http://www.bbcchindi.com

कलाकारों के समर्थन में आए ख़ालिद हुसैनी

ख़ालिद हुसैनी अपने उपन्यास 'द काइट रनर' पर बनी फ़िल्म के कलाकारों की सुरक्षा को देखते हुए फ़िल्म को देर से रिलीज़ करने के फ़ैसले के समर्थन में आगे आए हैं.

फ़िल्म के तीन अफ़गान युवा कलाकारों ने कहा था कि फ़िल्म में समलैंगिक दुष्कर्म के सीन को देखते हुए उनको निशाना बनाया जा सकता है.

उनके इस बयान के बाद फ़िल्म बनाने वाली कंपनी स्टूडियो पैरामाउंट वॉंटेज़ ने फ़िल्म को छह हफ़्ते देर से रीलीज़ करने का फैसला किया है.

सुरक्षा की चिंता

स्टूडियो ने तीनों कलाकारों के परिवारों के विदेश जाने और वहीं रहने की भी व्यवस्था की है.

हुसैनी ने स्टूडियो के इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि अफ़गानिस्तान ख़ासा हिंसाग्रस्त स्थान बन गया है.

हुसैनी ने सैन फ्रांसिस्को क्रॉनिकल अख़बार से बातचीत में कहा, "अगर इन लड़कों और उनके परिवारों का मानना है कि वहाँ उन्हें धमकी दिए जाने का ख़तरा है तो आपको वे सभी कदम उठाने होंगे जिससे वे सुरक्षित महसूस करें."

उन्होंने कहा, "मैं फ़िल्म को देर से रिलीज़ करने के फ़ैसले का स्वागत करता हूँ, हलांकि यह फ़ैसला व्यावसायिक हितों के ख़िलाफ़ भी जा सकता है.”

उपन्यास की कहानी

हुसैनी 1980 में अफ़निस्तान से अमेरीका चले गए थे. उनका 2003 में आया पहला उपन्यास 'द काइट रनर' काफ़ी लोकप्रिय हुआ था.

यह उपन्यास अफ़गानिस्तान में सोवियत संघ के हमले और तालिबान के पनपने के दौर में वहाँ रह रहे एक युवक की कहानी है.

उपन्यास का सबसे दुखद हिस्सा वह है जब नायक का सबसे क़रीबी दोस्त यौन प्रताड़ना का शिकार होता है और वह कुछ नहीं कर पाता है. यही कहानी का केंद्र बिंदु भी है.

अहमद ख़ान जिन्होंने हसन का किरदार निभाया है, उनके पिता अहमद जान महमीदज़ादा ने बीबीसी से कहा कि उन्हें डर है कि इस सीन पर उनके ख़िलाफ़ हमला हो सकता है.

वे कहते हैं, "मैं अपने समुदाय के लोगों से डरा हुआ हूँ, वे मेरे ख़िलाफ़ जा सकते हैं, वे मेरा गला काटकर मेरी हत्या भी कर सकते हैं."

हुसैनी कहते हैं कि इस सीन को फ़िल्म से हटाने का सवाल ही पैदा नहीं होता. उनका कहना है, "फ़िल्म उदारता, प्यार, दोस्ती और माफ़ करने का संदेश देती है. यह फ़िल्म कट्टरता, हिंसा, घृणा और भेदभाव की निंदा करती है."

यह फ़िल्म अब अमरीका में 14 दिसंबर को रिलीज़ होगी.