कोमल नाहटा
वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार, मुंबई से
'राम गोपाल वर्मा की आग' का टाइटिल अगर पहले रखा गया 'रामगढ़ के शोले' होता तो शायद फ़िल्म को अच्छी या कम से कम ठीक-ठाक ओपनिंग तो मिल ही जाती.
मगर फ़िल्म के नाम में बदलाव आने के बाद जनता को पता चल गया कि फ़िल्म शायद शोले की री-मेक नहीं है. हालाँकि फ़िल्म का नाम बदलने का कोर्ट का ऑर्डर फ़िल्म की शूटिंग ख़त्म होने के बाद आया.
फिर भी इतने विवादों से फ़िल्म को फ़ायदा नहीं नुक़सान ही हुआ है. पहले शो के कलेक्शन बड़े शहरों में 30 से 40 फ़ीसदी रहे और छोटे शहरों में 50 से 55 फ़ीसदी.
छोटे शहरों में अधिक कलेक्शन होने की वजह फ़िल्म में बहुत 'एक्शन' होना है. ऐडलैब्स ने दक्षिण भारत को छोड़ देश के दूसरे हिस्से के वितरण अधिकार भरत शाह को बेचे.
चौदह करोड़ रुपए में ये अधिकार ख़रीदने के बाद भरत शाह ने मुंबई क्षेत्र के अधिकार तो अपने पास रखे, लेकिन दूसरे क्षेत्रों के अधिकार दूसरे वितरकों को बेच दिए.
भरत शाह को पाँच-छह करोड़ रुपए का नुक़सान होगा, जबकि दूसरे वितरकों की आधी या उससे भी ज़्यादा रकम डूब जाएगी.
सच, इस आग में सबके हाथ जल गए हैं. रामगोपाल वर्मा का तो नाम भी जलकर राख हो गया. अब उन्हें फिर से शुरुआत करनी पड़ेगी.
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फ़्लॉप का फ़ायदा या..
अमिताभ बच्चन को राम गोपाल वर्मा की आग में काम करने के लिए बहुत कटु शब्द सुनने को मिल रहे हैं. लेकिन अब भी बच्चन की फ़िल्मों को वितरक मुँहमांगी क़ीमत देने के लिए तैयार हैं. बस, मांगने की शक्ति होनी चाहिए.
आग की रिलीज़ से दो दिन पहले ही जितेंद्र के बालाजी फ़िल्म्स ने अमिताभ, अभिषेक और ऐश्वर्या को लेकर बन रही 'सरकार राज' के विश्व अधिकार 38 करोड़ रुपए में ख़रीदे.
ये बात भी सच है कि अगर ये अधिकार आग के फ़्लॉप होने के बाद बेचे जाते तो कोई भी ऐसी क़ीमत नहीं देता.
पर जितेंद्र से सोचा होगा कि सरकार तो हिट थी शायद सिक्वेल भी रामगोपाल वर्मा उसी मेहनत से बनाएँगे. पर ऐसा लगता है कि ‘आग’ में रामगोपाल वर्मा की सारी मेहनत लोगों को बेवकूफ़ बनाने में लग गई.
ख़ैर ऐडलैब्स, जो 'सरकार राज' को फ़ाइनेंस कर रहा है, उस कंपनी की तो क़िस्मत जग गई कि उसकी 'आग' के फ़्लॉप होने से पहले 'सरकार राज' से अच्छा मुनाफ़ा हो गया.
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बात से नहीं काम से साथ
सलमान और संजय दत्त भले ही क़ानून के शिकंजे में फँसे हुए हैं, लेकिन ओवरसीज़ वितरक किशोर लुल्ला को इस बात का डर नहीं है.
उन्होंने पिछले हफ़्ते ही दो फ़िल्मों के ओवरसीज़ वितरण अधिकार ख़रीदे हैं. इनमें से एक फ़िल्म में सलमान हैं, जबकि दूसरी में संजय दत्त.
