शुक्रवार, 02 नवंबर, 2007 को 12:57 GMT तक के समाचार
सलमा ज़ैदी
संपादक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम
संजय लीला भंसाली अपनी नई फ़िल्म सांवरिया के साथ एक बार फिर चर्चा में हैं. देवदास का ऑस्कर भेजा जाना और पिछले दिनों ब्लैक में अमिताभ बच्चन को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना भी कहीं न कहीं इसी निर्देशक की एक बड़ी उपलब्धि रही है.
हाल ही में मुंबई में संजय से एक लंबी बातचीत हुई. प्रस्तुत हैं उसी के कुछ अंश.
सांवरिया के ज़रिए आप क्या नया और बेहतर दे रहे हैं जो आपने पहले की फ़िल्मों में नहीं दिया है. ये किस मायने में अलग है?
पहली बात तो यह कि सांवरिया बहुत यंग लव स्टोरी है, जो मैने पहले नहीं की है. प्रतिभाशाली युवा कलाकार हैं जो पहली बार कैमरा फ़ेस कर रहे हैं. नया संगीत निर्देशक है. साधारण प्रेम कहानी है, बहुत ज्यादा घुमाव नहीं है. लेकिन हमने इसमें कुछ नए प्रयोग किए हैं.
मैं मानता हूँ कि देवदास और ब्लैक जहाँ स्थापित कलाकारों के साथ की गई थी, इस फ़िल्म में लगेगा कि राजकपूर की ‘आवारा’ और ‘बरसात’ के रोमांस को अगर रंगीन फ़िल्म में नए दर्शकों के लिए नएपन के साथ दिखाया जाता तो वह कुछ इस तरह होता. लेकिन इसमें नयापन है या नहीं ये तो आख़िरकार दर्शकों को ही तय करना है.
राजकपूर के ‘शो मैन’ की परंपरा को अगर किसी ने जिंदा रखा है तो मुझे लगता है कि वह आपने ही रखा है. राजकपूर की फ़िल्मों की तरह आपकी फ़िल्मों का कैनवस भी भव्य होता है और आप फ़िल्म के हर पहलू में, चाहे वह संपादन हो या संगीत, उन्हीं की तरह दिलचस्पी लेते हैं. तो क्या राजकपूर से आपकी तुलना की जा सकती है और क्या बॉबी और सांवरिया की तुलना की जा सकती है?
देखिए राज साहब हिंदुस्तानी सिनेमा के एक बहुत बड़े फ़िल्म मेकर रहे हैं. मैं कहूँगा कि मैं बदक़िस्मत रहा कि मैं उनसे नहीं मिल सका, बतौर सहायक उनके साथ कुछ काम कर पाता, उनसे कुछ सीख पाता...उनके साथ किसी की तुलना नहीं की जा सकती. मैं तो कहूँगा हमारी पीढी के फ़िल्ममेकर्स को उनके स्तर तक पहुंचने के लिए दो-तीन जन्म लेने पड़ेंगे.
हाँ, वो प्रेरणास्रोत हमेशा से रहे हैं. उनका सिनेमा के प्रति लगाव, उनकी ड्रामा और संगीत की ज़बर्दस्त समझ..फ़िल्मों में उनकी दिलचस्पी. मैने राजकपूर साहब की फ़िल्मों से बहुत कुछ सीखा है. मेरे विचार से राजकपूर की फ़िल्मों का संगीत भारतीय सिनेमा का श्रेष्ठ संगीत है.
जहाँ तक बॉबी और सांवरिया की तुलना का सवाल है तो इतना ही कह सकते हैं कि बॉबी में जहाँ राजकूपर के बेटे ऋषि कपूर थे, वहीं सांवरिया में ऋषि कपूर के बेटे रणबीर हैं और डिंपल कपाड़िया की जगह सोनम हैं....वैसे इनकी तुलना नहीं की जा सकती.
आपने अनिल कपूर के साथ काम किया. अब उनकी बेटी के साथ काम कर रहे हैं. आमतौर पर आपने अमिताभ बच्चन, शाहरुख़ ख़ान जैसे बड़े स्टारों के साथ काम किया है, इन दो नए कलाकारों के साथ कैसा अनुभव रहा?
