शनिवार, 13 अक्तूबर, 2007 को 09:21 GMT तक के समाचार
"मैं अब कान और ऑस्कर के समारोहों में जा-जाकर ऊब चुका हूँ. मैं यह बताते-बताते थक चुका हूँ कि हम भारत से हैं और फ़िल्म बनाते हैं.
अब हमारे फ़िल्म उद्योग को भी बदलने और अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनने की ज़रूरत है."
जी हाँ, ऐसा मानना है बॉलीवुड के जाने-माने सितारे और किंग ख़ान कहे जाने वाले शाहरुख़ ख़ान का.
दिल्ली में चल रहे हिंदुस्तान टाइम्स लीडरशिप सम्मेलन में शनिवार को शाहरुख़ ने कहा कि जब हम देश के बाकी उद्योगों के विकास की बात कर रहे हैं तो 100 साल पुराने फ़िल्म उद्योग को कैसे परे रख सकते हैं.
उन्होंने कहा कि अब फ़िल्मों में तकनीक से लेकर लेखन तक और निर्माण से लेकर मार्केटिंग तक बहुत कुछ बदलने और सीखने-सुधारने की ज़रूरत है.
शाहरुख़ चाहते हैं कि भारतीय सिनेमा जगत बदलावों के साथ इतनी तरक्की करे कि हॉलीवुड और विश्व सिनेमा की नज़र यहाँ के दर्शकों पर ही नहीं, फ़िल्म उद्योग पर भी पड़े.
किंग ख़ान की राय है कि अब 90 मिनट की अच्छी और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर भारत में फ़िल्में बननी चाहिए क्योंकि लोग लंबी नहीं अच्छी फ़िल्में देखना चाहते हैं.
उन्होंने कहा, "हम कब तक धूल भरे स्टूडियो और पुराने ढर्रे पर लिखी कहानियों, स्क्रीन-प्ले के सहारे फ़िल्में बनाते रहेंगे."
'ऑस्कर- इन इंडिया, बाय इंडिया'
शाहरुख़ को उस दिन का इंतज़ार है जब दिल्ली के रामलीला मैदान या मुंबई के अंधेरी कॉम्पलैक्स में ऑस्कर के स्तर का फ़िल्म पुरस्कार दिया जाए और उसका आयोजन भारतीय उद्योग समूह करे और अंतरराष्ट्रीय सिनेमा उसमें हिस्सा लेकर गर्व महसूस करे.
उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भारत में आज भी वैज्ञानिक ढंग से स्क्रीन-प्ले लिखने वाले नहीं हैं और न ही विश्व समुदाय को ध्यान में रखकर छोटी अवधि की अच्छी फ़िल्में बनाने पर ज़ोर है.
उन्होंने कहा कि सिनेमा में गाने और नृत्य का प्रयोग भारतीय फ़िल्म जगत की पहचान है और इसे बनाए रखते हुए फ़िल्में बनानी होंगी.
जब उनसे पूछा गया कि भारतीय अभिनेता हॉलीवुड की फ़िल्मों में काम क्यों नहीं करते, उन्होंने कहा कि कुछ अभिनेता ऐसा कर भी रहे हैं पर वो ख़ुद हॉलीवुड की फ़िल्मों में काम करने को न तो प्राथमिकता मानते हैं और न ही इसे महत्व देते हैं.
फिर उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा, "ऐसा नहीं है कि मेरे पास हॉलीवुड से बहुत प्रस्ताव हैं."
शाहरुख़ कहते हैं, "मैं भारतीय भाषाओं (हिंदी से मलयालम तक) में फ़िल्में करना ज़्यादा पसंद करूँगा. अपनी फ़िल्मों में अपनी भाषा में काम करके भी अच्छा कलाकार बना जा सकता है और हॉलीवुड की फ़िल्मों में काम करने का यह मतलब नहीं है कि आप एक अच्छे कलाकार है."
उन्होंने कहा, "मैं अपनी भाषा में अपने तरीके से ऐसी फ़िल्में चाहता हूँ जो दुनियाभर में अपनी पहचान क़ायम करें."