सलमान की अमिताभ बच्चन और प्रियंका चोपड़ा के साथ बन रही 'गॉड तुसी ग्रेट हो' और संजय दत्त की अजय देवगन के साथ वर्षों से बन रही 'महबूबा'.
इन दोनो फ़िल्मों के ओवरसीज़ राइट के एग्रीमेंट किशोर ने हाल ही में साइन किए हैं.
लगता है कि बाक़ी इंडस्ट्री वाले सिर्फ़ कहते हैं कि उन्हें सलमान और संजय के साथ हमदर्दी है, लेकिन किशोर ने शब्दों के बजाय अपने काम से बताया है कि वे सच में क़ानून के लपेटे में आने वाले इन दोनो सितारों के साथ हैं.
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हॉलीवुड का भूत उतरा
सुनने में आया है कि यूटीवी और राकेश ओमप्रकाश मेहरा के सिर से हॉलीवुड के हीरो का भूत उतर गया है.
ऋतिक रोशन और अभिषेक बच्चन के मना करने के बाद राकेश मेहरा अपनी 'दिल्ली-6' के लिए हॉलीवुड हीरो ढूँढने लगे थे.
लेकिन गर्मागर्म ख़बर तो ये है कि वापस उनका मूड बॉलीवुड की तरफ़ हो गया है. अंदर के लोग कहते हैं कि राकेश मेहरा का इशारा आमिर ख़ान के भाँजे की तरफ़ है.
अगर आमिर के भांजे को साइन किया जाता है तो ये इस नए चेहरे की दूसरी फ़िल्म होगी. अभी वो संजय दत्त के साथ 'किडनैप' में काम कर रहे हैं.
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क्या भाग्यश्री का भाग्य चमकेगा
भाग्यश्री ने हिंदी फ़िल्में और टेलीविज़न धारावाहिक में काम करने के बाद अब एक मराठी फ़िल्म साइन की है.
इस फ़िल्म में उनकी पहली फ़िल्म 1989 की 'मैंने प्यार किया' के संगीतकार राम लक्ष्मण संगीत देंगे और राजश्री की 'मैने प्यार किया' की तरह गाने भी लता मंगेशकर गाएँगी.
18 साल बाद इन तीनों की जोड़ी फिर साथ काम करेगी. और कमाल भी दिखलाएगी? क्यों नहीं.
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असली बड़प्पन
गायक कुमार सानू ने अपनी फ़िल्म 'ये संडे क्यों आता है' के लिए रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर जूते पॉलिश करने वाले चार लड़कों को रोल दिए.
फ़िल्म बनते-बनते इन चारों के काम को देखकर और उनसे बढ़ते लगाव को ध्यान में रखते हुए कुमार सानू ने उन्हें गोद ले लिया है.
अब उन चारों लड़कों का खानापीना और पढाई-लिखाई का ख़र्चा कुमार सानू उठाते हैं.
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करीना को मिला करण का साथ
करीना कपूर की करण जौहर के साथ काम करने की दिली तमन्ना दो हफ़्ते पहले पूरी हो गई. ना, करण ने करीना के साथ कोई फ़िल्म शुरू नहीं की है.
करीना के साथ क्या करण ने ‘कभी अलविदा ना कहना’ के बाद किसी फ़िल्म का निर्माण या निर्देशन ही शुरू नहीं किया है. पर जोधपुर में करीना और करण ने एक साथ एक ऐड फ़िल्म में काम किया.
हो सकता है कि इस ऐड फ़िल्म के बाद अब अगली मंज़िल फ़ीचर फ़िल्म हो. आख़िर अच्छे निर्देशक हैं ही कितने?
और अच्छी अभिनेत्रियाँ तो अच्छे निर्देशकों से भी कम हैं. कहने का मतलब है कि इन्हें एक-दूसरे की ज़रूरत तो पड़ेगी ही पड़ेगी.