राजेश प्रियदर्शी
बीबीसी हिंदी
'भारत में क्रिकेट एक धर्म है', यह बात बार-बार कही जाती है. क्रिकेट के प्रति जो समर्पण और उन्माद भारत में दिखता है वह किसी भक्ति या धर्मोन्माद से कम नहीं है.
भारत में अगर क्रिकेट धर्म है तो क्रिकेटर भी अवतार से कुछ कम नहीं हैं, कम से कम उन दिनों में जब उनके ग्रह-नक्षत्र ठीक चल रहे हों.
क्रिकेट, बॉलीवुड वो दो चीज़ें हैं भारत और इंडिया दोनों में एक जैसी पहुँच और असर रखते हैं, मुंबई से लेकर दूर-दराज़ के गाँव तक क्रिकेट पूरे देश को एक सूत्र में पिरोता है, धर्म की ही तरह.
दुनिया के हर धर्म में परोपकार और समाजिक दायित्व का तत्व ज़रूर होता है, मगर भारत में क्रिकेट और क्रिकेटरों पर नज़र डालें तो वह सिरे से ग़ायब दिखता है.
अमरीका के बास्केटबॉल के नौ स्टार खिलाड़ी पिछले दिनों चैरिटी के लिए पैसा जुटाने चीन गए, अमरीकी मेजर लीग बेसबॉल के खिलाड़ी 'स्ट्राइक आउट फॉर ट्रूप्स' नाम का टू्र्नामेंट खेल रहे हैं जिसका पैसा सैनिकों के कल्याण के लिए जाएगा.
सुपर सेलिब्रिटी
भारत के क्रिकेटरों को जो 'सुपर सेलिब्रिटी स्टेटस' देश की जनता ने दिया है उसके बदले में क्रिकेटर कभी कुछ लौटाते नज़र नहीं आते.
कहने का मतलब ये नहीं है कि क्रिकेटर समाजसेवक बन जाएँ, किसी सेलिब्रिटी का किसी कल्याण कार्य से जुड़ना सिर्फ़ सांकेतिक और प्रेरक होता है, उसके साथ आने से मुद्दों को मीडिया कवरेज की गर्मी और आर्थिक सहायता का सहारा मिलता है.
बॉलीवुड ने इस मामले में दशकों से मिसालें पेश की हैं, लड़ाई के मोर्चों पर नरगिस और राजकपूर सैनिकों का हौसला बढ़ाने जाते रहे हैं, बाढ़-भूकंप और सूनामी के लिए फ़िल्मी कलाकार चंदा इकट्ठा करते रहे हैं, सलमान ख़ान पेंटिंगों की नीलामी से पैसा जुटाते हैं...
आप इन कोशिशों पर सवाल ज़रूर उठा सकते हैं लेकिन क्रिकेटर ऐसा कुछ नहीं करते कि वे इस तरह के सवालों के दायरे में आ सकें, सिवा बरसों-बरस में खेले जाने वाले इक्का-दुक्का चैरिटी मैचों के.
पड़ोस में एक उदाहरण इमरान ख़ान का है जिन्होंने अपने सेलिब्रिटी स्टेटस की बदौलत एक बड़ा कैंसर अस्पताल बनवाया है, आप कह सकते हैं कि वे तो नेता हैं, लेकिन क्रिकेटर से नेता बने हमारे कई सांसदों ने ऐसा कौन सा काम कर दिखाया.
बोर्ड
दोष सिर्फ़ खिलाड़ियों का नहीं है, भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड जिसका सालाना कारोबार करोड़ों रुपए का है उसने कब सामाजिक दायित्वों की ओर देखा है, जबकि वह मुनाफ़ा कमाने के उद्देश्य से चलने वाला संगठन नहीं है, मुनाफ़ा कमाने वाले कॉर्पोरेट हाउस भी सामाजिक कार्यों पर कुछ धन ख़र्च करते हैं.
बीसीसीआई चैरिटी न करे लेकिन बस्तर, विदर्भ और झारखंड के ग़रीब बच्चों के गेंद-बल्ला ही बाँट दे, वह भी कभी नहीं हुआ, कभी नहीं हुआ कि क्रिकेट मैच के टिकट की बिक्री से मिलने वाली रक़म में से एक रुपया या दो रूपया कालाहांडी या बोलांगीर भेज दिया जाए.
देश के लिए न सही, अपनी खिलाड़ी बिरादरी के लिए ही कुछ करें, आए दिन ख़बरें आती हैं कि ग़रीबी से बेहाल खिलाड़ी ने मेडल बेच दिया या ओलंपिक टीम में खेलने वाला खिलाड़ी इलाज के बिना मर रहा है. उनके लिए देश के सबसे संपन्न खेल से जुड़े लोग कुछ क्यों नहीं करते?
इतना बड़ा क्रिकेट का कारोबार और क्रिकेटरों का इतना बड़ा आभामंडल क्या सिवा मनोरंजन के किसी और काम का नहीं हो सकता?
क्रिकेटर बहुत व्यस्त रहते हैं, एक देश से दूसरे देश का दौरा करते हैं, लगातार खेलते हैं इसलिए उनके पास यह सब करने का समय कहाँ है, ऊपर से रेस्तराँ भी तो चलाना पड़ता है.