो-सभी को बता दिया कि एक राह पकड़ कर चलते चले जाओ पहुँच जाओगे अपनी मधुशाला तक!

फिर जीवन में आनंद ही आनंद है. हर भटकन को दूर करने वाली बन गई थी बच्चन की कविता.

इंसान एक बार जब अपनी सही राह पकड़ कर चलना सीख ले तो जीवन में आए प्रीति, प्रेम, छल, कपट, विश्वास, विश्वासघात सब कुछ को समझने, सहने और जीतने की शक्ति स्वतः ही मिलती चलती है.

बच्चन की कविता ने यही शक्ति दी. बच्चन के पाठक ने अनजाने में ही अपने सुख में, अपने दुख में उनकी कविताएँ गुनगुना कर आनंद और सहारा पाया.

लगभग 60-70 बरस का रहा है बच्चन का लेखन काल.

इतने बड़े काल खंड में निरंतर लिखते रहना और एक से बढ़कर एक पुस्तकों का सृजन करना साधारण काम नहीं है.