राजनीति और मीडिया
किंग ख़ान कहते हैं कि वो इतने उदार हृदय नहीं हैं कि राजनीति में आ जाएं और समाज सेवा को अपना समय दें.
अपने दोस्त राहुल गांधी का ज़िक्र करते हुए उन्होंने चुटकी ली और कहा कि वे दो कारणों से राजनीति में नहीं जा सकते, एक यह कि वे स्वार्थी हैं और भौतिकवादी हैं और दूसरे यह कि वे ख़ूबसूरत हैं.
जब दर्शकों ने पूछा कि क्या राहुल गाँधी ख़ूबसूरत नहीं हैं, उन्होंने कहा, "वे तो अद्भुत हैं."
शाहरुख़ ने युवा राजनीतिज्ञों का ज़िक्र करते हुए कहा कि राजनीति में अच्छे लोग आ रहे हैं और फिर उन्होंने राजनीतिकों की छवि बिगाड़कर पर्दे पर दिखाए जाने के लिए फ़िल्म जगत की ओर से सबसे माफ़ी भी माँग ली.
मीडिया के प्रति शाहरुख़ ने सुलझे और सरल दिखने का प्रयास किया. उन्होंने कहा कि कुछ मीडियाकर्मी लोगों के निजी जीवन तक दखल देने की कोशिश करते हैं पर शायद ऐसे लोग भी नए हैं और उन्हें नहीं मालूम की अपना काम कैसे किया जाए.
शाहरुख़ कहते हैं कि मीडिया के ग़लत प्रचार की वजह से ही लोगों में यह धारणा बनी कि उनके और बिग बी अमिताभ बच्चन के बीच कुछ गतिरोध हैं पर मीडिया के विकास की वजह से ही कई हलकों की जवाबदेही बढ़ी है.
रहा चर्चा में बने रहने का सवाल तो इसपर शाहरुख़ बोले, "कभी मीडिया ने हमारा तो कभी हमने मीडिया का इस्तेमाल किया. मीडिया का अगर मार्केटिंग के लिए इस्तेमाल सही ढंग से हो तो इससे दोनों का फ़ायदा होता है."
ब्रांड शाहरुख़
पर अपने आजतक के मुकाम के लिए वो केवल मीडिया को ही नहीं, अपनी मेहनत, लगन और ईमानदारी को श्रेय देने से भी नहीं चूकते.
वो कहते हैं, "कोई भी व्यक्ति केवल मीडिया के प्रचार से या रणनीति बनाने से ही ब्रांड नहीं बन सकता. इसके लिए कठिन मेहनत और ईमानदार होना ज़रूरी है. मैं एक घोड़े की तरह अपनी रेस दौड़ रहा हूँ."
शाहरुख़ को इस बात से ज़्यादा असर नहीं पड़ता कि बाकी के कलाकार क्या कर रहे हैं और वो मानते हैं कि उनका मुक़ाबला उन्हीं से है.
वो कहते हैं कि उन्होंने हमेशा अपने अभिनय को बेजोड़ बनाए रखने की कोशिश की है और साथ ही दर्शकों को वो देने की कोशिश की है, जो कि वे चाहते हैं. शाहरुख़ बेबाकी से बताते हैं कि वो उन फ़िल्मों को नहीं देखते जिनमें वो काम नहीं करते.
कुछ मामलों पर शाहरुख़ ने तीखी राय भी रखी और बोले, पर्दे पर शराब और सिगरेट को दिखाने से रोकना वैचारिक संकीर्णता का प्रतीक है.
वो मानते हैं कि समाज जिस सच्चाई से रूबरू है उसे पर्दे पर दिखाने से कोई परहेज नहीं होना चाहिए.
हालांकि वो मानते हैं कि कुछ मामलों में संभलकर चलने की भी ज़रूरत है और कई ऐसी बातें हैं जिन्हें वो अपने अभिनय में शामिल नहीं करते.