शनिवार, 15 सितंबर, 2007 को 20:21 GMT तक के समाचार
मोहसिन अब्बास
टोरंटो से
टोरंटो फ़िल्म महोत्सव में पाकिस्तानी राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ भी छाए रहे. अपनी मौजूदगी से नहीं बल्कि लोकतांत्रिक राष्ट्र की उनकी कल्पना और पाकिस्तान में इसके लिए उठाए गए क़दमों पर बनी फ़िल्म से.
बेशक 1999 में सत्ता हासिल करने के बाद वो सबसे बुरे वक्त से गुजर रहे हैं लेकिन उनके जीवन पर बनी 58 मिनट की डौक्यूमेंट्री फ़िल्म 'डिनर विथ द प्रेसिडेंट, ए नेशंस जर्नी' से वो थोड़ी राहत महसूस कर सकते हैं.
पूरी फ़िल्म उदारवादी संभ्रांत दंपत्ति सबीहा सुमर और सच्चिदानंदम सदानंदन के ईर्द-गिर्द घूमती है. ये दोनों ही फ़िल्म के निर्देशक हैं.
फ़िल्म में जनरल मुशर्रफ़ को रात के खाने की मेज पर और सुबह चाय लेते समय ये चर्चा करते हुए दिखाया गया है कि वे किस रास्ते से पाकिस्तान में लोकतंत्र लाना चाहते हैं.
एक दृश्य में मुशर्रफ़ को ग्रामीण इलाक़ों में परंपरागत शासकीय प्रणाली पर चर्चा करते हुए दिखाया गया है. इसके बाद सूबा सरहद में सबीहा सुमर के जीवन को दिखाया गया है जो बुर्का नहीं पहनती हैं और रुढ़िवादियों को चुनौती देते नज़र आती हैं.
गाँव का एक आदमी सबीहा से कहता है, "हम आपको देख कर सोचते हैं कि काश हमलोग भी आप जैसा दिखते."
प्रेरणा
फ़िल्म निर्माताओं का कहना है कि सेना की वर्दी में एक राष्ट्रपति जिस तरह आम लोगों तक लोकतंत्र पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं, उससे उन्हें फ़िल्म बनाने की प्रेरणा मिली.
वे कहते हैं, "ऐसा दिखाया जाता है कि मुशर्रफ़ की लोकतंत्र में आस्था उतनी नहीं है. लेकिन उन्होंने अपने पूर्ववर्ती किसी भी लोकतांत्रिक नेता के मुक़ाबले कहीं अधिक व्यक्तिगत स्वतंत्रता दी है."
फ़िल्म में धार्मिक दलों के संगठन मुत्ताहेदा मजलिसे आलम (एमएमए), एक कबायली जिरगा, ट्रक चालकों, सिंध की किसान महिला और उनके पति के साथ-साथ सड़कों पर लोगों से सीधे बात की गई है.
फ़िल्म निर्माताओं ने इन लोगों से जो बात की है उससे निष्कर्ष निकलता है कि अधिकतर स्थानों पर महिलाओं की अपेक्षित उपस्थिति ना होना एक केंद्रीय मुद्दा है यानी महिलाओं के बिना लोकतंत्र विरोधाभासी है.
कराची में पैदा हुईं सबीहा सुमर ने न्यूयॉर्क में फ़िल्म बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त किया है.
उनकी पहली डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म 'हू विल कास्ट द फर्स्ट स्टोन' को सैन फ़्रांसिसको फ़िल्म फेस्टिवल में गोल्डन गेट अवार्ड मिला था. उनकी फ़ीचर फ़िल्म 'खामोश पानी' को भी कई मंचों पर पुरस्कृत किया जा चुका है.
उनके सहयोगी सच्चिदानंदम श्रीलंकाई हैं और उन्होंने भी कई डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में बनाई हैं.