मैने अनिल कपूर के साथ 1942 लव स्टोरी के साथ काम किया. उस फ़िल्म में मैं विनोद चोपड़ा का सहायक था. 1942 लव स्टोरी के गाने मैने निर्देशित किए थे.
रही बात नए लोगों के साथ काम करने की तो बड़े स्टार के साथ काम करने का अनुभव कुछ अलग होता है, वो ज्यादा परिपक्व होते हैं, अनुभव होता है. नए लोगों के साथ बहुत सतर्कता बरतनी पड़ती है. हर छोटी-छोटी चीज़ का ख़याल रखना पड़ता है.
पर उसका अपना मज़ा आया और मैने ख़ुद को दस साल छोटा महसूस किया. हँसी-मज़ाक, उनकी आँखों में चमक, भविष्य में कुछ करने की ललक. ये चाह हमें भी प्रेरित करती है कि हमें भी अभी और आगे बढ़ना है. इस तरह फ़िल्म में आपका योगदान और भी बढ़ जाता है.
आपके बारे में कहा जाता है कि आप काम लेने के मामले में बहुत सख़्त हैं? ये बच्चे आपके साथ पहले सहायक के तौर पर काम कर चुके हैं तो इस बार क्या उन्हें स्टार ट्रीटमेंट मिला?
नहीं, जब मेरे सहायक बने तो उन्हें किसी तरह का स्टार ट्रीटमेंट नहीं मिला. काम ठीक नहीं होने पर जैसी झिड़की दूसरे सहायकों को मिलती थी, इन्हें भी ऐसी ही मिलती थी. जब वो एक्टर बन गए तो मेरे हिसाब से ये स्थिति और भी ख़राब हो गई.
चार साल से ये लोग मेरे पास हैं. मुझे जितना आता था, जितनी मेरी समझ है, मैने ईमानदारी से उन्हें सिखाया. मैं उनका बहुत सम्मान करता हूँ. रणबीर कपूर भारतीय सिनेमा के पहले परिवार के प्रतिनिधि हैं. मेरा फ़र्ज था उन्हें सिखाना इस प्रक्रिया में उन्हें डांटना भी पड़ा तो मैने डांटा.
मैंने अमिताभ और रानी मुखर्जी के साथ काम किया. उनका अभिनय जिस दर्जे का है, उसके लिए कुछ तो ख़ास करना पड़ेगा. मुझे मालूम है कि ये नए लोग अमिताभ और रानी नहीं है और उन्हें वहाँ पहुँचने में बहुत साल लगेंगे, लेकिन मुझे उन्हें उस स्तर तक लाना पड़ेगा, नहीं तो उनके साथ काम करने की चुनौती बेकार हो जाएगी.
अमिताभ बच्चन को ब्लैक के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है. जब आप फ़िल्म बनाते हैं तो क्या आपके दिमाग में पुरस्कार या ऑस्कर जैसी चीज़ रहती है या अब हो गई है?
नहीं, मैं जब फ़िल्म बनाता हूँ तो मैं एक ही चीज़ मानता हूँ कि मेरे माँ-बाप का आशीर्वाद और लाखों-करोड़ों लोगों का प्यार मेरे साथ है.
मेरी फ़िल्मों के प्रति उनकी चाह है, वही मेरे लिए सबसे बड़ी बात है. पुरस्कार के लिए मैं फ़िल्म नहीं बनाता. पुरस्कार मिल गया तो वो बड़ी शाबाशी है और उसे मैं विनम्रतापूर्वक स्वीकार कर लेता हूँ. लेकिन पुरस्कार को मक़सद नहीं बनाता हूँ.
ऑस्कर, फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जूरी, प्रचार-प्रसार, राजनीति पर निर्भर करता है. ये सब मुझे आता नहीं है. पुरस्कार मिल गया तो सर आँखों पर, नहीं मिला तो रुकूंगा नहीं, अच्छी फ़िल्में बनाता रहूँगा. इससे मेरा मक़सद नहीं बदलेगा.