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गुरुवार, 23 अगस्त, 2007 को 10:21 GMT तक के समाचार

मधुकर उपाध्याय की कविताएँ

अक्स

मैं काग़ज़ पर
लकीरें खींचता जाऊँगा
बेतरतीब
उसमें अक्स उभरेंगे
वहाँ कुछ
फूल-पत्ते-पेड़ होंगे
एक घर होगा!
घरों को लौटती
चिड़ियों का
पूरा क़ाफ़िला होगा!
उसी में
झाँककर देखेगा सूरज
बादलों की ठीक पीछे से!
उसी में
रास्ता होगा
जो पेड़ों के किनारे से
नदी तक जाएगा!

तुम्हारा नाम
उभरेगा उसी में
तुम्हारा अक्स होगा
साफ़ बिलकुल!
उसे मैं
घेर दूँगा कुछ लकीरों से
वो काग़ज़ मोड़कर
मैं शाम को
घर साथ लाऊँगा!!

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अम्मा

मैं अम्मा को सिखाता हूँ नई बातें
कई बातें मैं ख़ुद भी सीख जाता हूँ!

जो चावल कम हो
अदहन ख़ूब होता है
निकलता है
धुएँ का रंग भी
उस रोज़
कुछ गाढ़ा
लकड़ियों को भिगोना
औ' धुएँ को रंग देना
ये अम्मा जान कर करती है शायद!

तुम आओगे तो उसको दूर से पहचान लोगे
वो मेरा घर है जिसमें शाम होते ही
रसोई से धुआँ उठता है
लेकिन
रसोई में धुआँ पकता है
लेकिन
रसोई में जो पकता है
वही मुझमें भी होता है
मुझे देखो
मुझे तो जानते हो तुम!!

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कोलंबस

नहीं, ऊबा नहीं हूँ
भागकर आया नहीं हूँ मैं
किन्हीं उड़ते परिंदो का
ज़मीं पर आ पड़ा
साया नहीं हूँ मैं
मैं उसको छूकर आया हूँ
नई दुनिया बनाने!

मैं कोलंबस नहीं हूँ
गो कि ख़्वाहिश है
नई दुनिया में जाने की
जहाँ हिलकर ज़रा सा
खोल देते हों
किवाड़ें
होंठ
बग़ावत का इरादा
छोड़ देती हों
जहाँ
साँसे!

मैं जिसको छूकर आया हूँ
वो कोई काठ की
बेजान सी मूरत नहीं थी
वो पत्थर की अहिल्या भी नहीं थी
लौट जाती जो
उसी दुनिया में
जिसने ये सज़ा दे कर
सजाकर रख दिया था
राह में उसको
जो दुनिया मैं बनाऊँगा
वहाँ मैं भी रहूँगा
और वो भी
जिसे मैं छूकर आया हूँ!!

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घर

हमेशा
घर बदल लेता है
मेरा घर
मैं लौटूँगा
वहाँ
पर कब?
नहीं मालूम
वो दरवाज़ा
जो पूरब को खुलेगा
उस तरफ़ सूरज उगेगा
वो खिड़की रात में
मुझसे कहेगी
देर क्यों करदी?
वो बच्चे
देर तक बैठे रहेंगे
राह देखेंगे!

मैं लौटूँगा
तो बस्ती सो चुकी होगी
मैं सब कुछ हारकर
आऊँगा
तब भी
वहाँ
असबाब होंगे
ज़िंदगी के सब
वो दरवाज़ा खुला होगा!!

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मधुकर उपाध्याय
126, समाचार अपार्टमेंट्स
मयूर विहार-पार्ट 1
दिल्ली-110091