बुधवार, 10 अक्तूबर, 2007 को 11:40 GMT तक के समाचार
रामदत्त त्रिपाठी
बीबीसी संवाददाता, उत्तर प्रदेश
बात अब से कोई 23 साल पहले की है. राजीव गाँधी ने अपने पारिवारिक मित्र और फ़िल्म स्टार अमिताभ बच्चन को लोकसभा चुनाव लड़ाने का फ़ैसला किया.
अमिताभ लखनऊ आए. उनसे मेरी मुलाकात हुई इलाहबाद के कैबिनेट मंत्री श्याम सूरत उपाध्याय के घर पर. राजनीति मे अमिताभ का यह पहला क़दम था.
अमिताभ को इलाहाबाद ले जाकर लोकसभा चुनाव में नामांकन कराना श्यामसूरत जी के जिम्मे था.
इलाहाबाद उनके अभूतपूर्व स्वागत के लिए तैयार था. अमिताभ रेकॉर्ड 62 फीसदी मतों के अंतर से जीते. राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी हेमवती नंदन बहुगुणा के लिए यह बहुत करारी और कष्टकर हार थी.
ऐसा कहा जाता है कि अमिताभ के पिता हरिवंश राय बच्चन और माँ तेजी बच्चन को प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का पारिवारिक मित्र होने का भरपूर लाभ मिला था.
इंदिरा जी के शासन मे अमिताभ को फिल्मी बिजनेस में फायदा मिला. राजीव के राज मे अमिताभ को संसद की सदस्यता मिली.
मगर जब छोटे भाई के साथ-साथ उनका नाम भी बोफोर्स घोटाले मे उछला तो वह राजीव को गाँधी को अकेला छोड़ कर किनारे हो लिए. संसद सदस्यता से इस्तीफा दे दिया.
एक फिल्मी पत्रिका से बातचीत मे उन्होंने कहा था, ''मुझे कभी राजनीति मे नहीं जाना चाहिए था. अब मैंने सबक सीख लिया है. अब आगे और राजनीति नहीं.''
समाजवादी पार्टी
बताते हैं कि अमिताभ का सोनिया गांधी से पारिवारिक संबंध बना रहा.
लेकिन इस बीच समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह बच्चन परिवार के काफ़ी करीब आ गए और धीरे-धीरे अमिताभ परिवार एक तरह से समाजवादी पार्टी नेता मुलायम सिंह यादव का मित्र हो गया.
मुलायम ने इन्हें अपना स्टार प्रचारक बना लिया. अमिताभ ने राज बब्बर की जगह ले ली. भले ही अमिताभ तकनीकी रूप से समाजवादी पार्टी के सदस्य न बने हों, मगर जया तो विधिवत पार्टी की सदस्य भी हैं और पार्टी के कोटे से राज्यसभा सदस्य भी बनीं.
अक्तूबर 2001 में इलाहबाद के समाजवादी पार्टी के मेयर केपी श्रीवास्तव ने अमिताभ बच्चन का नागरिक अभिनंदन कराया. इससे चर्चा चल पड़ी कि अमिताभ शायद फिर सक्रिय राजनीति मे आएँगे.
मगर अमिताभ ने सफाई दी कि इंदिरा जी की हत्या के बाद 1985 में वह भावुकता में राजीव का साथ देने के लिए राजनीति मे आ गए थे. ''मगर न तो मुझे तब राजनीति आती थी, न अब आती है और न मैं भविष्य में राजनीति सीखना चाहूँगा.''
यह कहने के बावजूद मुलायम की सभाओं मे भीड़ बढ़ाने के लिए अमिताभ लगातार जाने लगे. फिर चाहे 2002 में ब्लड डोनेशन यानी समाज सेवा के बहाने या पिछले साल सरकारी 'कन्या विद्या धन' बांटने.
प्रचार
मुलायम सरकार के कार्यकाल में अमिताभ उत्तर प्रदेश विकास परिषद के सदस्य बने. मंत्री का दर्जा मिला. जया बच्चन को राज्यसभा की सदस्यता मिली और फ़िल्म विकास बोर्ड की अध्यक्षता. यह पद भी मंत्री के दर्जे वाला था.
अमिताभ और अभिषेक बच्चन की क़रीब दो दर्जन फिल्मों को टैक्स से छूट मिली. मुलायम से मित्रता के पुरस्कार में पूरे परिवार को यश भारती का सरकारी पुरस्कार मिला.
अमिताभ उत्तर प्रदेश के ब्रांड अम्बेसडर बने.
जरूरत पड़ने पर अमिताभ को किसानी का प्रमाणपत्र भी मिला गया.
फ़िल्म , बिजनेस , खेती और राजनीति हर तरफ़ फ़ायदा ही फायदा. सब कुछ चकाचक. फ़िर भी तुर्रा यह कि राजनीति नहीं आती.
पिछले चुनाव में जया बच्चन ने बाकायदा समाजवादी पार्टी के मंच से रैलियाँ संबोधित कीं. और अमिताभ बच्चन ने अखबारों , टेलीविज़न और ऑडियो विजुअल के माध्यम से प्रचार किया. लोगों को भरोसा दिलाने की कोशिश की कि उत्तर प्रदेश में 'जुर्म है कम'.
शुद्ध राजनीति करते हुए भी 'छोरा गंगा किनारे वाला' लोगों को यह यक़ीन दिलाना चाहता है कि वह मान लें कि अमिताभ बच्चन राजनीति मे नहीं हैं.
मगर फ़िल्म और विज्ञापन वाले बहुत सी बातें कहते हैं उन पर भरोसा करना न करना आपके ऊपर है.