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शुक्रवार, 05 अक्तूबर, 2007 को 11:18 GMT तक के समाचार

विनोद वर्मा
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

सिर्फ़ हंगामा न हो, सूरत बदलनी चाहिए

जंग है तो जंग का मंज़र भी होना चाहिए
सिर्फ़ नेज़े हाथ में हैं सर भी होना चाहिए

नेज़े यानी भाले.

अगर उत्तरप्रदेश के घटनाक्रम पर नज़र डालें तो लगता है कि मुख्यमंत्री मायावती राहत इंदौरी के इस शेर को ही चरितार्थ कर रही हैं. 18 हज़ार पुलिसकर्मियों को बर्खास्त करके उन्होंने जंग का मंज़र स्पष्ट कर दिया है.

जंग पुलिस वालों के ख़िलाफ़ न थी, न है और न रहेगी. राजनीतिक वर्ग की जंग निरीह कर्मचारियों के साथ संभव भी नहीं. दरअसल जंग पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव और उनकी समाजवादी पार्टी के ख़िलाफ़ है.

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लेकिन जो जंग के शिकार हुए हैं उनमें पुलिस वाले हैं और कुछ अफ़सरों भी.

अभी अख़बारनवीसों के कलम मायावती की तारीफ़ करते थके नहीं हैं कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के चुनावों में 'सोशल इंजीनियरिंग' का एक नया अध्याय रच दिया है.

और इसी बीच मायावती ने दूसरा इतिहास रच दिया है.

'सोशल इंजीनियरिंग' के इतिहास के अध्याय अस्थाई हैं. हो सकता है कि नए राजनीतिक समीकरण बनें तो सब जोड़-घटाना बिखर जाए और सारा गणित माया साबित हो जाए.

लेकिन यह जो दूसरा अध्याय मायावती रच रही हैं वह एक ऐसी बात है जो दूर तक जाने का माद्दा रखती है. हो सकता है (अगर मायावती चाहें और उनके सिपहसलार चाहें तो) कि इसका असर बहुत दिनों तक दिखता रहे.

वैसे ज़्यादातर लोगों का मानना है कि मायावती की कार्रवाई के पीछे समाज की हितचिंता कम है, राजनीति-राजनीति खेलना ज़्यादा है. लेकिन चूँकि जंग के साथ जंग का मंज़र भी दिखाना चाहती थीं सो उन्होंने यह भी कर दिया है.

हो सकता है कि वे ग़लत हों. लेकिन अगर मायावती सचमुच मुलायम सिंह सरकार के दौरान हुए भ्रष्टाचार को लेकर चिंतित हैं और उसको दुरुस्त करना चाहती हैं तो यह एक अभूतपूर्व क़दम होगा.

हालांकि यह कार्रवाई एक जाँच समिति की रिपोर्ट के आधार पर हुई है और जो तथ्य सामने आए हैं वो ज़ाहिर तौर पर भ्रष्टाचार की भयावह तस्वीर पेश करते हैं. लेकिन सरकारी नौकरियों में नियुक्ति, वह भी छोटे पदों पर किस तरह होती हैं यह जाँच समितियों के बिना भी एक खुला रहस्य है.

भारत में रेलवे से लेकर पुलिस तक और सफ़ाईकर्मी से लेकर पटवारी तक छोटे पदों पर अधिकांश नियुक्तियाँ कैसे होती हैं इससे कम ही लोग नावाकिफ़ होंगे. प्रदेशवाद से लेकर भाई-भतीजावाद और नक़दवाद तक इतने क़िस्म के भ्रष्टाचार होते हैं कि आम कहे जाने वाला आदमी तो अब सरकारी नौकरी पाने के सपने भी नहीं देखता.

अगर मायावती चाहती हैं कि यह परंपरा बंद होनी चाहिए और वे इसकी शुरुआत उत्तरप्रदेश से कर रही हैं तो इसका स्वागत होना चाहिए. निश्चित तौर पर यह समाज में एक नया अध्याय रचने जैसा काम है. जो लोग ईमानदारी से परीक्षा देकर, पूरे मानदंडों पर खरा उतरने के बाद काम पाएँगे वे काम करने के लिए उत्सुक भी होंगे. जो लोग किसी तरह पैसे जुटाकर नौकरी पाते हैं वो तो पहले उसकी भरपाई की चिंता में रहते हैं और फिर बाद में अपना परलोक सुधारने में लगे रहते हैं.

लेकिन अगर मायावती यह सब राजनीति के खेल में कर रही हैं तो यह बेहद घातक साबित हो सकता है.

बड़े सवाल

भ्रष्टाचार से हटकर देखें तो जिन लोगों को नौकरी से हटाया गया है, उन लोगों ने पता नहीं किस तरह ये पैसे जुटाए होंगे. किसी ने ज़मीन बेचकर तो किसी ने मकान बेचकर. अब ख़बरें आ रही हैं कि लड़कियों को नौकरी पाने के लिए अपने जिस्म भी नेताओ-अफ़सरों के हवाले करने की मजबूरी थी.

अब जब उनके हाथ से नौकरी चली गई है तो उन 18 हज़ार लोगों के सामने यह सवाल मुँह बाए खड़ा होगा कि जो ज़मीन-मकान बिक गया उसका क्या होगा? जो अस्मिता नौकरी पाने के लिए दाँव पर लगा दी थी वह कौन और किस तरह लौटा पाएगा? उल्टे सरकारी तंत्र ने यह दुष्प्रचार कर दिया है कि लड़कियों को नौकरी किस तरह मिली. ज़ाहिर है कि सभी लड़कियों ने नौकरी के लिए ऐसा नहीं किया होगा. ऐसे में उनके सवाल जायज़ हैं कि उनके वर्तमान को दागदार प्रचारित करने के बाद उनके भविष्य की गारंटी कौन लेगा?

जहाँ तक मायावती का सवाल है, तो उनके लिए राजनीतिक समीकरण अभी अनुकूल दिख रहे हैं. जब राजनीतिक समीकरण समीकरण अनुकूल होते हैं तो राजनीतिज्ञ बेहद ताक़तवर दिखाई देते हैं.

वरना मायावती का दामन भी पाक साफ़ नहीं है. उन पर भी भ्रष्टाचार के मामले चल रहे हैं. उनके पिछले शासनकालों में नियुक्तियों से लेकर ठेकों तक के क़िस्से सत्ता के गलियारों में ख़ूब सुने-सुनाए जाते रहे हैं.

हालांकि अब तक मायावती के ख़िलाफ़ कोई आरोप साबित नहीं हुआ है और वे सभी मामलों को राजनीति से प्रेरित बताती हैं. लेकिन ऐसे में तो मुलायम सिंह यादव भी कह रहे हैं कि पुलिस भर्ती में भ्रष्टाचार का मामला राजनीति से प्रेरित है.

वैसे इन दिनों सभी राजनीतिज्ञ अपने ख़िलाफ़ सभी आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताते हैं बताते हैं. चाहे वह हत्या जैसे जघन्य अपराध का हो या बलात्कार का या फिर भ्रष्टाचार जैसे अपराध का.

जहाँ तक आम लोगों का सवाल है, शायद उसे अब सारे राजनीतिज्ञ एक जैसे दिखाई देने लगे हैं, राजनीति से प्रेरित और एक दूसरे से बदला लेने को आतुर.

काश कि मायावती इस कार्यकाल में जो कुछ कर रही हैं, वह लोगों को कुछ भरोसा दिला पाए और दुष्यंत की पंक्तियों को भी सार्थक कर पाए,

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशि‍श है कि ये सूरत बदलनी चाहिए