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मंगलवार, 04 सितंबर, 2007 को 09:20 GMT तक के समाचार

नारायण बारेठ
बीबीसी संवाददाता, जयपुर

धूम मचाती राजस्थानी लोक धुनें

पंजाबी लोक संगीत की धुनें दुनिया भर में धूम मचा रही हैं और अब उसके पड़ोसी राज्य राजस्थान का लोक संगीत भी अपने पैर पसार रहा है.

बाज़ार के जानकार कहते हैं कि राजस्थानी लोक संगीत का सालाना कारोबार लगभग सौ करोड़ रुपए तक पहुँच गया है. नकली कैसेट और सीडी का कारोबार तो इससे दोगुना अधिक है.

लोक संगीत के सुर पहले किले, महलों तक सीमित थे. अब मरुस्थल का संगीत दुनिया के हर हिस्से तक जा पहुँचा है.

तकनीक ने पहले इसे कैसेट, फिर सीडी में उतारा तो इसके मीठे बोल यूरोप तक सुने जाने लगे, अब तो इंटरनेट पर भी राजस्थानी लोक संगीत की भरमार है.

राजस्थान की एक प्रमुख म्यूजिक कंपनी के केसी मालू कहते हैं,'' तकनीक से गुणवत्ता में सुधार आया, शब्द संगीत के साथ कानों तक ठीक से पहुँचने लगे तो माँग भी बढ़ने लगी.''

माँग का अनुमान इससे लगा सकते हैं कि केरल से कश्मीर तक हर जगह राजस्थानी संगीत के कैसेट-सीडी बिकते दिखते हैं.

राजस्थान की रागिनी

थार रेगिस्तान के पारंपरिक मांगणियार कलाकारों ने हर जगह अपनी कला के जलवे बिखेरे तो बाक़ी कलाकारों को भी नए मंच और मौक़े मिले.

रागिनी बरंगे यूं तो छत्तीसगढ़ की एक कलाकार हैं, लेकिन उन्हें राजस्थान के लोक संगीत ने इतना प्रभावित किया कि उनकी आवाज़ राजस्थानी गीतों में गूंजने लगी.

रागिनी कहती हैं कि राजस्थानी लोक संगीत में अदभुत कशिश है. जब मैंने पहली बार सुना तो सोचा काश मैं भी इन गीतों को गा पातीं. ये काश सच में बदल गया है, राजस्थानी में मेरे तीन कैसेट आ चुके हैं.

संगीत की दुकानों में राजस्थानी गीत संगीत के कैसेट और सीडी सजे मिलते हैं.

जयपुर में संगीत की दुकान चलाने वाले मनोज अरोड़ा कहते हैं, ''हाल के वर्षों में राजस्थानी संगीत की माँग बढ़ी है. इनकी उतनी ही माँग है जितनी हिंदी फ़िल्मों के गीतों की.''

पारंपरिक संगीत दिल को छू जाता है. ऑस्ट्रेलिया की सारा मैंडी तो इस लोक संगीत पर इस कदर मोहित हुईं कि उन्होंने केसरिया बालम जैसे गीत सीखे और मंच पर प्रस्तुति देना भी शुरू कर दिया.

सारा कहती हैं,'' इस गीत संगीत में जो मिठास है, वो कहीं और नहीं मिलती.''

तकनीक का दौर

लेकिन ये तकनीक का दौर है, इसमें कलाकार पीछे छूट गया है.

जवाहर कला केंद्र की चंद्रमणि सिंह कहती हैं,'' सुर वही है, स्वरूप बदल गया है. पहले गीत और संगीत अवसर के अनुकूल होते थे. लेकिन अब इसमें कमी आई है. अब कलाकार के गले की जगह तकनीक और मशीनी उपकरण पर ज्यादा जोर है.''

म्यूजिक कंपनी के मालू कहते हैं,'' पहले टेप था, फिर इसकी जगह सीडी ने ली, उससे लोक संगीत को लोकप्रिय बनाने में मदद मिली.''

उनका कहना था कि पहले लोक कलाकार सिर्फ़ गाते भर थे, अब वे सुनने भी लगे हैं, फिर मोबाइल ने भी बड़ी मदद की है. पहले हम कलाकार को बुलाने के लिए संदेशवाहक रखते थे, अब मोबाइल से दूर-दराज़ के इलाक़े में रहने वाले लोक कलाकारों तक पहुँच आसान हो गई है.

मालू मानते हैं कि कलाकार की जगह तकनीक थोड़ी अहम हुई है.

थार मरुस्थल के कलाकारों ने सदियों तक संगीत की साधना की, उसे इबादत की तरह जिया इसलिए उसमें माटी की महक और मिठास है.

लेकिन संगीत अब बाज़ार में है, देखना यह है कि उसकी यह मिठास किस हद तक बरकरार रह पाएगी.