राजेश प्रियदर्शी
बीबीसी हिंदी
बाल मज़दूरी पर प्रतिबंध लगे एक वर्ष गुज़र गया लेकिन लाखों की तादाद में बच्चे मज़दूरी कर रहे हैं यानी प्रतिबंध बेअसर रहा है.
प्रतिबंध बेअसर है क्योंकि बाल मज़दूरी को एक समस्या के रूप में देखा गया.
बाल मज़दूरी समस्या नहीं बल्कि ग़रीबी की जानलेवा समस्या का समाधान करने की बेबस कोशिश है.
बाल मज़दूरी रोग नहीं, उसका एक लक्षण है, रोक लगा देने से रोग मिट नहीं जाएगा.
यह बात सरकार को भी पता है, प्रतिबंध के बावजूद जब लाखों बच्चे-बच्चियाँ स्कूल जाने की जगह बर्तन घिस रहे हैं, इस पर सरकार को भी कहाँ कोई आश्वर्य हो रहा है.
बाल मज़दूर हर भारतीय व्यक्ति के जीवन का सत्य हैं, घर के अंदर नौकर-नौकरानियों की शक्ल में और बाहर चाय के ढाबों से लेकर स्कूटर के गैरेज और ख़तरनाक उद्योगों तक में.
बाल मज़दूरी ही नहीं, ऐसे अनेक सत्य हमारे सामने हैं जो क़ानूनन प्रतिबंधित हैं.
जैसे जनता के लिए नारे लगाना आसान है वैसे ही सरकार के लिए क़ानूनी उपाय करना, और फिर भारत में तो क़ानून का लागू होना भी ज़रूरी नहीं है.
ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ना इतना आसान है तो एक जटिल सामाजिक-आर्थिक दुरावस्था को सुलझाने की उलझन में सरकार क्यों पड़ेगी?
बच्चों का पेट भरना, उन्हें पढ़ाना, उनका इलाज करना आसान है या फिर प्रतिबंध लगाना? हर आसान चीज़ सफल नहीं होती.
प्रतिबंध लगाने के साथ ही काश सरकार ने बताया होता तो घर में या ढाबे पर काम करने वाले बच्चे अगर काम नहीं करेंगे तो उनका पेट कैसे भरेगा?
शॉर्टकट
सदियों से कुटीर उद्योगों, परंपरागत हस्तशिल्प के देश भारत में रातोरात बच्चों के काम करने पर एक झटके में पूरी तरह प्रतिबंध लगा देना समस्या के सरलीकरण की ही मिसाल है.
बनारस और लखनऊ के बुनकर आख़िर किस इंस्टीट्यूट में बुनाई सीखते हैं, उन्हें यह हुनर बचपन से काम करके ही आता है.
बच्चों का खेलने और स्कूल जाने की उम्र में मज़दूरी करना दुखद है इसमें किसे संदेह हो सकता है. ख़तरनाक उद्योगों की बात और है, शोषण रोकने के प्रयास बहुत ज़रूरी हैं लेकिन प्रतिबंध समाधान नहीं है.
भारत में चुभने वाली चीज़ों को नज़रों के सामने से हटाने की जल्दबाज़ी दिखती है लेकिन उन्हें ठीक करने की नहीं.
शाइनिंग इंडिया में आँखों को चुभने वाली चीज़ों को नज़र से हटाने की हड़बड़ी कुछ और ज्यादा है लेकिन ये कोशिशें उसी तरह नाकाम रहती हैं जैसे इमरजेंसी के दौरान भिखारियों को सड़कों से हटाने की कोशिश.
कामयाब वही कोशिशें होंगी जिनमें स्थिति की जटिलता को समझकर सर्वांगीण सुधार के प्रयास किए जाएँगे न कि प्रतिबंध के शॉर्टकट अपनाए जाएँगे.